पावन संस्मरण (भाग 1)
18

दया


शाम को सत्संग के लिए हम ध्यान-कक्ष में इकट्ठे हुए तो मैंने देखा कि हमारे तबला-वादक उदास थे। दुःख से उनका चेहरा मुरझाया था।

मैंने पूछा, ‘‘शशिभाल तुम दुःखी क्यों हो? क्या तुम्हारा घर भी उत्तर-प्रदेश के जिले में है और क्या वह भी सबके साथ बाढ़ में बह गया है?’’

उनका चेहरा और भी रुआंसा हो उठा। लगा कि कुछ क्षणों में वह अपना धीरज खो बैठेंगे। उनकी आँखों में आँसू भर आये।

मैंने उनसे कहा, ‘‘अरे तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए। अब तो तुम हर समय की बेचैनी व मोह-माया से मुक्त हो गये हो!’’ इस पर तो वह रो ही दिये।

तब मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि, ‘‘भाई यह संसार तो लीला है। हम स्वयँ ही नहीं जानते कि हमारे लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। केवल ‘पंडित लीलाधर भगवान् जानते हैं।’’

सुनकर वह थोड़ा-सा मुस्कराये।

इस पर उन्होंने अपना दिल खोला कि उनके घर में केवल एक बड़ा कमरा (दालान) जो कि पक्का था बहने से बचा है और धोया नहीं गया। उस एक दालान में पूरा परिवार और रिश्तेदार जिनकी संख्या 25-26 है एक साथ रह रहे हैं।

इस पर मैंने शशिभाल से कहा, ‘‘लो, यह तो भगवान् ने तुम्हें स्वर्ण अवसर दिया है कि तुम सब मिलकर एक होकर रहो इकट्ठे पकाओ, खाओ।’’

मैंने फिर पूछा, ‘‘शशिभाल तुम्हारे यहाँ इतनी बड़ी विपदा पड़ी तो तुम गाँव नहीं गये कि उनकी विपत्ति देखते व बाँटते।’’

शशिभाल ने संजीदगी से कहा, ‘‘बताइये मैं वहाँ जाकर भी उनके लिए क्या कर लेता सिवा इसके कि उनका दुःख-दर्द और बढ़ाता।’’

मैंने उसे फिर समझाया कि, ‘‘भाई अब तुम दुबारा मकान बनाने की भूल कभी न करना। अंग्रेज़ी कहावत से सबक लो कि ‘बेवकूफ मकान बनाते हैं और बुद्धिमान उसमें रहते हैं। (Fools bulit the houses and wise men live in them.) और देखो इस बाढ़ में तो बुद्धिमान भी बह गये।’