पावन संस्मरण (भाग 1)
19

वह दुःख जो सुख लाया


हमारे डॉक्टर मातेश पास के बाज़ार में कुछ ख़रीदारी करने अपने स्कूटर पर गए थे। रास्ते में दुर्घटना में उनकी एक दूसरे स्कूटर से टक्क्र हो गई। ग़लती दूसरे स्कूटर वाले की थी।

तो भी दूसरे स्कूटर पर छोटी-मोटी झरीट पड़ गई थी। क्योंकि डॉक्टर मातेश बहुत सुसंस्कृत व भले व्यक्ति हैं उन्होंने अपने आप ही उसके नुक़सान को पूरने की इच्छा से बीस रुपए देने को कहा जिससे वह अपने स्कूटर की मरम्मत करवा लेता। पर वह तो दुष्ट आदमी था। उसने डॉक्टर की शराफ़त का नाजायज फ़ायदा उठाना चाहा और अधिक रुपयों की माँग करने लगा।

डॉक्टर मातेश जो अधिक रुपए देने को भी तैयार हो गए थे इसी दौरान वे लोग जिन्होंने यह दुर्घटना और उसके बाद का सारा किस्सा देखा था निहायत शरीफ डॉक्टर मातेश की सहायता व रक्षा के लिए आगे आ गए। साथ ही वे उस व्यक्ति को उसके लालच व ग़लत व्यवहार के लिए भर्त्सना करने लगे।

डॉक्टर मातेश उस कार्य से बाजार चले गये जिसके लिए वे आए थे। तब तक लोगों ने उस स्कूटर वाले को अच्छी तरह से झाड़ा और खूब डाँटा। यहाँ तक कि उन्होंने उससे वह 20 रुपए भी निकलवा लिए जो उसने डॉक्टर मातेश से हथिया लिये थे। उन्होंने यह 20 रुपए लिए और डॉक्टर मातेश को खोजकर उन्हें वापस थमा दिए।

डॉक्टर मातेश ने यह सारी घटना मुझे कह सुनाई। मैंने छूटते ही उनसे कहा कि ‘‘यह वापस आए 20 रु0 तो आपको मुझे देने चाहिये।’’ वह मान गए पर इतने में ही पाराशर ऋषि वहां आ निकले उन्होंने चलते-फिरते हमारी बातचीत सुन ली थी। छूटते ही मुझसे बोले, ‘‘नहीं यह ठीक नहीं है। डॉक्टर मातेश आपको इन्हें 20 रुपए नहीं देने चाहिये। बल्कि 50 रुपए देने चाहिये। आखिर इन्हीं की वजह से तो आपको 20 रुपए वापिस मिले। आपको तो शुक्र करना चाहिये और तीस रुपए अपनी तरफ से जोड़कर इन्हें पचास रुपए देने चाहिये।’’ डॉक्टर मातेश ने यह भी स्वीकार कर लिया।

डॉक्टर मातेश को अफ़सोस और दुःख हो रहा था कि मैंने उनसे 50 रुपए नहीं लिए और मैं दुखी हो रहा था कि मैं 50 रुपए लेने से चूक गया।

पर हम दोनों ही अपने दुःख में सुखी थे।