पावन संस्मरण (भाग 1)
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संकल्प


1924 में मैं एक प्रसिद्ध लाला दीवानचन्द की नौकरी में था और टाइप का काम करता था। उस समय मेरी आयु उन्नीस वर्ष की होगी। जामा मस्जिद के पीछे एक बड़े हॉल में उनका विशाल दफ़्तर था - जिसमें पचास-साठ कार्यकर्त्ता बैठते थे। मेरी मेज़ दरवाज़े के अन्दर घुसते ही दाहिने ओर को पहली थी जिस पर बैठकर मैं टाइप करता था। तो स्वाभाविक था कि जो भी अन्दर आता था पहले मुझसे बात करता था या जो कुछ पूछना होता था तो पूछता था।

एक दिन एक संन्यासी, जिस्म दुबला-पतला, रंग साँवला, कद छः फुट से ऊँचा, हाथ में सात फुट ऊँचा बाँस (डंडा) लिये हुए मेरे सामने आ खड़े हुए। मैंने नमस्ते करते हुए कहा- ‘आज्ञा कीजिये आपको किनसे मिलना है?’ वे कहने लगे- ‘लालाजी से मिलना है’। मैंने पूछा- ‘क्या काम?’ वे झिझके और कहने लगे- ‘उनसे ही कहूँगा।’

मैंने कहा ‘आप बैठिये और मुझे बतलाइये कि मैं लालाजी से क्या कहूँ कि आप किस काम के लिए आये हैं।’ वे कहने लगे- ‘ मैं झज्जर गाँव में आर्य बच्चों की शिक्षा के लिए गुरुकुल बना रहा हूँ और लालाजी से उसके लिए धन के लिए प्रार्थना करनी है।’

मैं उनको मैनेजर साहब के पास ले गया और कुर्सी दी कि ‘बैठ जाइये। आप इनसे बात कर लीजिए ये आपका निवेदन लालाजी तक पहुँचा देंगे और यदि लालाजी की इच्छा भी आपसे मिलने की हुई तो आपको उनके पास ले जायेंगे।’

मैनेजर साहब ने कहा कि, ‘स्वामीजी आप बैठ जाइये मैं कुछ काम निबटा लूँ तो आपका संदेश लेकर ऊपर लालाजी के पास जाऊँगा।’

स्वामीजी ने कहा- ‘बहुत अच्छा। आप अपना काम निबटा लीजिये।’

मैनेजर साहब अपने काम में लग गये और एक घंटा बाद जब ऊपर नज़र उठाई तो देखा कि स्वामीजी सिर पर खड़े हैं। मैनेजर साहब ने झुँझला कर कहा- ‘स्वामीजी आप चैन से बैठ क्यों नहीं जाते? जब मैंने आप से कहा है कि मैं आपका संदेश लालाजी तक ले जाऊँगा।’ स्वामी ने कहा- ‘कोई बात नहीं। आप चिंता न कीजिए आप अपना काम कर लीजिये।’

दफ़्तर के दूसरे लोगों की नज़र भी स्वामीजी पर थी और वे भी अपनी-अपनी जगहों से बार-बार स्वामीजी से कह रहे थे कि, ‘स्वामीजी! आप अब बैठ जाइये।’ परन्तु स्वामीजी बैठने की बजाए दफ़्तर के एक कोने में जाकर खड़े हो गये।

मुझे यह सब देखकर अच्छा नहीं लग रहा था। मेरे दिल में सन्यासियों के लिए बड़े आदर की भावना थी। तो मैं उठकर स्वामीजी के पास गया। उनसे कहा कि, ‘यहाँ का तो कोई भरोसा नहीं कि लालाजी से मिलने में कितने घण्टे लग जायें। इसलिए आप आराम से बैठ क्यों नहीं जाते?’

तब उन्होंने मेरी शुभ भावनाओं को पहचानकर मुझे बताया कि ‘मैंने संकल्प किया हुआ है और प्रण लिया हुआ है कि जब तक गुरुकुल बन नहीं जाता तब तक मैं दिन में कभी बैठूंगा नहीं।’ इस निश्चय ने मेरे अंदर एक प्रकार की आग भर दी और तब मैंने उनसे उनके खाने-पीने और सोने आदि के बारे में भी विस्तार से पूछा तो उन्होंने बताया कि ‘मैं बहुत प्रातः रात के बचे भोजन का कलेवा करके निकलता हूँ और पैदल ही चलता हूँ। और रात के समय जहाँ कहीं खाने को मिल जाये तो खाकर किसी आर्य समाज मंदिर या किसी दूसरे मंदिर या धर्मशाला में विश्राम कर लेता हूँ और प्रातः उठकर फिर चल पड़ता हूँ।’

मेरे ऊपर उनके इस सारे आचरण व व्यक्तित्व का बहुत गहरा असर हुआ। और मैंने सोचा कि हिम्मत करके लालाजी के पास जाऊँ और उनको बतलाऊँ कि कैसे एक संन्यासी चार घंटे से खड़ा है किसी उद्देश्य को लेकर आपसे मिलने के लिए। लेकिन मेरी, एक मामूली टाइपिस्ट-क्लर्क की कैसे हिम्मत हो सकती थी लालाजी के पास जाने की! - जबकि मैनेजर और दफ़्तर के बड़े-बड़े अफ़सर घबराते थे और थर-थर काँपते थे।

प्रभु इच्छा। मैं डरता और काँपता हुआ ऊपर चला ही गया। ऊपर लालाजी के दफ़्तर का कमरा उतना ही बड़ा और लम्बा-चौड़ा था जिसमें वे अकेले बैठते थे कि जितने बड़े कमरे में नीचे हम पचास-साठ लोग बैठते थे।

लालाजी ने जब मेरे पाँव की आवाज़ सुनी तो दूर से आँख उठाकर देखा, हैरानगी से बोले-‘क्या बात है? ऊपर कैसे आये?’ ‘हुज़ूर-हुज़ूर’ कहता मैं नज़दीक़ पहुँचा और काँपते-काँपते उनसे स्वामीजी के चार घंटे से खड़े होने की बात बताई। मेरी बात उन्होंने सुन ली इसका मूल कारण यह था कि लालाजी आर्यसमाज के बड़े नेता थे - स्तंभ थे। और मैं भी आर्यसमाज का स्वयंसेवक था- और आर्यकुमार सभा का प्रमुख सदस्य था। तो उनके मन में मेरे लिए कुछ जगह थी। उनके हृदय में मेरे लिए कोमल स्थान था। सो उन्होंने आज्ञा दे दी थोड़ी देर बाद स्वामीजी को ले आना।

जब मैं स्वामीजी को ऊपर ले गया तो मेरे अन्दर कुछ हिम्मत आ गई। तब मैंने स्वामीजी के निश्चय की सारी बात बतलाई। ऐसा प्रतीत होता है कि लालाजी के ऊपर भी ऐसे उदात्त संकल्प का गहरा असर पड़ा। और उन्होंने एक हज़ार रुपया नगद स्वामीजी के इस महान् कार्य के लिए दान दिया। स्वामीजी लेकर प्रसन्न ही नहीं बल्कि बहुत हैरान भी हो गये।

लालाजी बड़े परोपकारी वृत्ति के थे। उनके पास दिन-रात लोग भिन्न-भिन्न संस्थाओं के लिए दान माँगने के लिए आते ही रहते थे। और वे सबको पाँच या दस रुपये तो दे ही दिया करते थे। किसी को निराश नहीं करते थे। कभी-कदास ही बरसों में किसी को सौ रुपये दे दिये होंगे किन्तु इन स्वामीजी के निश्चय के कारण इनको हजार रुपये मिल गये जिसकी कभी आकांक्षा भी न हो सकती थी। उस ज़माने में ज़मीन तो प्रायः ऐसे कामों के लिए मुफ़्त ही मिल जाती थी। और यह राशि गुरुकुल शुरू करने के लिए बहुत काफ़ी थी। निश्चय ही गुरुकुल बनकर चलना शुरू हो गया होगा- और स्वामीजी का निश्चय सफल हो गया होगा।

यह बात पचास साल से अधिक की हो गई है और यह लिखते समय मेरे पास अचानक झज्जर के पास के एक सज्जन आ बैठे। वे यह सुनकर हैरान हो गये और उन्होंने अभी बतलाया है कि यह गुरुकुल इस समय बहुत प्रशंसनीय ढंग से चल रहा है। एक हज़ार एकड़ ज़मीन पर स्थापित यह गुरुकुल हज़ारों विद्यार्थियों को वैदिक प्रणाली के अनुसार शिक्षा दे रहा है। इसके साथ और बहुत-सी संस्थाएँ बन गई हैं। बहुत बड़ी खेती है और हज़ार से अधिक गौएँ गौशाला में हैं।

एक संन्यासी के संकल्पमात्र ने एक गुरुकुल संस्था की स्थापना करवा दी। माताजी व श्रीअरविन्द का कितना बड़ा संकल्प था कि वे संसार का रूपांतर कर देंगे। और उसी संकल्प को लेकर वे एक स्थान में बैठ गये। आश्रम बनाया और माताजी पचास साल बैठकर उसका संचालन करती रहीं और एक दिन के लिए भी दूसरे किसी स्थान पर नहीं गईं। श्रीअरविन्द पच्चीस वर्ष एक ही कमरे में बंद रहे और इतनी वृहद् साहित्य रचना की जो आनेवाले हजारों वर्षों तक मनुष्यजाति को दिव्य-मानव में रूपांतर करने का मार्ग दिखाती रहेगी।