पावन संस्मरण (भाग 1)

24. संगीत-ऋषि उस्ताद अल्लाउद्दीन ख़ाँ · Part 2 of 3

इच्छा

संगीत-ऋषि


ज्यों ही मैंने भरी सभा में उस्ताद अल्लाउद्दीन ख़ाँ से मिलने की अपनी इच्छा प्रकट की तो सब लोग एक साथ बोले - ‘‘नहीं, नहीं, बाबूजी, आप वहाँ बिलकुल न जाइये। वृद्धावस्था के कारण बाबा का दिमाग़ ठीक नहीं है और वे अपनी उस धुन में जो जी में आता है वही ऊटपटांग बकने लगते हैं। गालियाँ दे देते हैं और यहाँ तक कि डण्डा लेकर मार-पिटाई पर भी उतर आते हैं। उनका कुछ भरोसा नहीं।’’

निवेदन

फिर भी मैंने अपने लोगों से आग्रह किया कि, ‘‘आप दो-तीन आदमी पहले बाबा के पास चले जायें और उनसे निवेदन करें कि मैं दिल्ली आश्रम से आया हूँ और उनका दर्शन करना चाहता हूँ।’’

मेरे आग्रह करने पर कुछ अफ़सर लोग वहाँ गये और जैसे ही उन्होंने बाबा का दरवाज़ा खटखटाया कि वे खिड़की ख़ोलकर चिल्ला पड़े, ‘‘कौन आया है?’’

गालियाँ

जब लोगों ने उन्हें बताया कि, ‘‘हमारी कम्पनी के अधिष्ठाता (Chairman) दिल्ली से आये हुए हैं और आपसे मिलना चाहते हैं।’’ तो बाबा ने एकदम गालियाँ देनी शुरू कर दी और अपना डण्डा दिखाते हुए कहा कि, ‘‘उन्हें कहो कि फ़ौरन पहली गाड़ी से दिल्ली वापस चले जायें, मेरे पास हरगिज़ न आयें। मैं उनसे नहीं मिलना चाहता।’’

इस पर मेरे आदमियों ने उनसे बार-बार निवेदन किया और उनकी बड़ी आरज़ू-मिन्नत और खुशामद भी की। लेकिन उसका कुछ असर न हुआ। उल्टे बाबा और गुस्से में आ गये और उनकी गालियों की बौछार शुरू हो गई। वे लोग अपना-सा मुँह लेकर वापस आ गये।

आने पर लोगों ने सारा हाल मुझे विस्तार के साथ बताया और कहने लगे, ‘‘हमने तो पहले ही आपको कहा था कि वहाँ जाने पर ऐसा ही होता है।’’

मैं सब सुनकर चुप रह गया। - और शान्त हो गया।

थोड़ी देर बाद मैंने अपने लोगों से कहा, ‘‘अच्छा जैसे भी हो मैं तो अवश्य मिलने जाऊँगा।’’ अब वे सब लोग तो डर गये। पाँच-छः अफ़सर मेरे साथ हो लिए, शायद सुरक्षा हेतु कि मेरे साथ कोई दुर्व्यवहार न हो जाय, कहीं दुर्दशा ही न हो जाय। मैं आगे-आगे चल रहा था और वे लोग डरते हुए मेरे पीछे-पीछे आ रहे थे।

‘मदीना मंज़िल’ उनके निवास स्थान पर साक्षात्कार

वहाँ पहुँचकर मैंने दरवाजा खटखटाया। बाबा ने झट दरवाज़ा खोला। जब मैंने अपना परिचय दिया कि, ‘‘मैं श्रीअरविन्द आश्रम दिल्ली से आया हूँ।’’ तो बाबा नम्रता से मेरे पाँव पर झुककर कहने लगे, ‘‘आइये, आइये, तशरीफ़ लाइये।’’ बड़े अदब से जब मुझे अन्दर ले गये तो जो अफ़सर मेरे साथ थे वे देखकर हैरान हो गये। मेरे पीछे-पीछे वे भी अन्दर आ गये। बाबा हम लोगों को बैठक में ले गये जिसमें कई सोफ़ा-सैट और कुर्सियाँ लगी हुई थीं। उन्होंने हमें बड़े आदर से बिठाया।

गृह-दर्शन

थोड़ी देर बाद बाबा अपने-आप ही कहने लगे, ‘‘चलिये मैं पहले आपको अपनी कोठी दिखला देता हूँ।’’ उन्होंने हमें बाहर लाकर बतलाया कि, ‘‘देखिये ये ऊपर शारदा-माई का मन्दिर है और नीचे ही उनके क़दमों में मेरा स्थान है। यह सब शारदा माई की कृपा से है।’’

अब उन्होंने हमें अपनी कोठी एक तरफ़ से दिखलानी शुरू की। पहले शौचालय और स्नानगृह दिखलाये और फिर दिखाया कि, ‘‘देखो इनके ऊपर पानी का एक टैंक बना है। इसे भरने के लिए बिजली की मशीन कुएँ में लगी हुई है जिससे टैंक भर जाता है और पानी कोठी में हर जगह नलों से पहुँच जाता है।’’

गृहाधिष्ठात्री

इसके पश्चात् ‘‘उन्होंने अपना रसोईघर दिखलाया जिसमें उनकी वृद्धा धर्मपत्नी से, जो खाना बना रही थीं, हमारा परिचय भी कराया। वे हमसे बहुत अच्छी तरह मिलीं। बाबा कहने लगे कि, ‘‘यह बहुत अच्छी है। प्रतिदिन मेरे लिए खिचड़ी, दाल, सब्ज़ी बनाती हैं और इसी रसोईघर में नीचे ज़मीन पर ही मुझे गरमा-गरम खाना परोसकर खिलाती हैं।’’

हमने देखा कि रसोईघर में किसी तरह की कोई मेज़-कुर्सी या ऊँचे में बैठने का प्रबन्ध नहीं था। पुराने ज़माने की तरह ज़मीन पर मिट्टी के चूल्हे के सामने चटाई पर बैठकर चौकी पर रखकर वे खाना खाते थे।

अब बाबा ने हमें कोठी के बरामदों में से घुमाते हुए बारी-बारी से सब कमरे दिखाये। पहले बैठने का कमरा था। उससे आगे एक बहुत बड़ा कमरा था जिसमें संगीत के बीसियों तरह-तरह के साज़ रखे हुए थे और उन सबके ऊपर चादरें ढँकी हुईं थीं। उन्होंने एक-एक चादर उठाकर हमें ये सभी वाद्य-यंत्र दिखाये और उनके नाम भी बतलाये।

आज़ाद पंछी

अचम्भे की एक यह भी बात थी कि सभी लम्बे-चौड़े बरामदों में बीसियों टोकरियाँ-सी लटक रही थीं और हरेक में भाँति-भाँति के पक्षी बैठे हुए थे। वे पक्षी अपनी-अपनी ज़बान में अपना-अपना राग अलाप रहे थे। वे आपस से बातचीत कर रहे थे अथवा दाना चुग रहे थे। मैं यह सब देखकर हैरान हो गया और बाबा से पूछा कि, ‘‘आप इन सबको कैसे सँभालते हैं।’’ उन्होंने कहा कि, ‘‘ये सब पक्षी तो अपने-आप अपने घर में रहते हैं। हम तो उनके लिए केवल खाना और पीने के लिए पानी बीच में रख देते हैं बस। ये सब आज़ाद हैं, इनके लिए कोई बन्धन नहीं है।’’

साधना-सदन

फिर उन्होंने ऊपर ले जाकर हमें वे कमरे दिखाये जिनमें रहकर उनके शिष्यों ने संगीत की साधना की थी। बड़े प्रेम से उन्होंने बताया कि, ‘‘यहाँ रविशंकर रहता था, यहाँ अली अकबर और यहाँ अन्नपूर्णा देवी आदि-आदि।’’

सत्कार

अब वे हम सब लोगों को पुनः अपनी बैठक में ले गये। बिठाया और चाय, बिस्कुट आदि मँगवाये और खूब अच्छी तरह हमारा आदर-सत्कार किया।

आशीर्वाद

इसके बाद मैंने बाबा जी से कहा कि, ‘‘हमारे श्रीअरविन्द आश्रम में एक संग़ीत-साधिका हैं कुमारी करुणामयी। उसी ने आपके बारे में मुझे बतलाया और मुझसे कहा कि, ‘‘आप मैहर जा रहे हैं तो बाबा से अवश्य मिलकर आना।’’ उन्हीं के कहने पर मैं आपसे मिलने आया हूँ। करुणामयी ने मुझे यह भी बताया है कि उनकी सहेली और सहपाठिनी शरणरानी ने कई वर्षों तक आपके चरणों में बैठकर ही सरोदवादन की शिक्षा ली है।’’ यह सुनकर बाबा बहुत प्रसन्न हुए और दोनों हाथ उठाकर कहा कि, ‘‘उसे आप मेरा आशीर्वाद कहिये। आशीर्वाद! आशीर्वाद!! आशीर्वाद!!!1

आयु

अब मैंने पूछा, ‘‘बाबा आपकी आयु कितनी होगी?’’

तुरन्त जवाब दिया, ‘‘तीन सौ बरस।’’

मैंने कहा, ‘‘बाबा गवर्नमेंट के हिसाब से तो आपकी आयु एक सौ तीन (103) वर्ष है।’’

तो उन्हें बहुत गुस्सा आ गया और गवर्नमेंट को हज़ारों-हज़ार गालियाँ दे दीं और कहा कि, ‘‘गवर्नमेंट को क्या मालूम? अपनी उम्र खुद मैं जानता हूँ या गवर्नमेंट जानती है!’’