पावन संस्मरण (भाग 1)
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गुलज़ारी लालजी


(गुलज़ारी लालजी दिल्ली के विख्यात प्राकृतिक चिकित्सक हैं। प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचार-प्रसार को ही आपने अपने जीवन का मिशन बनाया है। उस दिन इसी सिलसिले में श्रीअरविन्द आश्रम-दिल्ली शाखा के भोजन-कक्ष में उन्होंने मदर्स स्कूल के अध्यापकों, छात्रावास के बच्चों और आश्रमीय साधकों के सम्मुख प्राकृतिक आहार की प्रदर्शनी की तथा बाद में, ध्यान-कक्ष में प्राकृतिक चिकित्सा के चमत्कार पर एक वक्तव्य भी दिया। इसी प्रसंग में उनका परिचय कराते हुए:)

गुलज़ारी लालजी ने हम सबको आज यहाँ आकर प्रसन्न किया। खिलाया-पिलाया। उनका नाम वैसे बहुत दिनों से सुन रखा था किन्तु दर्शन आज हुए। सन् 1924-25 की बात है, जब मैं जामा मस्जिद क्षेत्र में रहता था उस समय पहली बार उनका साइन-बोर्ड पढ़ने में आया था ‘गुलज़ार हनी!’ तब वे भी 24-25 के रहे होंगे। इसका मतलब ही है कि बचपन से ही उन्हें इन चीज़ों का शौक़ है। यूँ तो वे लॉ-ग्रेज्युएट हैं। वैसे उन्हें सुप्रीम कोर्ट में वकालत करनी चाहिये थी। किन्तु वह सब छोड़-छाड़कर वे इसी के पीछे पड़े हुए हैं। इससे लगता है कि हम दोनों एक-दूसरे की कार्बन-कॉपी हैं। मैंने पूछा कि, ‘ऐसा क्यों?’ तो उत्तर वही मिला, जो मैं भी ऐसे किसी सवाल के जवाब में देता। उन्होंने कहा, ‘मैं तो एक टूल हूँ। उपकरण हूँ। जिस तरफ भी ‘वह’ मोड़ दे, मुड़ जाता हूँ।’

‘मैं नहीं, तू ही है!’ यह भावना जब काम के पीछे होती है तो ‘काम’ तो वही होता है किन्तु उसका आनन्द अनन्त गुना बढ़ जाता है। अब गुलज़ारी लालजी को देखिये। इस उम्र में भी कितने प्रसन्न, चुस्त और ज़िन्दादिल मालूम होते हैं। दूसरे लोग हॉस्पिटल खोलते हैं। कहते हैं, लोगों की भलाई के लिए। किन्तु ‘इनडाइरेक्टली’ अप्रत्यक्ष रूप से क्या वे यह नहीं चाहते कि लोग बीमार पड़ें और हमारे यहाँ आयें। गुलज़ारी लालजी का मिशन उससे कहीं ऊँचा है। वे चाहते हैं कि हम बीमार ही न पड़ें। इसके नुस्ख़े बताने के लिए वे स्वयं घर-घर चलकर जाते हैं। जहाँ भी दस-बीस लोग इकट्ठा मिल जायें वहीं नैचरोपैथी प्राकृतिक चिकित्सा के चमत्कार बतलाते हैं कि प्रकृति के साथ अपना तालमेल बैठाने से किस प्रकार सेहत की झंझटें दूर हो सकती हैं, किस प्रकार प्राकृतिक आहार से खाद्यान्नों की क़ीमतें कम हो सकती हैं। यह सब बतलाने के लिए वे यह सब खिलाने-पिलाने का ख़र्च भी अपने पास से करते हैं।

भला बताइये, इससे अधिक ख़ुशक़िस्मती क्या हो सकती है कि हम अपने किसी मिशन के लिए इस तरह जियें!

जहाँ तक प्राकृतिक आहार की बात है, मुझे यहाँ एक चुटकुला याद आ रहा हैः-

एक सज्जन ट्रेन में सफ़र कर रहे थे। बड़ी भीड़ थी। उनके पास बड़ा भारी ट्रंक था। भीड़-भड़क्के में वह किसी यात्री के पाँव पर जा पड़ा। वह अपने गुस्से को सँभाल न सका और उसने एक थप्पड़ जड़ दिया। पहले तो उक्त सज्जन के होश ठिकाने नहीं रहे। जब वे होश में आये तो बोले, ‘भाई साहब, थप्पड़ आपने इतने ज़ोर से मारा! पर एक बात बतलाइये, वह सीरियसली मारा था या मज़ाक में?’

यात्री अब भी गुस्से में था। बौख़लाकर बोला, ‘सीरियसली मारा था!’

‘तब तो ठीक है!’ सज्जन बोले, ‘मुझे मज़ाक़ बिल्कुल पसन्द नहीं!’

मुझे विश्वास है कि गुलज़ारी लालजी ने प्राकृतिक आहार के विषय में जो कुछ दिखाया, वह सब ‘सीरियसली’ दिखाया, मज़ाक में नहीं।