यह संसार
मेरे एक इष्ट मित्र थे पुराने-ज़माने के आई.सी.एस.। ख़ानदान से भी अच्छे सम्पन्न थे, उस ज़माने के रईस।
बड़े-बड़े पदों पर रहे-डिप्टी कमिश्नर, मजिस्ट्रेट, ट्रिब्यूनल के चैयरमैन इत्यादि।
परन्तु कुछ अस्वस्थता के कारण और अधिकतर वैराग्य वृत्ति के कारण जान-बूझकर 50 वर्ष की आयु से पहले ही नौकरी से जल्दी छुटकारा पा लिया। जितनी भी पेंशन मिली मंजूर कर ली, क्योंकि घर से सम्पन्न थे, इसलिए पैसे का कोई लालच नहीं था।
उस ज़माने में परिवार नियोजन (Family Planning) नहीं था। बड़ा परिवार शुभ और भाग्यशाली माना जाता था। उनके पाँच पुत्र थे और चार पुत्रियाँ। और नौकरी से मुक्त (Retire) होने से पहले ही सबके विवाह हो चुके थे।
अब धीरे-धीरे कुछ ही वर्षों में परिवार बहुत बढ़ गया। सब पुत्र-पुत्रियों के बच्चे हो गये। बीस-पच्चीस तक गिनती पहुँच गयी। घर में रौनक बढ़ गयी। या यूँ कहिये कि बच्चों के खेलने-कूदने, हँसने-रोने से हर समय सारा घर गूँजता रहता था। ख़ूब बच्चों की लड़ाई-भिड़ाई और शोर।
लड़कियाँ भी यहाँ माँ के घर आकर, रहकर खुश होती थीं और उनके बच्चे भी वहीं होते थे।
ज़माना अंगरेज़ी फ़ैशन का था, लड़के -लड़कियाँ सब इधर-उधर सिनेमा-सैर और रेस्तरां और मित्रों के घर चले जाते थे और बच्चों को दादा-दादी और नाना-नानी के पास छोड़ जाते थे।
कुछ ही दिनों में ये मेरे मित्र और उनकी धर्मपत्नी दोनों परेशान हो गये और इन्होंने आपस में निश्चय किया कि कहीं चार-पाँच सौ मील दूर किसी अच्छे गाँव के पास थोड़ी-सी खेती लेकर वहाँ एक झोंपड़ी या एक छोटी-सी कुटी (Cottage) बनाकर शान्तिपूर्वक रहें और इस संसार के धन्धों और झगड़ों से छुटकारा मिले।
उनके लिए क्या मुश्किल थी। थोड़े ही दिनों में मध्यप्रदेश के एक गाँव में जंगल और पहाड़ों के प्राकृतिक रमणीक वातावरण में कुछ ज़मीन खरीद ली और वहाँ दो कमरों की कुटिया बना ली, उसके साथ रसोई और स्नानागार भी। और खेती में थोड़ी सब्ज़ी इत्यादि। शान्ति, चैन और आनन्द से रहने लगे। वहाँ पास के गाँव से एक दस-बारह साल का होशियार लड़का घर की सफ़ाई तथा अन्य सभी प्रकार के काम-काज में मदद देने के लिए नौकर रख लिया गया।
अब यहाँ जीवन तो सुख-चैन से शुरू हुआ था और दूध-चाय के लिए एक बकरी भी रख ली, और अंडों के लिए दो-चार मुर्गियाँ भी रख लीं। परन्तु थोड़े ही दिनों में इधर-उधर अनाज के खेतों के कारण घर में चूहों ने बहुत परेशान करना शुरू किया। चूहों के लिए उनको एक बिल्ली पालनी पड़ी।
मुर्गियों के पचास-साठ चूज़े हो गये। उधर बिल्ली ने मुर्गियों के बच्चों को परेशान करना और खाना शुरू कर दिया।
अब ये मित्र बहुत झुंझला गये और परेशान हो गये। बिल्ली को निकाल दें तो चूहे परेशान करेंगे। अब उन्होंने गाँव के किसी बुद्धिमान से मशविरा करके बिल्ली को डर में रखने के लिए एक कुतिया पाली।
अब इतने अरसे में बकरी के बहुत बच्चे हो गये और कुतिया बकरी के बच्चों को तंग करने लगी और कुछ ही दिनों में कुतिया के भी बहुत से बच्चे हो गये। परेशानी पर परेशानी बढ़ने लगी। लेकिन कोई चारा नहीं।
अब इतने वर्षों में, लड़का, जो घर का काम-काज करता था और मुर्गियों तथा बकरियों को सम्हालता था, बड़ा नौजवान हो गया। ये मित्र और उनकी धर्मपत्नी दोनों बहुत सज्जन और भले व्यक्ति थे। इनको दिन-प्रतिदिन यह विचार होने लगा कि इस लड़के की अब शादी की उमर है। हमारा क्या हक़ है कि हम इसे शादी से वंचित रखें, बल्कि वह हमारा ही तो बच्चा है जिसने हमारी इतनी सेवा की है। हमारा यह फर्ज़ और धर्म है कि उसकी शादी कर दें।
इधर-उधर ढूँढ़-ढाँढ़ कर एक अच्छी लड़की के साथ शादी कर दी।
अब इन दोनों के लिए भी एक नये कमरे की सुविधा करनी पड़ी और उनके खाने-पीने का भी प्रबन्ध करना पड़ा।
चार-पाँच वर्षों में इस नवयुवक के भी दो-तीन बच्चे हो गये और फिर वे ही भले ख़्याल (Noble thoughts) आने लगे कि ये बच्चे भी तो हमारे ही बच्चे हैं, इनके पढ़ने-लिखने और स्कूल भेजने का प्रबन्ध करना हमारा धर्म है।
वहाँ घर में पोते-पोतियों और धोते-धोतियों से परेशानी का खतरा था और यहाँ, नौकर के बच्चों, बकरी के बच्चों, और कुतिया के पिल्लों और मुर्गी के चूज़ों-सबको पालना पड़ा। ये सब तो जानवरों के बच्चे थे लेकिन फिर भी छोटे-छोटे बच्चों से कितना प्रेम हो जाता है, चाहे वे कुतिया के हों, चाहे बकरी के। और गिनती में तो यह सब शायद घर की बनिस्बत कई गुना हो गये थे।
मेरे मित्र जिस झंझट से बचने के लिए यहाँ भागकर आये थे उसी झंझट ने उन्हें फिर से घेर लिया और उनकी ज़िदगी पहले से भी ज़्यादा परेशानियों से भर गयी। सुख-चैन तो मिलता ही नहीं।
इसका हल सब सन्तों, महात्माओं और ऋषियों ने एक ही दिया है जो गुरु नानकदेव के पद में सरलता से कहा हुआ है:
ना सुख विच संसार दे - ना सुख छड ग्याँ (गेयाँ) ।
सुख है विच विचार दे - ते नानक शरणी प्याँ (पेयाँ) ।1
1. सुख न तो संसार के बीच में है और न ही संसार को छोड़ देने में है।
सुख तो ‘विचार’ में है, इसलिये नानक शरणागत होते हैं।