बारी का बुखार
मेरे एक मामा थे। परन्तु थे मेरे से उम्र में काफ़ी छोटे। ऐसा भी हो जाता है। चूँकि मैं मामा कहता था तो मेरे सब मित्र परिचित और साथी भी उनको ‘मामा’ पुकारते थे। अब तो वे इस संसार में नहीं हैं।
मध्य प्रदेश के एक जंगल में, जहाँ हमारा कारख़ाना और ख़दानें थीं, वहाँ ये हमारे मामा काम करते थे। इनको बुख़ार हो गया -बारी का। एक दिन होता था एक दिन नहीं। महीनों ऐसे ही चलता रहा। मेरे मामा बेचारे बहुत परेशान हो गये।
उनके मित्र और कारख़ाने में जो लोग काम करते थे, उनका हाल पूछने आते थे। एक दिन कोई मित्र पहली बार आया था। उसने पूछा, “मामाजी, सुना है आपको बारी का बुख़ार आता है!”
मामा बहुत ही दुखी और परेशान थे। यह बात सुनते ही ग़ुस्से में आ गये और झुंझलाकर कहने लगे, “बारी का बुखार कैसे हुआ, बारी का तो तब हो कि एक दिन आये मुझे और एक दिन आये तुम्हें -तब तो बारी का हो। और यदि बार-बार घूम-घाम कर मुझे ही होता रहे तो बारी का कैसे हुआ?”