मेरे दादा का कोट - 1
वह कोट उनका न था।
असल में तो वह उनके बड़े भाई का था। परिवार में एक विवाह के अवसर पर उन्हें पहनने को दिया गया था। ख़ैर उन्होंने उसे कभी वापस न दिया। पर उन्होंने इस्तेमाल उसे कभी-कदास ही किया। वास्तव में उनकी आंतरिक इच्छा थी कि समय आने पर उनके बेटे उसका प्रयोग करें - पहनें।
जल्द ही मेरे दादा की मृत्यु हो गई। कई साल बाद मेरी दादी को मेरे दादा की व्यक्तिगत वस्तुओं में से वह कोट मिला। फिर वह समय आया कि मेरी दादी ने अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव किया जब कि उन्होंने वह कोट अपने बेटे को दिया जो मेरे पिता से बड़े थे और काश्मीर राज्य की सेवा में थे। मेरे ताऊ को वह कोट पहना देखकर मेरी दादी प्रसन्नता के अभिमान से फूली न समाई। क्योंकि न केवल इससे उनकी काश्मीर की भयंकर शीत से रक्षा होती वरन् अब तो यह कोट ख़ानदानी प्रतीक बन चुका था जिसे कि वे अगली पीढ़ी को दे रही थी।
समय बीतने के साथ मेरे ताऊ ने वह कोट अपने छोटे भाई, यानि कि मेरे पिता को दिया। मेरे ताऊ ने भी उस कोट को इतने ध्यान और प्यार से इस्तेमाल किया था कि वह बढ़िया हालत में था। हाँ, शायद इसमें इस बात का भी हाथ रहा हो कि जब उन्होंने वह कोट मेरे पिता को देने का सोचा तो उसे दर्ज़ी से पलटवा लिया। जो भाग अन्दर की तरफ़ था खोलकर बाहर कर दिया और बाहर का भाग अन्दर करवा दिया। अब तो यह कोट एकदम नया लगने लगा था।
इस कोट की महिमा बड़ी विचित्र थी। यह तो वास्तव में एक जादुई करिश्मा था। जब मेरे पिता इस कोट को पहनते तो उनमें ऐसा भाव आ जाता मानों उनमें दैवी शक्तियों का प्रवेश हो गया हो।