समस्या
पच्चीस वर्ष बीत गये। रजत जयन्ती भी हो गई। इस बीच बहुत प्रगति की - चढ़ावे भी चढ़ने लगे - मानता भी होने लगी, परन्तु एक समस्या हल नहीं हुई। बहुत कोशिश की मगर उसका कोई हल नहीं निकला।
हम तो क्या बड़े-बड़े विद्वान और बड़े-बड़े धनवान भी नहीं निकाल सके।
एक नवयुवक मेरे पास आए। मेरी आयु तब इक्कीस वर्ष की थी। मैं भी नवयुवक था। मैं चूना बेचने का धंधा किया करता था। मैं चूने की दुकान में गोदाम की पड़छत्ती में बैठा रहता था और मेरा भरैया (आदमी) दरवाज़े पर खड़ा रहता था। उसका नाम था शंकर। मैंने उसको सिखा रखा था कि मैं तो ख़ानदानी आदमी हूँ। कहाँ हमारे ख़ानदान के लोग तो रुपये भी खुरजियों से उतारकर छनाछन गोदाम में भर दिया करते थे और फिर तौलकर बाहर भेजा करते थे। उनको गिनने की कहाँ फुरसत और शायद गिनना आता ही न होगा। परन्तु थे तो ‘चीफ़्स ऑफ़ पंजाब’ - पंजाब के मुखिया। और कहाँ मैं? मुझे मन-मन, दो-दो मन चूना बेचना पड़ रहा है।
ओह! मैं तो सड़क से भटक गया। बात तो कुछ और कह रहा था। मैंने शंकर को समझा रखा था कि इस बाजार में जो लोग आते हैं वे चूना ख़रीदने के लिए आते हैं। उनको किसी तरह तुम अन्दर ले आया करो फिर मैं उनसे दो-दो हाथ कर लूँगा। कभी उनको चूना बेचे बग़ैर जाने नहीं दूँगा। जब वे पैसे देकर चूना ख़रीदकर चले जयेंगे बस फिर तो तुम्हारा और मेरा काम रह जायेगा। मैं नाक पर पगड़ी बाँधकर बोरी पकड़ लिया करूँगा और तुम बेलचे से चूना भर दिया करना - और ठेला बुलाकर चूना भेज दिया करेंगे।
मैं बात कर ही रहा था कि एक नवयुवक मेरे पास आया और कहने लगा, ‘‘मुझे जल्दी से बीस मन चूना दे दीजिये। मेरे पास समय नहीं है - और चूना दूर भिजवाना है, बेग़माबाद।’’ जो कि मेरठ की लाइन पर छोटा-सा स्टेशन था।
मैंने कहा, ‘‘चूना तो भरकर कल सवेरे ही जाएगा। आप बैठिये तो सही। आप हैं कौन? - और इतनी जल्दी क्या हो रही है?’’
उस नवयुवक ने कहा, ‘‘मैं घर से लड़कर भागकर आया हूँ। और मेरा नाम गुज्जरमल मोदी है। मेरे अन्दर इस समय आग भरी हुई है। मुझे एक कोठड़ी बनानी है और वहाँ बैठकर कुछ काम करना है। मेरे पास केवल सौ रुपये हैं जो मैं घर से चुराकर लाया हूँ।’’
मैंने कहा, ‘‘फिर तो हम एक ही मिट्टी के बने हैं। मेरे अन्दर भी आग भरी हुई है और मुझे भी पता नहीं कि मुझे क्या करना है। मैं भी घर से भागकर आया हूँ पर ख़ाली हाथ।’’ फिर तो हमारी घुट गई - और कई घंटे तक बात करते रहे। ‘जल्दी’ हवाई-जहाज़ में बैठकर भाग गई। तब से हम दोनों दोस्त बन गये।
अगर मैं यह सारी कहानी लिखूँ तो पाँच सौ पृष्ठ की किताब चाहिए, परन्तु यह तो मैं कुछ और ही बात लिख रहा हूँ।
वही नवयुवक गुज्जरमल मोदी लखपति, करोड़पति और अरबपति से भी अधिक हो गया। सैकड़ों कारखाने लगाए, कोई उद्योग छोड़ा नहीं, चीनी की मिलें, कपड़े की मिलें, लोहे के कारख़ाने, मोटरों के टायर, साबुन, तेल, धागे की मिलें। अगर ये सब गिनवाने लगूँ तो उसके लिए भी बीस-पच्चीस पृष्ठ चाहिए। नया शहर बसा दिया। बेग़माबाद से शहर का नाम मोदीनगर कर दिया। एक लाख की आबादी हो गई। स्कूल, कालिज, अस्पताल खुल गये, बाज़ार बन गये, पुलिस स्टेशन, डाकघर, तारघर, टेलीफून दफ़्तर सब बन गए। क्या-क्या नहीं?
- और मैं पिछड़ गया। किसी दूसरे ही रास्ते पर भटक गया। माताजी और श्रीअरविन्द के चक्कर में आ गया - और भगवान् के रास्ते पर पड़ गया। जो थोड़ा-बहुत चूने आदि का काम शुरू किया था वह भी भगवान् ने छीनकर अपने हाथ में ले लिया।
हुआ क्या कि पच्चीस-तीस वर्ष बाद वही युवक अब अधेड़ उमर का हो गया और एक चाय-पार्टी पर मुझे भी बुलाया। वहाँ हजारों आदमी आये हुये थे। मैं हक्का-बक्का बीच में खड़ा था। मित्र ने दूर से देख लिया और भागते हुए आए, ‘‘जौहर साहब, जौहर साहब! नमस्कार! आपसे एक बहुत ज़रूरी काम है।’’ मैं हैरान हो गया कि मुझसे क्या काम हो सकता है।
मैंने कहा, ‘‘आप तो अरब-ख़रबपति है। आपने सैकड़ों उद्योग लगाएँ हैं। मुझसे आपका क्या काम हो सकता है?’’
उन्होंने कहा, ‘‘यह बात तो ठीक है। उद्योग तो मैं और बहुत लगा सकता हूँ और पैसे की कोई कमी नहीं है। परन्तु जो काम मैं करना चाहता हूँ वह आप ही कर सकते हैं। आप उस रास्ते पर हैं आपकी ही वह लाइन है।’’
‘‘देखिए मैंने कई जगह आश्रम बनाए। पन्द्रह-बीस मन्दिर भी बनाए। यहाँ भी एक बड़ा मन्दिर बनाया है जिसमें सैकड़ों संगमरमर की मूर्तियों के साथ श्रीअरविन्द की मूर्ति भी बनाई है। आपने ही तो खड़े होकर बनवाई थी। हरिद्वार, ऋषिकेश, मथुरा, वृन्दावन और कई तीर्थस्थानों पर आश्रम और मन्दिर बनाए। परन्तु सब जगह बुरा हाल है। कोई महन्त, महात्मा, साधु, संन्यासी और पुजारी ही नहीं मिलते जो इन मन्दिर और आश्रमों को चला सकें। मैं कोई भी वेतन देने के लिए तैयार हूँ, परन्तु ऐसे महात्मा पुजारी आप ही ढूँढ़कर दे सकते हैं क्योंकि आप उस रास्ते पर हैं।’’
मैंने कहा, ‘‘यह तो आसान बात है। आप तो यूँ ही घबरा रहे हैं।’’
उनकी आँखें चमक उठीं, चेहरा खिल गया और बड़े प्रसन्न हो गए। पूछने लगे, ‘‘यह कैसे होगा?
मैंने कहा, ‘‘आपने सैकड़ों कारख़ाने लगाए हैं, एक कारख़ाना साधु, महात्मा, महन्त और पुजारी बनाने का भी लगा दीजिए। धड़ाधड़ मशीनों से बनते चले जायेंगे और आप जो चाहे जितने अपने आश्रम और मन्दिर बना सकते हैं।’’
वे तो एकदम फ़ीके पड़ गए, घबरा गए और शर्मिन्दा हो गए।
इन पच्चीस सालों में हमारी भी ऐसी ही दुर्दशा हुई। चाहे वह और क़िस्म की हो।
जब माताजी ने दिल्ली आश्रम बनवाया तो वह पाकिस्तान बनने का ज़माना था। हज़ारों पाकिस्तान से उजड़े हुए लोग दिल्ली में आकर बसे थे और कोई-कोई लोग आश्रम का नाम देखकर अन्दर आ जाया करते थे। अधिकतर अधेड़ उम्र के और बूढ़े - और पति-पत्नी दोनों। मैं सामने खड़ा होता था। आश्रम में उन दिनों कोई ख़ास रौनक़ तो होती नहीं थी। मेरे कपड़े फटे-पुराने और धूल-मिट्टी से भरे होते थे। मुझसे पूछते थे, ‘‘क्या जी यह आश्रम है?’’ मैं कहता, ‘‘हाँ जी! यह आश्रम है।’’
तो हाथ जोड़कर कहते, ‘‘आपकी बड़ी कृपा होगी महात्माजी के दर्शन करवा दीजिए।’’
मैं कहता, ‘‘यहाँ और तो कोई नहीं हैं। मैं ही हूँ।’’
वे फिर हाथ जोड़ने लगते और मिन्नत करने लगते, ‘‘आपकी बड़ी मेहरबानी होगी यदि आप महात्माजी के दर्शन करवा दें।’’
मैं ऊपर से मिस्टर पियर्सन (Mr. Pearson) को बुलाता जो अंग्रेज़ थे और माताजी ने उनको यहाँ स्कूल में पढ़ाने के लिए भेजा था। तो ये लोग और भी चकरा जाते और कहते, ‘‘आप तो मज़ाक़ कर रहे हैं। हम बहुत दुखी हैं पाकिस्तान से उजड़कर आए हैं। महात्माजी के दर्शन करवा दें तो कुछ सान्त्वना मिले।’’
उन लोगों की समझ में ही न आए कि यह कैसा आश्रम है जिसमें महात्मा हैं ही नहीं। तो मुझे अपने उस मित्र की याद आ जाती और सोचता कि अगर उन्होंने कारख़ाना लगा लिया हो तो कुछ महात्मा वहाँ से मंगवा लिए जाएँ।
परन्तु हमारी ‘माँ’ का तो रास्ता ही दूसरा था। जो कोई गेरुवे कपड़े पहने हुए बने बनाए महात्मा आते भी थे उनको या तो अस्वीकार (रिजैक्ट) कर देती थीं या उनके महात्मागिरी के कपड़े ही उतरवा देती थीं। मैं कई संन्यासियों को लेकर गया यहाँ के लिए। माताजी ने सबको अस्वीकार कर दिया।
जब हम लोग गिनती में कुछ बढ़ गये तो इस समस्या को हल करने के लिए सोचा करते थे कि हममें से तीन-चार अपना रंग-रूप और वस्त्र तैयार रखें कि जब कोई ऐसी स्थिति आये तो उन लोगों को महात्मा दिखाकर उनकी सन्तुष्टि कर दिया करें। एक तो रुंड-मुंड और तिलकधारी हो, गले में माला पड़ी हुई हो। दूसरा कनफटे के रूप में हो - और तीसरा तो बहुत आसान था, क्योंकि मेरे नज़दीकी रिश्तेदार सिख हैं। वे अपने केश खोल लिया करें और दाढ़ी भी खोल लिया करें फिर तो अपने-आप महात्मा बन गये। परन्तु ये स्कीमें, योजनाएँ भी चली नहीं और वहीं के वहीं रह गये। वरना इस रास्ते से भी हम लखपति और करोड़पति हो सकते थे। माताजी और श्रीअरविन्द ने उल्टा ही रास्ता बताया है कि महात्मा और महन्त अन्दर
से ही बनो बाहर से नहीं। बाहर से तो कितना आसान था कि गेरुवे कपड़े रंगवाते और पहन लेते और झट
महात्मा बन जाते। पर यह तो बहुत ही कठिन रास्ता है। पता नहीं बन भी सकेंगे कि नहीं। लेकिन चल तो रहे ही हैं और प्रगति भी कर रहे हैं। देखें कब कुछ बनते हैं। दूसरी ओर और तरह के आसार भी हैं। दिन में कैम्पस् में चार-पाँच हज़ार आदमी
होते हैं। दो हज़ार तो स्कूल में बच्चे ही हैं। दो-चार सौ लोग खाना खाते हैं। बाहर से देश-विदेशों के भाँति-भाँति के रंग-रूप में पच्चीस-पचास लोग प्रतिदिन आते-जाते हैं, रहते हैं। ख़ूब काम भी करते हैं। अगर आश्रम नहीं तो भी यह बहुत अच्छा चिड़ियाघर तो ज़रूर नज़र आता है। यह
देखकर बहुत आनन्द होता है। देखकर बहुत आनन्द होता है।