मेरे दादा का कोट-2
परन्तु कोट उनका अपना नहीं था। उनके चचेरे भाई ने उनको दिया था, परिवार में एक बारात में जाने के लिए। मेरे दादा के चचेरे भाई बहुत अमीर थे। राजों-महाराजों से भी अमीर, नहीं तो उनसे कहीं कम न थे। फिर भी उनके मन में धारणा थी कि बारात में जाने के बाद उनका कोट उन्हें लौटा दिया जायेगा।
परन्तु मेरे दादा ने कोट अन्दर सम्भाल लिया और कभी वापस नहीं किया और कभी-कभी किसी अच्छे मौक़े पर शान दिखाने के लिए निकाल कर पहन लिया करते थे। परन्तु उनके मन में ध्येय यह था कि कोट कहीं मैला या ख़राब न हो जाये और आगे मेरी सन्तान भी इसको पहने।
मेरे दादा का जब स्वर्गवास हो गया तो बहुत सालों के बाद मेरी दादी ने उस कोट को ढूँढ निकाला और सम्भाल कर रख लिया। फिर एक समय ऐसा आया जब मेरी दादी बहुत खुश थी तो कोट उसने अपने सबसे बड़े बेटे को दे दिया जो कश्मीर में नौकरी करते थे ताकि वहाँ वे ठण्ड से बच सकें। मेरी दादी अपने बेटे को इस शानदार कोट में देखकर फूली न समाती थी और यह भी बड़ी सान्त्वना और सन्तोष था कि मेरे बेटे को कश्मीर में ठण्ड नहीं लगेगी। कोट एक प्रकार से परिवार का प्रतीक बन गया था।
मेरी दादी के बड़े बेटे तो मेरे ताऊ थे और अब तक उन्होंने अपना एक कोट भी बनवा लिया था। एक दिन खुशी में आकर वह कोट उन्होंने मेरे पिता को दे दिया। मेरे पिता बहुत उदार थे। कुछ ही वर्षों बाद उन्होंने अपने छोटे भाई यानी मेरे चाचा को दे दिया। मेरे पिता ने इस कोट को इतनी चेतना और सावधानी के साथ पहना कि जब मेरे चाचा को दिया तो उस समय वह बहुत सुव्यवस्थित था और उसका रंगरूप बहुत अच्छा था।
मेरे चाचा ने यह कोट शौक़ से और बहुत वर्षों तक पहना परन्तु उनके मन में यही भावना रहती थी कि कब मेरे बेटे बड़े हों और कोट उन्हें दूँ, परन्तु उनके बच्चे अभी बहुत छोटे-छोटे थे।
इस बीच मैं बड़ा हो गया और मुझे लाहौर भेजा जाने लगा। मेरे चाचा बहुत आश्चर्य और निपुणता से बग़ैर किसी को पता दिये एक दर्ज़ी के घर में चले गये और अपने सामने बैठकर उस कोट को उधड़वा डाला (खुलवा डाला) और उल्टा करवा कर उसको फिर सिलवाया। यह नया कोट प्रेम से लाहौर ले जाने के लिए मुझे दे दिया और कहा कि, ‘अभी पहन ले, रास्ते में गाड़ी में ठण्ड होगी।’ मैंने कहा - ‘गाड़ी में खराब हो जायेगा।’ और कोट को तह करके अपने ट्रंक में रख लिया।
मैं इस कोट को लाहौर में पहनने की अपनी कहानी फिर बताऊँगा। अब मैं एक बार फिर अपने पिता जी की कहानी बताता हूँ जिन्होंने यह कोट चार-पाँच साल पहना था। गाँव में ऐसी चर्चा होने लगी कि काहनचन्द जब यह कोट पहनते हैं तो वे उड़ सकते हैं। परन्तु सत्य यह था कि मेरे पिताजी गाँव से अठारह मील दूर (बीच में बहुत बड़े, गहरे और भयानक झेलम दरिया को पार कर) आर्य स्कूल ‘भेरा’ में पढ़ने जाते थे और होस्टल में रहते थे। हर शनिवार की शाम को वे गाँव वापस आ जाते थे और रविवार शाम को अगले सप्ताह का राशन, घी और आटा-दाल लेकर चले जाते थे। उस कोट में वे इतनी शान और अहंकार में आ जाते थे कि उनके पाँव ज़मीन पर नहीं टिकते थे और वे उससे प्रेरित व उत्साहित होकर उड़ते-से चलते थे तथा उतना लम्बा और कठिन रास्ता बहुत कम समय में पार कर जाते थे।
उस युग में फ़ैशन नहीं उतरे थे। नाप और कोट की फ़िटिंग का ख्याल नहीं किया जाता था। शरीर को ठण्ड से बचाने की बात ही ख़ास होती थी।
परन्तु आज के ज़माने के लोगों को आश्चर्य होता होगा और स्वभावतः वे पूछेंगे कि छोटे-बड़े, बाप-बेटे और चाचा-ताऊ का कोट कैसे फ़िट हो जाता था। परन्तु यह भी साधारण बुद्धि की बात है। नीचे से जितना लम्बा हो उसको उतना पलट देकर अपने साइज़ का करके सिल दिया जाता था और इसी तरह जब हर साल बड़े होते जाते तो एक-एक पलट खोलते चले जाते और कोट लम्बा होता जाता। यही बात बाहों की होती थी। वे भी उल्टा लपेट देकर कम कर ली जाती थीं और उसी तरह उनको बढ़ा भी लिया जाता था। ऐसा करते-करते इस कोट को मैंने आठवीं क्लास से ग्यारवीं क्लास अथवा डी.ए.वी. कालेज में भी पहना। तभी महात्मा गाँधी की आन्दोलन-कृपा से कॉलेज छोड़ना पड़ा और एक साल नेशनल कॉलेज लाहौर में रहकर कोट समेत दिल्ली आ गया।
दिल्ली में तो कोई ठिकाना या सहारा ही नहीं था, सर्दियों में यह कोट ही एक सहारा था। तीन-चार साल बाद हमारे पास गाँव के पड़ोसी गाँव से एक विधवा अपने दो लड़कों को लेकर दिल्ली आ गयी और मेरा सहारा लिया। मैंने उन दो लड़कों की शिक्षा का प्रबन्ध कर दिया। बड़ा लड़का नन्दलाल तो दसवीं पास करके नौकर हो गया और छोटा मेहरचन्द बहुत ही तीव्र बुद्धि का और योग्य था। वह कॉलेज में भर्ती हो गया और बी.ए. भी पास कर गया। एक दिन जब वह अभी कॉलेज में भर्ती ही हुआ था और सर्दियों के दिन थे, मैंने अपना कोट उतार कर मेहरचन्द को दे दिया और वह उसे सारी कॉलेज-शिक्षा तक पहनता रहा।
इस बीच मेहरचन्द अपना निर्वाह करने के लिए इधर-उधर पढ़ाता भी था। इन दिनों में वह नया बाज़ार में एक धनवान व्यापारी की लड़की को ट्यूशन पढ़ाने लगा और दो-तीन साल के अन्दर उसी लड़की से शादी करली और सेठजी का जमाई बन गया और बड़ा धनवान हो गया तथा बम्बई में जाकर रहने लगा। अब उसको कोटों की क्या कमी थी - नये से नये फ़ैशन के कोट।
मुझे अफ़सोस इस बात का है कि इस प्रकार यह 60 साल का ख़ानदानी कोट मेरे हाथ से निकल गया।
ये थे पुराने ज़माने के फ़ैशन और कोट परन्तु आजकल....