पावन संस्मरण (भाग 1)
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लग़ाम


यह उन दिनों की बात है, जब मैं युवक था। मैं एक जवान अंगरेज़ के साथ, जो कि कलकत्ते की एक ब्रिटिश फ़र्म से सम्बन्धित था, व्यापार के सिलसिले में दौरे पर था। एक बार हमने कुछ दिनों का अवकाश लेकर जीवन का आनन्द उठाने का निश्चय किया।

हमें एक ऐसे साहस की उमंग थी। हमने उस बीहड़ में घुसने की ठानी।

हमने इसके लिए किसी उपयुक्त वाहन की तलाश की। पता चला कि हवाई जहाज़, रेलवे, मोटरकार और बस आदि तो वहाँ जा नहीं सकते थे। यहाँ तक कि बैलगाड़ी के लिए भी वह इलाक़ा दुर्गम था। तो फिर वहाँ जाने का उपाय क्या है? हमें बताया गया कि एकमात्र हाथी ही ऐसी सवारी थी जो हमें वहाँ ले जा सकती थी। चूँकि हमने अभी तक हाथी की सवारी नहीं की थी, यह सुनकर हमलोग बड़े ही आनन्दित हुए।

हमने एक हाथी किराये पर किया और जंगल में घूमकर लौट आने का लगभग एक सप्ताह का कार्यक्रम बनाया। हम बड़े उत्साह भरे व उत्तेजित थे। हम लोग सीढ़ी के सहारे हाथी पर चढ़ गये।

किन्तु तभी मेरे साथी अंगरेज़ ने महावत से पूछा कि, ‘हाथी की लग़ाम कहाँ है?’ महावत ने बताया कि ‘हाथी की तो कोई लग़ाम नहीं होती।’ बस, यह सुनना क्या था कि अंगरेज़ को जैसे झटका-सा लगा और वह तुरन्त हाथी पर से कूदकर अलग खड़ा हो गया। विवश होकर मुझे भी नीचे उतरना पड़ा।

मैंने उससे पूछा कि ‘आख़िर उसकी घबराहट का कारण क्या है?’ वह बोला, ‘ऐसे किसी भी जानवर पर, जो बिना बागडोर के हो, सवारी करने की जोख़िम मैं नहीं उठा सकता!’ मुझे उसके इस बर्ताव पर बड़ा आश्चर्य हुआ। क्या इस भले आदमी को इतना तक पता नहीं कि हाथी के कोई लग़ाम नहीं होती?

मैं कुछ नाराज़ भी हुआ और बोला, ‘जरा देखूँ तो तुम्हारी लग़ाम कहाँ है? तुम भी तो एक जानवर ही हो - भले ही सोचने और बोलनेवाले जानवर क्यों न सही!’

उसने भी उत्तेचित होकर कहा, ‘‘हाँ, मेरी लग़ाम हरदम मेरे हाथों में होती है। मेरा शरीर एक घोड़े की तरह है। सवार को इतना अवश्य ही मजबूत होना चाहिये कि वह घोड़े की लग़ाम ठीक से थाम सके। यदि मैं लग़ाम को सावधानी से, उचित ढंग से और मज़बूती के साथ नहीं थाम सकता तो मैं अवश्य ही भटक जाऊंगा। यदि मैं एक अच्छा सवार हूँ और लग़ाम ठीक से और मज़बूती से पकड़े हुए हूँ तो मैं एक संत और योगी भी बन सकता हूँ।’’

आगे कहा: कठोपनिषद का सन्देश

‘आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथम् एव तु।

बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहम् एव च।।

इन्द्रियाणि हयान् आहुर् विषयांस् तेषु गोचरान्।

आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम् भोक्तेत्याहुर् मनीषिणः।।

विज्ञानसारथिर् यस् तु मनःप्रग्रहवान् नरः।

सोऽध्वनः पारम् आप्नोति तद् विष्णोः परमं पदम्।।

रथ यानी शरीर का स्वामी रथी है आपका आत्मा जिसका सारथी है बुद्धि, और लगाम है मन। इंद्रियां हैं घोड़े और जिसके विषय हैं गोचर मैदान।

आत्मा, बुद्धि मन, इंद्रियां व विषय के समुचित संयोग के द्वारा आत्मा विष्णुपद तक को प्राप्त करने में समर्थ है - परमपद भी! तब उसे यह भी अनुभव होता है कि (इसकी भाँति) वह भी परमात्मा है जो सब भूतों में प्रविष्ट होकर तद्रूप बन कर वही बन जाता है। एक ही चिर नित्य है जो अविनश्वर में प्रवेश करके उसे भी अस्तित्व-मण्डित करता है - और उसे होने का गौरव प्रदान करता है। इसी जीवन को गौरव-मण्डित करता है। भागवत उपस्थिति का स्वानुभव देकर। उसी क्षण अखिल विश्व ब्रह्माण्ड ब्राह्मिक उपस्थिति से उद्भासित हो मात्र प्रकाश पुंज हो दिव्य रूप में भास्वर हो उठता है।

मैं तो उसके सामने नतमस्तक हो गया!