पावन संस्मरण (भाग 1)
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भिक्षा-वृत्ति


मैं आज लगभग पचास साल के बाद अपना भण्डा खुद ही फोड़ रहा हूँ।

एक दिन बैठे बिठाये मन में एक तरंग उठी और ख़्याल आया कि मैं पैदा तो नंगा ही हुआ था, माँ के पेट में पला, परन्तु माँ-बाप को यह तो नहीं मालूम था कि किसको पैदा कर रहे हैं। परन्तु इस घटना को रूप देनेवाली तो कोई और ही शक्ति है जिसका अभी तक किसी को ज्ञान नहीं हुआ उसको निर्माता कह लीजिये या ईश्वर - या हज़ारों में से किसी और नाम से पुकार लीजिये। तो यह शरीर दिया है उसने नंगा - अलफ़ नंगा।

यदि यह शरीर उसने दिया है तो उसके पश्चात् सुन्दर सुन्दर कपड़े सिर के लिए टोपी, पाँव के लिए जूता यह भी सब उसी ने दिया है चाहे निमित्त कोई भी बने हों - माँ-बाप, चाचा-ताऊ दूसरे सम्बन्धी या दूसरे रिश्तेदार या दोस्त यार।

तो हमें मंज़ूर करना पड़ता है कि सब कुछ उसी का दिया है - रुपया-पैसा, धन-दौलत, जायदाद-मक़ान, बाग़-बग़ीचे, नौकर-चाकर, मेज़-कुर्सी, पलंग, मोटर-गाड़ी इत्यादि। ज्यों ही आगे आगे यह सब कुछ मिलता है तो हम इसके मालिक बन बैठते हैं परन्तु कितनी देर के लिए? कितनी ज़िन्दगी है यह भूल जाते हैं।

मुझे अब ख़्याल आया कि अपना पर्दा आज खुद ही फ़ाश कर दूँ।

मेरी आयु उस समय तीस और पैंतीस वर्ष के बीच रही होगी जबकि मैंने शीघ्रता के साथ निश्चय किया, कि मैं आज से भिक्षा पर रहूँगा, परन्तु किसी को बताऊँगा नहीं। कहीं ऐसा न हो कि फ़ेल हो जाऊँ और बदनामी हो, दुर्दशा हो।

कई महीने बग़ैर बतलाये बेशर्म होकर लोगों के घर जा जाकर खाना खाता रहा उनको भी बताये बगैर - खाने के समय जा पहुँचता और जब वे लोग मेज़ पर बैठकर खाना खाने लगते तो मैं भी सहजभाव से बैठ जाता तो उनको खाना खिलाना ही पड़ता।

परन्तु मज़ा नहीं आता था और मन में धड़कन और उलझन रहती थी तो एक शेर याद आया:

‘फ़क़ीरी में भी मुझको माँगने में शर्म आती है,

सवाली हो के भी मुझसे हाथ फैलाया नहीं जाता।’

फ़क़ीर तो मैं तब था नहीं, केवल भिक्षा पर रहने का ख़्याल मन में उठा था, तो फिर कुछ चिन्तन के बाद मुझे ख़्याल हुआ कि भिक्षावृत्ति तो अन्दर की चीज़ है, बाहर दिखाने के लिये नहीं।

जब यह स्थान तथा मकान वीरान-बियाबान पड़ा था तो एक महात्मा स्वामी भास्करानन्द परमहंस - इस स्थान में अकेले नंगे रहा करते थे, उन्होंने भी शायद भिक्षा का प्रण लिया हुआ था। अपने पास वे पैसा धेला कुछ नहीं रखते थे। जब कहीं जाना होता था तो सड़क पर पहुँचकर किसी से भी कहते थे कि मुझे वहाँ का बस का टिकट ले दें तो सब लोग ले देते थे। इसी तरह जब वापस आना होता तो उधर से सड़क पर से किसी से कहते तो वह टिकट ले देता। जब टिकट लेकर देने वाला कोई नहीं होता तो अपने कम्बल का पल्ला फैलाते और पैसे कम्बल पर डलवा लेते क्योंकि यह प्रण लिया हुआ था कि पैसे को हाथ नहीं लगाना और छूना नहीं।

उन्होंने अपनी आयु तो इसी तरह बिता ली होगी परन्तु मुझे यह कभी अच्छा नहीं लगा। इससे भी मैंने शिक्षा ली कि बाहर के प्रणों का कोई अर्थ नहीं, यह सब अन्दर की वृत्ति होनी चाहिये। खाना तो जहाँ भी मिले और जिस अवस्था में मिले वह उसी भगवान् का ही दिया हुआ है।

फिर कुछ वर्ष पश्चात् मैं स्त्री बच्चों सहित श्रीअरविन्द आश्रम पाण्डिचेरी चला गया। वहाँ तो व्यवस्था ही ऐसी थी कि हाथ फैलाकर, थाली हाथ में लेकर खाना लेना पड़ता था तो अपने अन्दर की वृत्ति ऐसी रहती थी - कि माताजी से भिक्षा ले रहे हैं, वही मुझे प्रसाद रूप में भोजन दे रही हैं।

फिर कुछ वर्ष पश्चात् यहाँ दिल्ली में भी श्रीअरविन्द आश्रम की स्थापना हो गई और वैसी व्यवस्था यहाँ भी बन गई...तो मुझे तसल्ली हो गई और आनन्द हो गया।

और जो कुछ मेरा कहीं भी है और कहीं से जो कुछ भी आता है वह सब प्रभु का ही है मेरा कुछ भी नहीं है और वह सब कुछ प्रभु के काम में ही लगेगा।

उसकी कृपा चाहिये, हर समय, हर क्षण में।