पावन संस्मरण (भाग 1)
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लंच


मेरे मान्य मित्र केन्द्रीय मन्त्री के पद के थे, यद्यपि वे मन्त्री बनने से बच गये। उन्होंने कभी उसकी इच्छा नहीं की और जब-जब उन्हें मन्त्री-पद ग्रहण करने का निमन्त्रण दिया गया उन्होंने सदा अस्वीकार कर दिया।

निस्सन्देह, ‘‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’’ (University Grants Commission) के वे निरन्तर दस वर्षों तक अध्यक्ष (चेयरमैन) रहे।

वे हमारे देश के ही क्या संसार के जाने-माने शिक्षाविद हैं। अब मैं उनका नाम बता ही दूँ, क्योंकि भला कब तक मैं पाठकों को अधर में टाँगे रख सकता हूँ। वे हैं डॉक्टर दौलतसिंह कोठारी जो कि डॉक्टर डी. एस. कोठारी के नाम से विश्व में प्रसिद्ध हैं। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के सन्दर्भ में उनका नाम सबसे पहले लिया जाता है - ‘‘कोठारी कमीशन’’ के रूप में।

डॉक्टर कोठारी विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा सम्मानित किये जाते रहे हैं। भौतिकी विज्ञान (Physics) के क्षेत्र में उनकी मौलिक खोजों व अमूल्य अंशदान को देखते हुए अनेकों देशी व विदेशी विश्वविद्यालयों द्वारा उन्हें उच्चतम उपाधियों व डिग्रियों से सम्मानित किया गया है। मुझे तो डिग्रियों व उपाधियों की बहुत समझ नहीं है इसलिए मैं विशेष व स्पष्ट रूप से तो इस विषय में कुछ बता नहीं सकूँगा। अभी हाल ही में इण्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी, नयी दिल्ली द्वारा जो आश्रम के ठीक सामने है, उनको उच्चतम उपाधि द्वारा सम्मानित किया गया है।

साधु-स्वभाव, सरलता, निश्छलता व सादगी में असामान्य रूप से वे अपवाद ही हैं। मैंने ऐसा निपट सरल व्यक्ति अपने जीवन में दूसरा नहीं देखा। अहंकार तो मानो उनके निकट आते ही डरता है।

एक दिन प्रातःकाल मैंने उन्हें टेलीफ़ोन किया, ‘‘क्या हो गया? अरे कल शाम तक तो आप अच्छे ख़ासे ठीक-ठाक थे। और सोकर उठे तो सुबह आप केन्द्रीय मंत्री बन गये।’’

वे तो हैरान हो गये। मैंने फिर कहा, ‘‘अरे भाई आप नहीं जानते कि आप खाद्य मन्त्री नियुक्त कर दिये गये हैं! अब तो आपको देश भर के मत्स्य-ग्रहण संस्थानों, कुक्कुट खेती, बूचड़ख़ानों का संयोजन व निर्देशन करना होगा।’’

वे जैन-मतावलम्बी हैं। घबरा गये। परन्तु बहुत जल्द ही वे मेरे स्वर व बोलने के ढंग से समझ गये कि मैं ज़रा मज़ाक ही कर रहा था। उन्हें चैन आया। खूब हँसे।

वे दिल्ली विश्वविद्यालय में भौतिकी विज्ञान के अप्रतिम प्राध्यापक थे। उनके विद्यार्थी उन्हें बेहद चाहते व मानते थे, बल्कि यूँ कहें कि उनकी पूजा करते थे। यहाँ तक कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष-पद का गुरु भार ग्रहण करने पर भी उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में भौतिकी विज्ञान की कक्षाएँ लेने का सिलसिला क़ायम रखा और सप्ताह में एक बार तो विश्वविद्यालय अवश्य पढ़ाने जाते ही रहे।

वे अपनी धर्मपत्नी सहित मेरे पास अक़्सर आया करते थे। साथ में कभी-कभी नाती-पोते भी होते थे। जब मैं उनसे उनके आगमन का सबब पूछता तो वे सदा कहते, ‘‘मैं तो आपके दर्शनों के लिए आ जाता हूँ और अपने भारी व सख़्त काम से उत्पन्न हुई थकान से मुक्ति पा लेता हूँ। बल्कि अपनी बैटरी को चार्ज करवा लेता हूँ।’’ मैं कहता, ‘‘भाई मैं कोई प्रस्तर-प्रतिमा तो हूँ नहीं जो आप मेरे दर्शन करने आते हैं।’’ - और बस हँसी-मज़ाक का दौर शुरू हो जाता जो घण्टों चलता रहता, जिससे उनका मनोरंजन हो जाता, दिल खोलकर हँसते और तनाव से मुक्ति हो जाती।

अब हर बार एक गम्भीर क्षति!

उनकी सन्त-स्वभावा व अभिजात्या देवी-स्वरूपा धर्मपत्नी, ज्यों ही उन्हें ठीक समय मिलता - मनोवैज्ञानिक अवसर, वे कहतीं, ‘‘जौहर साहब, क्या आप कृपा करके अपने नर्सरी स्कूल के चिड़ियाघर से दो बन्दर मुक्त कर देंगे? - और हाँ बेचारे तोते और कबूतर भी . . . उन्हें उड़ा दीजिए न?’’ मैं भली-भाँति उनकी कोमल भावना को समझता था कि एक सच्ची व पक्की जैन मतावलम्बी महिला होने के नाते वे बन्दरों व पक्षियों को पिंजरे में देखकर प्रसन्न नहीं होती थीं।

उनकी प्रसन्नता के लिए मुझे हर बार बन्दर, तोते व कबूतर सभी मुक्त कर देने पड़ते थे। वे अत्यन्त प्रसन्न हो जातीं और इस कारण वे मुझे बहुत पसन्द करती थीं। वे अत्यधिक स्नेह भी करती थीं।

पर भला हिमालय से कौन अपना सिर टकरा-टकराकर फोड़े? कौन समय की बाढ़ के विरुद्ध खड़ा होकर उसे आने से रोक सकता है? शीघ्र नर्सरी स्कूल के अधिकारीगण दुबारा नये बन्दर, तोते और कबूतर ले आते जो उनके लिए ज़रा भी कठिन नहीं था - और चिड़ियाघर फिर से आबाद हो जाता। यही चक्र तो संसार के सभी क्षेत्रों में चल रहा है।

एक दिन मैं उनके पास उनके विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के दफ़्तर में बैठा था, काफ़ी देर हो गई थी, यहाँ तक कि दोपहर के खाने का वक़्त - लंच टाइम हो गया। मैंने उन्हें कहा, ‘‘ओह! अफ़सोस कि मैंने आपको बहुत देर करा दी। अब यह तो ‘लंच’ का समय है और आपको लंच के लिए जाना होगा। आप अपने घर जाते हैं या अपना लंच यहाँ कैन्टीन से मँगवा लेते हैं?’’

वे बोले, ‘‘मेरा घर तो बहुत ही दूर है और कैन्टीन का लंच मैं कैसे बरदाश्त कर सकता हूँ? न तो मैं अपने घर जाता हूँ और न ही अपना खाना कैन्टीन से लेता हूँ।

मैंने चौंककर पूछा, ‘‘अरे! तो क्या भूखे रहते हैं?’’

वे ज़रा मुस्कराये। अपनी जेब में हाथ डाला और एक छोटा पैकट निकाला, फिर उसे खोला। एक प्लास्टिक के लिफाफे में एक और मोटा लिफाफा था। शायद उसमें फोम या रुई भी भरी थी। उसे खोलने पर उसमें से एक चपाती, तहियाई हुई निकली। वे बोले, ‘‘यह मेरा लंच है!’’

मैं तो दंग रह गया। बोला, ‘‘आप. . .! आप इतना कम खाते हैं! केवल एक चपाती और साथ में कुछ भी नहीं?’’

वे बोले, ‘‘नहीं, यह नमकीन है और बड़ी स्वादिष्ट है। जब मेरी मीटिंग भी चल रही होती है तब भी मैं यह पैकेट अपनी जेब से निकाल लेता हूँ और साथ-साथ लंच भी खा लेता हूँ - और देखिए न, आप तो जानते ही हैं कि अगर बहुत खा लूँ तो फिर काम कैसे करूँ?’’

आह! मेरे पास तो शब्द ही नहीं हैं, कैसे व्यक्त करूँ . . . ‘‘यह लंच है!’’