स्थित-प्रज्ञ
एक दिन मुझे ख़बर मिली और मैं चौंक गया कि माँ आनन्दमयी बहुत अस्वस्थ हैं। वे खाँसी और दमा के गंभीर आक्रमण (attack) से पीड़ित हैं। मैं तुरन्त उनके यहाँ आश्रम में पहुँचा। मालूम हुआ कि वे कह रही हैं कि “मुझे तुरन्त गंगा-तट के किसी स्थान पर पहुँचाया जाये। मैं गंगा-तट के सिवाय कहीं और शरीर छोड़ना नहीं चाहती।”
तुरन्त ही सेठ जुगलकिशोर बिड़ला की तरफ़ से एक बहुत बड़ी मोटर-कार आ गई और उसमें माँ की रास्ते में देखभाल के लिए धुरंधर वैद्य और डॉक्टर भी साथ में किये गये। एकदम माँ को बिठाकर कहीं हरिद्वार गंगाजी के किनारे ले गये।
मुझे चैन नहीं हुआ और कुछ ही दिनों में मेरी प्रबल इच्छा हुई कि जहाँ भी हों मैं माँ को देखकर आऊँ।
हरिद्वार जाकर पता लगा कि वे सप्तऋषि-आश्रम में ठहरी हुईं हैं। खोजते-खोजते मैं वहाँ पहुँचा तो देखा कि माताजी सप्तऋषि आश्रम की एक कुटिया के बरामदे में बैठी हुई हैं।
मैंने उनके पास पहुँचकर प्रणाम किया और पूछा, “माताजी आपका क्या हाल है? आप कैसी है?”
माताजी कहने लगीं, “मैं तो सर्वदा आनन्द में हूँ इस शरीर को कभी-कभी कष्ट हो जाता है।”
यह सुनकर, उनको देखकर और उनके पास कुछ देर बैठने के बाद मुझे अपार आनन्द हुआ कि ऐसी स्थित-प्रज्ञा भी हो सकती हैं।