24. संगीत-ऋषि उस्ताद अल्लाउद्दीन ख़ाँ · Part 1 of 3
आभार - एक छवि
संगीत-ऋषि
उस्ताद अल्लाउद्दीन ख़ाँ साहब हमारे देश के अद्वितीय संगीत-गुरु व महान सरोदवादक कलाकार थे। कितने ही साज़ों (Musical Instruments) पर उनका अधिकार था और बड़ी निपुणता से वे उन्हें सिखाते व बजाते थे।
उनका जन्म-स्थान आसाम में त्रिपुरा नामक छोटी-सी रियासत में था। बचपन में ही 4 या 6 साल की नाजुक उम्र में वे संगीत के लिए घर से भाग खड़े हुए। कलकत्ता में दक्षिणेश्वर में माँ-शारदा जी के हाथों से बने और प्राप्त चने व पूरी का प्रसाद ही वर्षों उनके जीवन का आधार था। कितने ही उस्ताद और संगीत-शिक्षकों से उन्होंने संगीत सीख़ा। अन्त में रामपुर रियासत के उस्ताद वज़ीर खाँ से इन्होंने विधिवत् दीक्षा लेकर अपनी संगीत-साधना को पूर्ण किया।
मध्यप्रदेश में मैहर नाम की एक छोटी-सी रियासत में जाकर वे बस गये। वे कहते ‘माई-हार’। पर्वत-शिखर पर आसीन शारदा-पीठ की शारदा मैया के वे अनन्य भक्त थे। उनके दर्शन-पूजन बिना वे जल भी ग्रहण नहीं करते थे। उनके चरणों में ही उन्होंने अपनी कुटिया या कोठी कुछ भी कहें ‘मदीना भवन’ बनवाई। यहीं वे अपनी अन्तिम साँस तक रहे।
उनका आचार-विचार, रहन-सहन हिन्दू-ब्राह्मणों जैसा पवित्र और तपस्या से पूर्ण था। यहीं रहकर उन्होंने श्री पन्नालाल घोष, पंडित रविशंकर, पुत्र उस्ताद अली अकबर खाँ, पुत्री अन्नपूर्णा देवी, श्रीमती शरण रानी, पौत्र आशीश खाँ, निखिल बनर्जी सरीखे अद्वितीय कलाकारों को संगीत शिक्षा-दीक्षा गुरुकुल-पद्धति से अपने निवास-स्थान पर रखकर दी और उनसे कठोर तपस्या करवाकर साधना पूर्ण कराई। उनके आश्रयदाता मैहर महाराज भी उनके स्थान पर आकर ही तबले की तालीम लेते थे।
एक बार का जिक्ऱ है कि जब राजा मैहर को ख़ाँ साहब सिखा रहे थे तो राजा का ध्यान शायद किसी और तरफ़ था और वे ठीक से बात को पकड़ नहीं पा रहे थे। ख़ाँ साहब के हाथ में तबले की हथौड़ी थी ही सो उन्होंने वही हथौड़ी राजा के हाथ पर, जिस जगह वे ग़लती कर रहे थे, ज़ोर से दे मारी जिससे राजा का अँगूठा टूट गया। अब तो एहसास होने पर ख़ाँ साहब ने अपना बिस्तर गोल कर लिया और सोचा कि ‘‘अब यहाँ नहीं रहना है क्योंकि जब राजा का अँगूठा मैंने तोड़ दिया है तो वह भी कुछ भी कर सकता है।’’ किन्तु राजा तो वास्तव में उनका क़द्रदान था। राजा ने कहा - ‘‘आपको मैं जाने न दूँगा। जब मेरी ग़लती थी तो आपने ठीक कराने के लिए ही तो मारा है। मुझे तो आपका मशकूर होना चाहिये। आप बिलकुल न घबरायें।’’ उसी रात राजा को अपने टूटे अँगूठे को जुड़वाने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर के पास इलाहाबाद जाना पड़ा। यह उस्ताद अल्लाउद्दीन ख़ाँ साहब के व्यक्तित्व का ही प्रभाव था।
वे राह-सड़क से अनाथ, ग़रीब, बेसहारा बच्चों को घर पर ले आते और उनको व्यस्त रखने की गरज़ से कोई न कोई खिलौना-साज़ पकड़ा दिया करते ताकि वे दिनभर आपस में सर न फोड़ते फिरें। यही लोग आगे चलकर भारत के सर्वप्रथम वृन्द-वादन मण्डल सुप्रसिद्ध मैहर-बैंड के वादक संगीतकार हुए जिनसे मैहर दरबार की आज तक शोभा होती है। वे अपने शिष्यों को अपने बच्चों की तरह प्यार व अनुशासन से रखते थे। वे भी उनको अपने पिता के समान मानते थे और अन्नपूर्णा देवी तथा अली अकबर खाँ की तरह से ‘बाबा’ कहकर ही पुकारते थे।
एक समय आया जब कि भारत में रियासतें समाप्त कर दी गयीं। अब भारत सरकार ने उनका राजकीय सम्मान ‘पद्मविभूषण’ सरीखी सर्वोच्च उपाधि देकर किया। अनेकानेक प्रशस्तिपत्रों से उन्हें विभूषित किया गया। मैहर में ही भारत सरकार ने एक बहुत बड़ी संस्था ‘‘उस्ताद अल्लाउद्दीन खाँ म्यूज़िक कॉलेज’’ के नाम से स्थापित की जिसमें बाबा आजीवन शीर्ष-स्थान पर रहे। जब उनकी आयु अधिक भी हो गई और वे संस्था में सशरीर न जा पाते थे तब भी सरकार उन्हें भेंटस्वरूप सम्मान-निधि (Honourarium) देती रही।
कितनी तमन्ना होती रही और कितने ही सपने देखे प्रिय मित्र ‘शरण’ के साथ मैहर जाने के। किन्तु उनकी देश-विदेश में कार्यक्रमों की व्यस्तता से वह ‘क्षण’ न ही आ पाया। भाग्य में साक्षात्-संगीत-ऋषि के आशीर्वाद न थे। किन्तु अन्तर की गहन अभीप्सा किस प्रकार दिव्य विधान में अनुत्तरित रह पाती! भागवत-वरदान स्वरूप हमारे आश्रम के तपोधनी संस्थापक-संचालक अपने व्यापारिक संस्थान के वसंत-पंचमी को स्थापना-दिवस के उपलक्ष्य में पूज्यनीय ‘बाबा’ की नगरी में जाने को थे। अदम्य अभीप्सा अनुरोध बन मचल उठी कि ‘‘ओह, चाचाजी आप मैहर जा रहे हैं। तो आप ‘बाबा’ - खाँ साहब अल्लाउद्दीन ख़ाँ साहब से अवश्य ही मिलकर आयें।’’ चाचाजी बोले - ‘‘कौन अल्लाउद्दीन खाँ? क्या करते हैं वे?’’
मैंने तड़पकर कहा - ‘‘चाचाजी वे हैं तो मैहर ‘मैहर’ है वरना वहाँ है क्या! आप अवश्य-अवश्य उनको मिलकर ही आयें।’’
सो कैसा हुआ वह मिलन? कौन जानता था कि पूज्य चाचाजी के माध्यम से उनके पुण्य-प्रताप की वजह से ही परम श्रद्धेय बाबा की ‘आशीष-तिहाई’ उनके द्वारा ही प्राप्त होगी। किसका आभार प्रगट करूँ और कैसे करूँ .......? नत-मस्तक हूँ।
- बस।
आज ख़ाँ साहब अल्लाउद्दीन ख़ाँ सशरीर हमारे बीच में नहीं है किन्तु उनकी प्रेरणामयी साधना-सृष्टि देश-विदेश में फल-फूल रही है जो संगीत-प्रेमियों में युग-युगों तक अपनी सुर-सुरभि बिखेरती रहेगी।
- करुणामयी
संयोग
ख़ाँ साहब अल्लाउद्दीन ख़ाँ केशरीर छोड़ने के दो-तीन साल पूर्व मुझे अपनी एक व्यावसायिक बैठक की अध्यक्षता करने के लिए मैहर जाना पड़ा था। यद्यपि मैं वहाँ जाना तो नहीं चाहता था परन्तु लोगों ने मुझे मजबूर किया और उन्होंने कहा कि मेरे जाने से वहाँ का वातावरण अच्छा बनेगा।
आग्रह
जब करुणाजी को यह पता लगा कि मैं मैहर जा रहा हूँ तब उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और मुझे कहने लगीं कि, ‘‘जब आप मैहर जा ही रहे हैं तो वहाँ संगीत जगत् की एक महान विभूति व अद्वितीय वयोवृद्ध कलाकार उस्ताद अल्लाउद्दीन ख़ाँ साहब से अवश्य मिलकर आयें। तभी आपका मैहर जाना सार्थक होगा।’’
मैंने कहा, ‘‘मैं तो उन्हें जानता नहीं। फिर संगीत में न तो मुझे कोई रुचि है और न ज्ञान। ऐसी अवस्था में मैं उनसे कैसे मिलूँगा और क्या बात करूँगा।’’
परन्तु करुणाजी ने फिर भी इसके लिए मुझसे बहुत आग्रह किया और मजबूर किया कि ‘‘चाचाजी आप अवश्य बाबा के दर्शन करके ही आयें।’’
जब मैं मैहर पहुँचा तो वहाँ मध्यप्रदेश के मेरे व्यापारिक संस्थान के बड़े-बड़े ऑफ़िसर मीटिंग के लिए आये हुए थे। सब लोग बड़ी उत्सुकता के साथ मेरा इन्तज़ार कर रहे थे।