शहंशाह
यह नादिरशाह या औरंगजेब की बात नहीं है। यह शहंशाह एक हिन्दू फ़क़ीर थे। ‘पहले’ वाले पंजाब में रहने वाले।
मेरे परममित्र, लाला फ़क़ीरचन्द मल्होत्रा, लाहौर में ठेके दार थे। शहंशाह उनके गुरु थे। और घूम-फिरकर उनके पास ही ठहरा करते थे। मुझे वहाँ लाहौर में ही, उनके अपने मित्र के ही घर में, उनके दर्शन का सौभाग्य मिला था।
शहंशाहजी का भौतिक शरीर तो नहीं है, परन्तु मेरे मित्र नें उनके नाम पर राजपुर शहर में- जो देहरादून और मसूरी के बीच में है, एक शहंशाह-आश्रम बनाया है और वहाँ एक स्कूल और लाइब्रेरी का निर्माण भी किया है।
सचमुच अच्छे फ़क़ीर और सच्चे साधु, सुन्दर, भारी डीलडौल। बहुत सुन्दर दाढ़ी और मूँछे। उनके सत्संग में बहुत आनन्द मिलता था। - और उनके पास घण्टों बैठे रहने को जी चाहता था। ऐसे साधू-फ़क़ीर तो हमेशा चलते-फिरते रहते हैं, और इनको ‘रमते फ़क़ीर’ ‘रमते जोगी’ कहते हैं।
एक दिन प्रातः मुझे वे दिल्ली की यूनिवर्सिटी तरफ़ वाली पहाड़ी (Ridge) पर आते मिल गये और मुझे एकदम पहचान लिया और ज़बरदस्ती अपने साथ जमुना-घाट पर ले गये, जहाँ उन्होंने धूनी रमायी हुई थी। वहीं वे प्रवचन किया करते थे। जब मैं आने लगा तो मुझे रोज़ाना प्रवचन सुनने आने के लिए कहा, परन्तु मेरा ऐसा सौभाग्य नहीं था, क्योंकि मेरा निवास-स्थान वहाँ से बहुत दूर था और उनको अपने घर बुलाने में मुझे कुछ झिझक हुई।
फिर एक बार जब मैं लाहौर गया, और अपने मित्र के घर तो जाना होता ही था, वहाँ शहंशाह जी के सम्बन्ध में एक दिलचस्प घटना सुनने को मिली।
एक नॉर्थ-वेस्टर्न रेलवे के ऑफ़िसर शहंशाहजी के भगत थे और कराची में रहते थे। उन्होंने शहंशाहजी से प्रार्थना की कि वे उनके साथ उनके घर, कराची चलें। शहंशाहजी ने मंज़ूर कर लिया।
रेलवे ऑफ़िसर को फ़ैमिली सहित सेकिण्ड क्लास का पास मिलता था और वे तो सेकिण्ड क्लास में बैठ गये। उस ज़माने में रेलवे में चार क्लासें थीं। थर्ड क्लास, इण्टर क्लास, सेकिण्ड क्लास और फ़र्स्ट क्लास।
शहंशाहजी के लिए रेलवे ऑफ़िसर ने थर्ड क्लास का टिकट ख़रीदकर उनको दे दिया कि वे जाकर थर्ड क्लास में बैठ जायें। शहंशाहजी सरलता से फ़र्स्ट क्लास में जाकर डटकर बैठ गये। फ़र्स्ट क्लास में आमतौर पर जाँच (Checking) कम होती है। चेकिं ग करने वाले झिझकते हैं। दूसरे दिन जब गाड़ी कराची पहुँची तो किसी रेलवे ऑफिसर ने शहंशाहजी को आकर प्रणाम किया और उनका टिकट पूछा। शहंशाहजी ने जवाब दिया-‘मेरा टिकट मेरे नौकर के पास है और वह सेकिण्ड क्लास में बैठा हुआ है।’
रेलवे ऑफ़िसर उनके पास गये और उन्होंने चुपचाप शहंशाहजी का फ़र्स्ट क्लास का किराया दे दिया। वरना कहीं बात बढ़ जाती तो रेलवे ऑफ़िसर के ऊपर आरोप लग जाता और नौकरी से भी जाते रहते।
रेलवे ऑफ़िसर बहुत शर्मिन्दा हुए और शहंशाहजी से क्षमा माँगी और शायद फिर कभी उनको नहीं बुलाया।