पावन संस्मरण (भाग 1)
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हमारे डॉ. युद्धवीर सिंह


मुझे भी बुलाया गया किसलिए। पता लगा कि डॉक्टर साहब का नागरिक अभिनन्दन किया जा रहा है। मैंने पूछा-‘क्यों?’

बताया गया कि सरकार नें उन्हें ‘पद्म भूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया है।

यह भी कोई बात हुई? नगर के पद्मभूषण तो वे थे ही। नगर के सब लोग ही इस बात को जानते हैं। सरकार को क्या अब जाकर पता लगा है? इतनी देर में? खैर, देर आयद-दुरस्त आयद।

लेकिन सरकार ने यह कौन सा तीर मारा? सरकार को क्या इतना मालूम नहीं है कि सारी ज़िन्दगी इन्होंने तपस्या और फ़क़ीरी में काटी? लाख दो लाख रुपया देती या श्रीअरविन्द मार्ग पर श्रीअरविन्द आश्रम के पास बहुत बड़ी कोठी दे देती तब भी कुछ बात होती।

मैंने सोचा, चलो चलते हैं। देखें तो सही, क्या होता है और नगर के लोग क्या कहते हैं परन्तु इतनी दूर... फिर सोचा कि चांदनी चौक में बहुत समय से जाना नहीं हुआ। वहाँ जायेंगे तो चांदनी चौक का नया रंग-रूप ही देख आयेंगे और नहीं तो चांदनी चौक की चाट तो खा ही आयेंगे।

वहाँ पहुँचे तो देखा कि डॉ0 युद्धवीर सिंह चले आ रहे हैं। अरे वही घिसी-पिटी खादी की अचकन और वही क़िश्तीनुमा गाँधी टोपी। मैंने तो समझा था कि वे पद्मभूषणों से लदे होंगे।

परन्तु वाह! मंच पर आते ही नया रंग शुरू हो गया! डॉ0 युद्धवीर सिंह फूलों के हार से लदने शुरू हो गये। मैंने सोचा-यह तो बड़ी मुश्किल हुई! परन्तु डा0 साहब तो बड़े होशियार निकले। ऐसा लगता है कि वे इसके आदी ही थे। हार उतार-उतार कर एक तरफ़ रखते गये और वहाँ हारों का पहाड़ बनना शुरू हो गया। नहीं तो वे फ़ूलों के नीचे ही दब जाते और दिखाई भी न देते तो अभिनन्दन कैसे लेते?

अब लोगों ने तारीफ़ों के पुल बांधने शुरू कर दिये। एक के बाद दूसरा दूसरे के बाद तीसरा। ताँता ही लग गया। लोगों की बातें वे ही जो सारा शहर पहले से ही जानता था। देवता स्वरूप हैं। गांधी जी के भक्त हैं। भारत माता के सच्चे सपूत हैं। अहिंसक क्रांति के अग्रदूत हैं। राजधानी के गौरव हैं। साधु-स्वरूप हैं। लोक सेवक हैं। त्यागी हैं। तपस्वी हैं। सरलता की प्रतिमूर्ति हैं। सादा जीवन और उच्च विचार के जीवन्त प्रतीक हैं। समाज सुधारक हैं। परोपकारी हैं। और न जाने क्या-क्या कहा। मैं तो सब भूल ही गया। परन्तु लोग बोलना बन्द नहीं करते थे। उनको ज़बरदस्ती रोकना पड़ा।

डॉ0 साहेब ने कृतज्ञता में कहा कि, ‘मेरी ख़ुशी, मेरी इज़्ज़त, मेरी धन-दौलत सब आप ही लोग हैं जिन्होंने आकर मुझे इतना सम्मान दिया, इतना प्यार दिया। क्या यह सबसे बड़ा धन नहीं है?”

बातें तो बहुत हैं परन्तु एक बात जो उन्होंने बतलायी कि मनुष्य धनवान और अमीर कैसे हो सकता है’ -वह मार्के की थी। उन्होंनें कहा- मैं एक दिन मरीजों को देख रहा था। भीड़ तो रहती ही थी। उसमें एक सज्जन पीछे हटकर बैठ गये। मैं नें पूछा- “आप अपनी बारी पर क्यों नहीं आते हैं?” उन्होंने कहा कि, “मुझे ख़ास बात करनी है। आप सब मरीज़ों को देख लीजिए। मैं इंतज़ार करूंगा।” मैंने सोचा इनको कोई गुप्त या असाध्य रोग होगा।

बारह बज गये थे। जब मरीज़ों की भीड़ कम हुई तो मैंने उनको बुलाया और पूछा कि, “आपको क्या तकलीफ है?” वे कहने लगे कि, “मुझे एक रुपया चाहिए।”

‘‘अरे यहाँ तो मरीज़ों को दवा दी जाती है, रुपये तो नहीं बाँटे जाते हैं? रुपयों की टकसाल तो नहीं है।’’

उन्होंने बहुत मिन्नत से और नम्रतापूर्वक और सरलता से बतलाया कि, “मुझे किसी ज़रूरी काम से मेरठ पहुँचना है।..... मेरे पास इस वक़्त कुछ भी नहीं है। यदि मैं नही गया तो मेरा बहुत नुक़सान हो जायेगा।”

रक़म छोटी थी। मैं नें आगे हील-हुज्जत किये बग़ैर उनको एक रुपया दे दिया और वे चले गये।

दो तीन साल के बाद वे सज्जन फिर आये। एक पात्र ढका-बँधा मेरे सामने रख दिया कि, “इसमें पाँच सेर गाय का घी है जो घर का है। यह मैं आपके लिए भेंट लाया हूँ।”

मैंने पूछा- “आप कौन हैं? यह घी मेरे लिए क्यां लाये हैं?” उन्होंने कहा-“आप मुझे भूल गये? दो-तीन साल हुए मैंने आपसे एक रुपया लिया था।” मैंने कहा-“अरे तो फिर क्या हुआ- यह घी तो बीसियों रुपयों का है। क्या आप एक रुपया काटकर घी की क़ीमत लेना चाहते हैं?”

उन्होंनें कहा-“एक रुपया वापस करना तो बहुत ओछापन होता और आपकी शान के लायक़ नहीं होता। मैं तो यह घी आपकी भेंट लाया हूँ।” और वह घी रखकर ग़ायब हो गये।

चार छः महीनों के बाद कोई एक मटका भरा दूध का मेरे लिए लाये। फिर कुछ दिनों बाद मटका दही का ले आये। फिर कुछ दिनों के बाद बर्तन भरा रबड़ी और खोये का ले आये। मैंने पूछा- “यह भेंट का ताँता क्यां लग गया है?” उन्होंने कहा कि, “आपके एक रुपये ने मेरे भाग्य खोल दिये। अब मैं सुखी सम्पन्न हूँ और मेरे घर में दूध-दही है। यदि मैं आप जैसे सज्जन महात्मा को भेंट न करूँ तो इसका मतलब यह होगा कि मैं भगवान् को ही भूल गया हूँ।”

यह सब चलता रहा और फिर शायद यह सज्जन दो साल के बाद आये और कहा कि, “ज़रा बाहर सड़क पर मेरे साथ चलिए।” मैं इस पहेली को नहीं समझ सका परन्तु उनके मज़बूर करने पर मुझे उनके साथ बाहर सड़क पर जाना पड़ा। जब सड़क पर आ गये तो उन्होंने बतलाया कि, “यह सामने खड़ी नयी मोटर मैंने ख़रीदी है। पहले आप और आपकी पत्नी और बच्चे इस मोटर में मेरे साथ घूमें तब मैं इसे शुभ समझूंगा!”

तो अब बतलाइये कि मेरे जैसा भाग्यवान, धनी और सुखी और कौन हो सकता है?

ज्यों ही समारोह सम्पन्न हुआ कि डॉ0 साहेब ने सब फूलों के हार मित्रों को पहनाने शुरू कर दिये और पहाड़ मिटा दिया। एक हार मेरे गले में भी पड़ गया और मेरा भी अभिनन्दन हो गया।

यह तो हुई कहानी जो डॉ0 साहेब ने बतलायी थी और मेरी कहानी डॉ0 साहेब के साथ इससे भी मज़ेदार है जो मैं फिर कभी बताऊंगा।

परन्तु जो सोचकर मैं अभिनन्दन समारोह के लिए चला था तो न जाने भगवान् ने कैसे आवाज सुन ली और वहाँ समारोह के बाद चाट ही खाने को मिली और मैंने ख़ूब खायी।