पावन संस्मरण (भाग 1)
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चींटियाँ


नये ज़माने के मुताबिक देहली में भी गुफ़ा हो सकती हैं। अगर किसी को शक़ हो तो यहाँ आकर साक्षात् मेरी गुफ़ा देख लें। जिसमें बैठने से दूसरों का दम घुटता है। पुराने ज़माने की गुफ़ाओं का रिवाज अब गया।

मैं अपनी गुफ़ा के बाहर खुली जगह में पेड़ों के नीचे बैठा हुआ था। खाना भी वहीं मँगवाया खाने के लिये। और धीरे-धीरे आनन्द से खाना खा रहा था। मेरे इर्द-गिर्द तीन चार लोग बैठे हुए थे। वे तो खाना खा आये थे। इसलिए मुझे कुछ चिन्ता नहीं थी।

घुटनों के ऊपर तक मैंने अपना पायजामा उठाया हुआ था क्योंकि नारियल का तेल लगाया था ख़ारिश के कारण। इतनी ही देर में बैठे हुए लोगों में से एक सज्जन यह देखकर चिल्ला उठे कि मेरी दोनों टाँगों पर घुटनों के ऊपर तक हज़ारों चींटियाँ चढ़ी हुई थीं। टाँगों की त्वचा का एक पिन बराबर हिस्सा भी नहीं दिखाई देता था। चींटियाँ एक दूसरे के ऊपर भी चढ़ी हुई थीं और पूरी तरह जमी हुई थीं। सबने भाग-दौड़कर कपड़े और झाडू लाकर उन सबको नीचे गिराया और मुझसे कहने लगे कि, ‘‘आप किस तरह के मनुष्य हैं, किसी के ऊपर एक चींटी भी चढ़ जाती है तो चिल्ला उठता है और चींटी को हटा दूर फेंकता है।’’

मैंने कहा, ‘‘मैं तो अपने खाने और आप लोगों के सत्संग में मस्त था। मुझे तो एक चींटी के चढ़ने का भी पता नहीं लगा।’’ वे लोग कहने लगे, ‘‘आपकी नसें, नाड़ियाँ सूख गयी होंगी।’’ उन्होंने मेरी टाँगों को ठोक-ठोककर पूछा कि, ‘‘आपको कुछ महसूस होता है या नहीं?’’ मैंने कहा, ‘‘आपकी ठोकरें तो ख़ूब महसूस होती हैं।’’ ख़ैर, बात खतम हो गयी। सत्संग के और चर्चे चलने शुरू हो गये।

दोपहर बाद जब मैं अकेला आराम के लिए बैठा तो मैं सोचने लगा कि यह क्या क़िस्सा हुआ। ये लाखों चींटियाँ मुझे चिपकी हुई थीं और मुझे कुछ महसूस नहीं हुआ। या तो मैं बहुत पहुँचा हुआ ऋषि बन गया हूँ कि जीव-जन्तु मेरे ऊपर अपना घर और बस्तियाँ बनायें और मुझे कुछ पता न लगे। या फिर मेरे शरीर में कोई बहुत बड़ा दोष है। परन्तु ज़माना तो इतनी तेज़ी से बदलता जा रहा है कि शरीर की पुरानी बीमारियाँ और दोष भी अब अपनी अवधि से बाहर -out of date हो गये हैं। अब नया ज्ञान जब तक आयेगा तब तक बीमारी का रूप और बदल जायेगा और फिर नयी खोज करनी पड़ेगी। इस संसार का कुछ पता नहीं लगता कि हम किधर जा रहे हैं।