24. संगीत-ऋषि उस्ताद अल्लाउद्दीन ख़ाँ · Part 3 of 3
संगीत साधना
संगीत-ऋषि
अब मैंने पूछा, ‘‘आपने प्रारम्भ से सरोद और वायलिन आदि बजाना कहाँ से सीखा? और कैसे आपको इतनी पूर्णता और निपुणता आई?’’
बाहुलीन
तो वे बड़ी शान्तिपूर्वक विस्तार से बतलाने लगे कि, ‘‘यह वायलिन नहीं है इसका नाम तो है बाहुलीन।’’ और वे झट अन्दर से अपनी बाहुलीन उठाकर ले आये और गज़ पकड़कर बतलाया कि, ‘‘यह साज़ मैंने रावण से सीखा है। मैं कई वर्ष लंका में रावण के महल में रहा हूँ। रावण मुझे सिखाते थे और उनकी धर्मपत्नी रानी मन्दोदरी अपने हाथ से खाना बनाकर मुझे बहुत प्यार से खिलाया करती थीं।
रावण-संगीत गुरु
‘‘रावण मुझे तालीम (शिक्षा) देते थे और कई घंटों मुझसे रियाज़ करवाते थे। फिर वे सुनते थे कि दिन-प्रतिदिन कैसी मेरी तरक़्क़ी हो रही है। इस तरह मुझे मौसीक़ी में (संगीत में) कुछ ज्ञान हुआ।’’
रावण से सीखने के ज़माने की और भी कितनी बातें उन्होंने बतलाई जो सब मुझे अब याद नहीं हैं और न ही उनको लफ़ज़ों में बयान ही कर सकता हूँ।
सच्चे भगवद्भक्त
शायद दो घण्टे से भी अधिक हम उनके पास बैठे रहे और बातचीत होती रहीं। उनके इस बैठक (सिटिंगरूम) की चारों तरफ की दीवारें बेतहाशा नीचे-ऊपर, दायें-बायें चित्रों से भरी हुई थीं। एकाएक बाबा उठे और हमें दिखाने लगे कि ‘‘यह देखो! श्रीअरविन्द की फोटो है’’! और दूसरी दीवार पर . . . .‘‘यह माताजी की फ़ोटो है!’’ और बाक़ी सब फ़ोटो भारतवर्ष और संसार के सारे तीर्थ-स्थानों, देवी-देवताओं, पीर-पैग़म्बरों, साधु-सन्तों, ऋषि-मुनियों और सभी धर्मों व मज़हबों के प्रवर्त्तकों की थीं- जैसे मक्का, मदीना, येरुशलम, सारनाथ, अयोध्या, काशी, पुरी, मथुरा, वृन्दावन, नवद्वीप आदि की और राम, कृष्ण, ईसामसीह, महात्मा बुद्ध, स्वामी दयानन्द सरस्वती, श्रीरामकृष्ण परमहंस, शारदा-माँ, आनन्दमयी माँ, विवेकानन्द, सुभाष बोस, गाँधीजी, नानक, सूर, तुलसी, कबीर आदि के चित्र थे। शायद ही कोई छूटी हो। वे कहने लगे - ‘‘अपने जीवन में जहाँ -जहाँ मैं जाता रहा हूँ वहाँ -वहाँ से ये सब फ़ोटो लाता रहा हूँ।’’ फिर वे शारदा-माँ की स्तुति करने लगे और कहा कि - ‘‘देखो मैं तो जो कुछ हूँ शारदा-माँ के ही कारण हूँ। और मैंने वर्षों शारदा माँ के स्तनों से दूध पिया है।’’ अपने ओठों से ‘पुच’ - ‘पुच’ करके उन्होंने भाव-विभोर होकर बतलाया और समझाया कि - ‘‘मैं इस तरह से शारदा-माँ का दूध पीता रहा।’’ इस दृश्य के पश्चात् जब हम लोग फिर बैठ गये, मैंने बाबा से कहा - ‘‘आप कृपया अपनी कोई चीज़ यादगार के तौर पर मुझे दें।’’ इस पर वे एकदम बहुत भुन्नास और नाराज़ हो गये। उन्होंने शायद यह समझा कि मैं उनका कोई साज़ माँगने की फ़िराक़ में हूँ। एकदम क्रोध में आकर कहने लगे - ‘‘मैं हरगिज़, हरगिज़ अपना कोई साज़ नहीं दे सकता हूँ।
मैंने समझाते हुए कहा - ‘‘बाबा जी आप घबरायें नहीं। न ही नाराज़ हों। मैं कोई साज़ बिलकुल नहीं माँगता हूँ। बस आप अपनी कोई भी चीज़ निशानी के तौर पर दे दीजिये।’’ तब वे परेशान होने लगे और कहने लगे - ‘‘भला मैं क्या चीज़ दे सकता हूँ? मैं तो कोई भी चीज़ नहीं दे सकता हूँ।’’ मैंने कहा - ‘‘बाबा जी, आप अपनी यह कमीज़ ही उतारकर दे दीजिये।’’ तो वे और भी रोष में आ गये और तेज़ होने लगे। ‘‘वाह! यह कमीज़ तो मेरी सौ वर्ष की है। यह मैं कैसे दे सकता हूँ?’’ तो मैंने कहा - ‘‘अच्छा तो आप तहमद ही दे दीजिये।’’
अब तो वे और गुस्से में होने लगे कि - ‘‘अरे मैं अपनी तहमद उतार कर कैसे दे सकता हूँ।’’ इसी गुस्से में उन्होंने अपने सिर से सुरमई रंग की नीली-सी मारकीन की टोपी उतारी और ज़ोर से मेरे ऊपर दे मारी।
मैं तो ख़ुश हो गया और टोपी झट मैंने अपनी जेब में रख ली। अब वह अपनी टोपी की तारीफ़ करने लगे कि - ‘‘यह मारकीन की टोपी सादगी, इज्ज़त व आबरू की निशानी है। नब्बे वर्ष की है। और ख़ास तौर पर रंग - यह आसमानी रंग की है और मुझे यह रंग बहुत ही पसंद है। भगवान कृष्ण का भी तो ऐसा ही रंग था! लो यह मैं तुम्हें देता हूँ।’’
इजाज़त - इखलास
अब हम सब लोगों ने इजाज़त माँगी। उनकी बहुत-बहुत प्रशंसा की और उनको हृदय से धन्यवाद दिया और हम उठकर बाहर की तरफ चलने लगे। बाबा हमारे साथ-साथ बाहर आये और जबकि सारे बाग़ के आँगन में काँटे ही काँटे थे - वे नंगे पाँव हमें बाहर तक छोड़ने के लिए चले आये।
इतने में हममें से किसी सज्जन ने मेरे कान में चुपके से कहा, ‘‘बाबूजी! अगर बाबा के साथ एक फ़ोटो खिंच जाय तो कितना अच्छा हो!’’ उनके पास कैमरा था। मैंने झट बाबा से पूछा कि, ‘‘बाबाजी, हम लोग आपके साथ एक फ़ोटो खिंचवाना चाहते हैं।’’ वे बग़ैर किसी हील-हुज्जत के एकदम राज़ी हो गये और साथ में खड़े हो गये। मिनटों में बाबा के साथ हमारे ग्रुप-फ़ोटो खिंच गये।
फ़ोटो और बाबा की टोपी मेरे पास आज भी सुरक्षित हैं। मैं सोच रहा था कि इन्हें किसी गवर्नमेंट के संग्रहालय, अजायबघर (Museum) में दे दिया जाय। जिससे कि इनकी स्मृति स्थायी रूप से विरासत के तौर पर बनी रहे।
टकटकी
अब जब हम लोग मोटर में बैठने लगे तो बाबा ने अजीब लीला दिखायी कि झुककर मेरे पाँव छू लिए और मुझे मोटर में बिठाया। - और जब तक हम लोग चले नहीं गये बाबा वहीं खड़े हम लोगों को टकटकी लगाये देखते रहे।.....
लीला
अब मैं जब अपने व्यवसाय के स्थान पर पहुँचा तो मेरे साथियों ने यह सारी आश्चर्यभरी कहानी सभा में सुनाई।
यह है भगवान् की कृपा और भगवान् की लीला।