पावन संस्मरण (भाग 1)
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आयी मौज फ़क़ीर की


फ़क़ीर तो सदा मौज में ही रहे हैं। जिस फ़क़ीर की यह कहानी है वह पीछे बताऊंगा। पहले तो सुनिये कि वह फ़क़ीर कैसे हुआ।

बहुत युग नहीं बीता। थोड़े ही वर्षों की बात है। लखनऊ यूनिवर्सिटी के उपकुलपति (Vice-Chancellor) थे बहुत धुरन्धर और प्रसिद्ध विद्वान। यह अंगरेज़ों के ज़माने की बात है जिसको 30-35 वर्ष ही हुए। वाइस-चांसलर एक बहुत बड़ा पद होता था और जितनी शान और रोब से वे रहते थे, अंगरेज़ गवर्नर भी क्या रहते होंगे। हालत आजकल की यूनिवर्सिटियों की तरह नहीं थी।

ये सज्जन शायद बंगाली थे परन्तु लखनऊ में बसे हुए थे। उनकी स्त्री की क्या शान थी। रानियों की तरह रहती थीं। उठना-बैठना, खाना-पीना, मिलना-जुलना सब अंगरेज़ों के ढंग पर होता था। फिर भी उस देवी के अन्दर कुछ गहरी बात थी जो ऊपर से नहीं दिखायी देती थी।

लखनऊ यूनिवर्सिटी में एक अंगरेज़ प्रोफ़ेसर भी था। इन सब लोगों के असली नाम तो मैं भूल गया हूँ, लेकिन भगवान् की लीला जो हुई और उस लीला में उनके जो नाम थे वह मैं बतला रहा हूँ। इन देवी का आध्यात्मिक स्वरूप जब सामने आ गया तो इनको ‘यशोदा माई’ कहते थे।

अंगरेज़ प्रोफ़ेसर इन वाइस-चांसलर के यहाँ बहुत आया-जाया करते थे। लखनऊ विश्वविद्यालय में आने से पहले यह अंगरेज़ बनारस विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर थे।

एक बार वाइस-चांसलर की कोठी पर कोई बहुत बड़ा सरकारी समारोह हो रहा था। एकाएक बीच में से यह देवी ग़ायब हो गयीं, हालाँकि इनका समारोह में उपस्थित रहना अत्यावश्यक था। जब इनकी खोज होने लगी तब यह अंगरेज़ प्रोफ़ेसर अन्दर उनको देखने गये और देखकर चकित रह गये कि वे एक छोटे-से कमरे में ध्यान में लीन हैं। इनके सम्बन्ध में ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता था। उस दिन से ये अंगरेज़ प्रोफ़ेसर इन देवी के, जिनका नाम बाद में ‘यशोदा माई’ हो गया था, शिष्य बन गये।

यशोदा माई को इस अधेड़ उम्र में बीसियों रोग हो गये। मधुमेह (Diabetes), रक्तचाप (Blood Pressure), हृदय रोग (Heart disease), आदि घोर बीमारियाँ!

भगवान् ने उनको धन-दौलत, पद और सब व्यवस्थाएँ-सुविधाएँ दे रखी थीं। कलकत्ता, बम्बई में बड़े-से बड़े डाक्टरों से सम्पर्क किया जा सकता था और किया जाना चाहिये था। उस ज़माने में देश के बाहर लन्दन, स्विट्ज़रलैण्ड इत्यादि जगहों में ऐसे बड़े लोग इलाज के लिए जाया करते थे और यह देवी तो जा ही सकती थीं।

परन्तु अस्पतालों और नर्सिंग होम्स में जाने के बजाय उन्होंने क्या ठानी? घोर जंगल में अल्मोड़ा से भी 21 मील आगे जहाँ कोई सड़क नहीं, कोई राह नहीं कुछ ज़मीन लेकर बसीं और आश्रम बना लिया। ये अंगरेज़ प्रोफ़ेसर भी जो इनके शिष्य थे, साथ गये और अब इनका नाम श्रीकृष्णप्रेम हो गया। वहाँ जंगल में एक बहुत सुन्दर छोटा-सा मन्दिर बनाया और उसमें भगवान् कृष्ण की बहुत सुन्दर जीवन्त (Living) मूर्ति स्थापित की और इधर-उधर सुन्दर बग़ीचे लगाये तथा श्रीकृष्ण-भजन में मगन और लीन हो गये।’ इसी बीच दो-तीन विदेशी लोग और भी आकर उनके शिष्य बन गये।

यशोदा माई शरीर की बीमारी और दशा को भूल कर भगवान् की आराधना और भक्ति में रहने लगीं। वे एक बहुत ही बड़ी आश्चर्यजनक ऊँची आध्यात्मिक स्थिति में पहुँच गयीं और कुछ ही वर्षों में उन्होंने शरीर त्याग दिया।

हम लोग जब इस आश्रम को देखने गये तब यशोदा माई नहीं थीं। श्रीकृष्णप्रेम से सब जानकारी की कोशिश की परन्तु वह भी ऊँची स्थिति में रहते थे जिससे बहुत बातचीत नहीं हो पाती थी। हमें कुछ निराशा भी हुई। जब संध्या होने लगी तब हमने पूछा कि हम रात-भर यहाँ रह जायें परन्तु उन्होंने साफ़ इन्कार कर दिया और कहने लगे कि हमारे पास ऐसी सुविधा नहीं है। हम लोग दो-तीन मील पैदल चलकर एक डाक बंगले में रहे। प्रातः उठकर वापस लौटने की बजाय एक बार फिर इच्छा हुई कि यशोदा माई के आश्रम में जायें।

वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्णप्रेम से एक बार फिर सत्संग जोड़ा। हमने पूछा कि पहले तो आपके आश्रम में बहुत लोग बंगाल और उत्तर प्रदेश की तरफ से आया करते थे और दो-चार सौ लोगों के ठहरने का प्रबन्ध भी था। उन्होंने बताया कि 20-25 वर्ष तक धीरे-धीरे लोग आते रहे और यहाँ उन्होंने आमोद-प्रमोद (Picnic) का स्थान बना लिया। वे लोग पूजा के दिनों में यहाँ महीना-दो-महीना रहने के लिए आते थे क्योंकि यहाँ बहुत सस्ता और एकान्त स्थान था और उनको सब तरह की सुविधाएँ मिल जाती थीं। हम लोगों ने धीरे-धीरे उनके ठहरने की झोंपड़ियाँ बनायीं और वर्षों में सैंकड़ों झोंपड़ियाँ हो गयीं और उन लोगों को ठहराने, उनके खाने-पीने की चीज़ों का प्रबन्ध करने और देखभाल में ही हमारा सब समय बरबाद होने लगा।

‘एक बार हमें विचार हुआ कि इतने लोग जो आते हैं, इतने वर्षों में उनमें से किसी को भी आध्यात्मिक ज्ञान या भगवान् को पाने की इच्छा नहीं हुई।’ वे लोग तो केवल अपनी छुट्टियाँ मनाने आ जाते थे। वे लोग हमारे पूजा-पाठ और भगवान् के रास्ते में रुकावट दिखायी देने लगे।

हमको विचार हुआ और भगवान् का आदेश हुआ कि यह सब निरर्थक तमाशा बन्द होना चाहिये।

तो एक प्रातः केवल एक दियासलाई ने चमत्कार दिखाया और सब झोंपड़ियाँ जो 20-25 वर्षों में बनी थीं, कुछ ही मिनटों में स्वाहा हो गयीं।

तब से जो लोग आते हें उनको साफ़ कह दिया जाता है कि हमारे यहाँ रहने का कोई स्थान नहीं है। इसलिए आपको भी रात में कह दिया गया था।

ऐसा सुना तो था: आयी मौज फ़कीर की और दिया झोंपड़ा फूँक,: परन्तु इस अंगरेज़ फ़क़ीर ने सैंकड़ों ही झोंपड़े फूँक दिये ताकि भगवान् के रास्ते में कोई बाधा न आये।

परन्तु आजकल....।