पावन संस्मरण (भाग 1)
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कोका-कोला


कोका-कोला क्या है यह तो मुझे पता नहीं। क्योंकि, मुझे इस प्रकार की वस्तुओं से नफ़रत थी। परन्तु मैंने सुना था कि यह अमेरिका के एक फ़ॉर्मूले - नुस्ख़े से बनायी जाती है और उसकी मोनौपोली - पूर्णाधिकार मेरे प्रिय मित्र सरदार बहादुर मोहन सिंह ने लिया हुआ था - और केवल वही इसको बना सकते थे और बेच सकते थे।

सरदार मोहन सिंह और मैं तकरीबन एक ही उम्र के थे और इकट्ठे ही दिल्ली में आये। वह बढ़ई थे और उन्होंने फोरमैन की हैसियत से पी0 डब्ल्यू0 डी0 में नौकरी से ज़िन्दगी शुरू की और मैंने चूना बेचने के काम से। हम दोनों की ज़िन्दगियों की तरक़्क़ी का विस्तार तो अजीब है। उसके लिए तो हज़ारों पन्नों की पुस्तक चाहिए लिखने के लिए। परन्तु मैं तो कोका-कोला की बात बता रहा हूँ।

सरदार मोहन सिंह ने कोका-कोला को सर्वसाधारण में जन-प्रिय बनाने के लिए एक विशाल पार्टी का आयोजन किया जिसमें शहर के हज़ारों लोगों को बुलाया और ख़ूब कोका-कोला पिलाया। उस पार्टी की ख़ासियत यह थी कि उसमें केवल कोका-कोला था और कुछ नहीं।

उस भीड़-भड़क्के में मैं भी जा पहुँचा। क्या नज़ारा था बोतलें हाथ में और लोग धड़ाधड़ कोका-कोला की बोतलों-पर-बोतलें पिये जा रहे थे। कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसके पास कोका-कोला की बोतल न हो।

दूर से ही मेरे मित्र सरदार मोहन सिंह ने मुझे देखा और खुशी से भरे हुए मेरे पास आये। सारे मजमे में मैं ही एक ऐसा व्यक्ति था जिसके हाथ में बोतल नहीं थी। जब सरदार मोहन सिंह ने देखा तो चिल्लाकर बोले, ‘ओ! तेरी बोतल कहाँ है? तू क्यों नहीं कोका-कोला पी रहा?’’ (ओए! तेरी बोतल कित्थे है? तू क्यों नहीं कोका कोला पीरेआ?) ।

मैंने कहा, ‘‘मैं ऐसी गंदी चीज़ें नहीं पीता हूँ। मैंने अभी तक चाय नहीं पी, काफ़ी नहीं पी, किसी तरह की सोडे की बोतल नहीं पी।’’

तो सरदार मोहन सिंह ने न आगा देखा न पीछा, धड़ाधड़ मेरी पीठ पर मुक्के मारने शुरू कर दिये। और झट बोतल मँगवाकर मेरे हाथ में पकड़ाई और कहा, ‘‘इतनी पब्लिक में मेरी बेइज्ज़ती कर रहे हो। अब तो पियो नहीं तो मेरी बदनामी हो जायेगी। मेरे दोस्त क्या हुए? अगर तुम ही नहीं पियोगे तो और कोई क्यों पियेंगे?’’

मैंने कहा, ‘‘अच्छा बाबा पीता हूँ! तुमने तो मेरी पीठ ही तोड़ दी।’’

फिर भी मेरे से कोका-कोला पिया तो नहीं गया। हाँ, हाथ में बोतल जरूर पकड़े रखी।

कोका-कोला कैसा चला और क्या चला कि कोई ऐसा स्थान नहीं जहाँ कोका-कोला न बिकता हो। कोई ऐसा घर नहीं जिसमें न पिया जाता हो। कोई मेहमानबाज़ी पूरी नहीं होती जब तक कोका-कोला न परोसा जाये।

उन दिनों में मेरे पाँवों में पहिये लगे हुए थे। मैं शहर-शहर, जगह-जगह और घर-घर किसी-न-किसी सार्वजनिक काम से दौड़ता-फिरता था। जहाँ पहुँचूँ वहाँ पहले ही नौकर को या घर के बच्चे को आवाज़ लग जाये कि, ‘‘जौहर साहब आये हैं भागकर कोका-कोला लाओ।’’

मैं उस नौकर या बच्चे को बाहर निकलने से पहले ही पकड़ लूँ और कहूँ कि, ‘‘मुझे जल्दी है और मैं कोका कोला पीता भी नहीं हूँ। मुझे चार आने नक़द दे दीजिए।’’

उस ज़माने में शुरू-शुरू में कोका-कोला चार आने में ही बिकना शुरू हुआ था। - और आमतौर पर मुझे चार आने नक़द मिल ही जाया करते थे। - और इस तरह कुछ-न-कुछ आमदनी भी हो जाती थी।

अब क्या हुआ कि मदर्स इण्टरनेशनल स्कूल की कैन्टीन में कोका-कोला ज़ोरो से आ गया। बहुत बड़े-बड़े बोर्ड लग गए। दीवारों पर लिखा गया और कोका-कोला वालों ने एक बहुत बड़ा काउन्टर दिया जिसमें सैंकड़ों कोका-कोला की बोतलें रखने का प्रबन्ध था और मेरी ड्यूटी आधी छुट्टी (तफ़रीह Recess) के समय कैन्टीन की बिक्री पर होती थी।

नामालूम कैसे और किस साज़िश से कोका कोला प्रधान रूप से कैन्टीन में आ गया था। परन्तु मैं बच्चों को लगातार लैक्चर देता रहूँ और समझाता रहूँ कि, ‘‘यह बड़ी नुक़सानदेह चीज़ है और इसे कभी नहीं पीना चाहिए।’’ परन्तु कौन मानता है जबकि सारी दुनिया पी रही हो।

जब तक मैं काउन्टर पर खड़ा रहूँ तो बच्चों की कोका-कोला माँगने की हिम्मत न हो और ज्यों ही मैं हट जाऊँ तो बच्चे कोका-कोला पर टूट पड़ें और कोका-कोला की बिक्री सौ गुना हो जाये।

अब मुझे कई बहानों से वहाँ से उखेड़ दिया गया। क्योंकि मेरे खड़े रहने की वजह से कैन्टीन की सेल बहुत कम रह जाती थी।

यह है बदलती हुई दुनिया जिसे प्रगतिशील - प्रोग्रैसिव (Progressive) कहते हैं। इसका कोई इलाज नहीं - और ऐसी ‘प्रगति’ के सामने खड़ा होना या तो बाढ़ की लपेट में आना है या हिमालय से सिर टकराना है।

अब क्या बात हुई कि एक दिन किसी के हाथ से बोतल छूट गई और फ़र्श पर गिरकर टूट गई। सीमेंट का फ़र्श था, कोका-कोला सीमेंट के फर्श को खा गया और उसमें जगह-जगह गड्ढे पड़ गये। मैं देखकर बड़ा हैरान हुआ कि अगर सीमेंट के फ़र्श को खा सकता है तो मनुष्य के अन्दर यह क्या हाल करता होगा।

मैं पचास-पचपन साल से दमा (Chronic Bronchitis) का मरीज़ था। मुझे एकदम ख़याल आया - या यूँ कहूँ कि इलहाम हुआ कि मैं पीकर देखूँ। मैंने जो बोतल पी एकदम मेरी छाती से तमाम बलग़म बाहर आ पड़ी और मुझे खाँसी और दमा से क़ाफ़ी चैन हुआ।

मेरी वृत्ति ने कोका-कोला को पीना तो स्वीकार नहीं किया परन्तु कभी-कभी जब दमा और खाँसी की तकलीफ़ बढ़ जाये तो मैं उसको दवाई के तौर पर पी लूँ और मुझको उससे राहत मिल जाये।

भगवान् का क्या संसार है, क्या अद्भुत लीला है अब कोका कोला भी नहीं रहा सरदार बहादुर मोहन सिंह भी नहीं रहे और यह मुझे कभी याद भी न आया।

आज मुझे कोका-कोला कहानी के रूप में याद आया है।