स्थिति
पन्द्रह-बीस साल की बात है, श्रद्धेया आनन्दमयी माँ अस्वस्थ हो गईं। यहाँ’ अपने आश्रम में। संभवतः दमा के आक्रमण ने परेशान कर रखा था। ख़बर मिलते ही मैं भी देखने गया।
माताजी ने तीव्र इच्छा प्रकट की कि उन्हें तुरन्त कहीं गंगा के किनारे पहुँचाया जाये क्योंकि वे गंगा के अतिरिक्त कहीं दूसरे स्थान पर प्राण-त्याग नहीं करना चाहतीं।
उसी समय सेठ बिड़लाजी के यहाँ ख़बर पहुँचाई गई। तो तुरन्त बहुत बड़ी मोटर-गाड़ी का प्रबन्ध उनको गंगा पर पहुँचाने के लिए कर दिया गया। एक अच्छे वैद्य और डॉक्टर भी साथ भेजे गये।
उस दिन से मेरी इच्छा बनी रही कि मैं माताजी को उनके स्थान पर देखकर आऊँ। पता किया कि वे हरिद्वार के निकट सप्तऋषि आश्रम में ठहरी हुई हैं।
कुछ ही दिनों में मैंने वहाँ जाने का निश्चय किया।
क्या संसार है!
जब मैं हरिद्वार ऋषिकेश की सड़क पर जा रहा था तो कुछ हलचल और शोर सुनाई दिया और एक पुलिस के दस्ते को भागते जाता देखा।
सड़क पर एक सज्जन खड़े थे, मैं उनसे पूछने के लिए रुका। तो वे दिल्ली के परिचित यूनिवर्सिटी के इंजीनियर निकले। रायबहादुर नारायणदास। वे किसी सवारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। पूछने पर पता लगा कि ऋषिकेश में गंगा-पार दो आश्रमों के गुटों में जमकर लड़ाई हो रही है। इंजीनियर साहब बीच-बचाव के लिए वहां पहुँचना चाहते थे। मैं अपनी मोटर में बैठाकर उनको ले गया।
लड़ाई काफ़ी हो चुकी थी और ख़ासी मार-पिटाई भी हुई थी और अब झगड़ा ठंडा हो रहा था।
परन्तु मेरा वहां ठहरने को जी नहीं चाहा और न ये जानने की इच्छा हुई कि यह लड़ाई कौन-कौन से आश्रमों के बीच में हो रही थी, झगड़ा क्यों हुआ और कितनी हानि हुई?
मैं इंजीनियर साहब को वहां छोड़कर वापस चला आया क्योंकि मेरा ध्यान आनन्दमयी माताजी को मिलने की तरफ था। और मन में दुःख भी हो रहा था कि क्या ये आश्रम हैं और क्या यह संसार है?
इसी सोच-विचार की अवस्था में मैं सप्तऋषि आश्रम पहुँचा तो अचानक ही सामने एक बरामदे में माताजी बैठी हुई दिखाई दीं। मैंने प्रणाम करके पूछा - ‘‘माताजी आपका स्वास्थ्य अब कैसा है?’’
माताजी ने इतने सहज, सौम्य और सरल भाव से उत्तर दिया - ‘‘मैं तो स्वस्थ और आनन्द में हूँ इस शरीर को कभी-कभी दुःख हो जाता है।’’
यह सुनकर मेरी आत्मा को बहुत आनन्द हुआ कि यह है श्लाघनीय स्थिति।
और ऋषिकेश के गंगा पार के आश्रमों की लड़ाई-झगड़े को भी भूल गया।