सफेद कुत्ता
हम किसी भी कुत्ते को आश्रम के अहाते में नहीं आने देते। क्योंकि यह किसी भी तरह से अच्छा नहीं है। स्कूल में 1500 छात्र पढ़ते हैं। उनकी सुरक्षा के लिए हमें सतर्क रहना पड़ता है।
किन्तु आश्चर्य की बात है कि कुछ महीनों से एक बिल्कुल सफ़ेद कुत्ता हमारे अहाते में ज़बरदस्ती आकर हमारी अत्यधिक हैरानी का कारण बना हुआ है। लाठी-चार्ज, पिटाई और बार-बार उसे यहाँ से खदेड़ देना आदि सब उपाय हमने अपनाये परन्तु कुत्ता उन सब कष्टों तथा सज़ाओं को सहने के बावजूद बार-बार आ जाता है और समाधि के मैदान में बैठ जाता है। वास्तव में हम बुरी तरह थक हार गये परन्तु इस कुत्ते को अपने अहाते से बाहर करने का कोई साधन-समाधान नहीं ढूँढ़ सके।
अंत में हमने उसे पकड़ कर रस्सियों से बाँधा और कार में डाल दिया और ड्राइवर को कहा कि उसे कहीं दूर छोड़ आये। ड्राइवर उसे तुग़लक फ़ोर्ट, जो कि आश्रम के अहाते से लगभग सात मील दूर है, छोड़ आया और जैसा कि हम चाहते थे, इससे हमें बहुत आराम मिला।
लेकिन अफ़सोस! चार दिनों के बाद हमने फिर उसे अपने अहाते में पाया। हम बहुत हैरान थे और हमारी सारी पुरानी चिन्तायें फिर सामने आ गईं।
कुछ दिनों के बाद एक बार फिर हमने उस कुत्ते को बाँधा और कार में डाल दिया। अधिक निश्चिंत होने के लिए तारा जौहर स्वयँ साथ गयीं और उसे आश्रम से लगभग दस मील दूर पहाड़गंज में शहर की भीड़ में छोड़ दिया। अब हम ख़ुशी का अनुभव करने लगे और सुख की अन्तिम साँस ली।
लेकिन कैसे दुःख की बात है। पन्द्रह दिन के बाद हमने उसे अहाते में पुनः पाया। कैसे कुत्ते ने इतनी कठिनाइयों और यातनाओं को सहते हुए तंग गलियों और शहर की बड़ी तथा लम्बी, यातायात से भरी सड़कों को पार करके दो सप्ताह के कठिन प्रयत्नों के बाद अपना पुराना आश्रम का रास्ता ढूँढ़ा! शायद बिना पानी तथा खाने के रहा हो। यह एक आश्चर्य है, चमत्कार है।
और उससे भी आश्चर्यजनक तथा चमत्कारपूर्ण उसका उस समय का व्यवहार था जब हम उसके पास गये जहाँ वह समाधि के आसपास घूम रहा था। वह दुम हिलाता हुआ बार-बार हमारे पाँव चाटने लगा, ऐसे कारुणिक हाव-भाव दिखलाते हुए मानों अपने स्थान-समाधि के प्रांगण में रहने की अनुमति प्राप्त करने के लिए भिक्षा माँग रहा हो और प्रार्थना कर रहा हो।
हमें बहुत दया आयी, यहाँ तक कि उसके प्रति अपने कठोर व्यवहार पर दुःख हुआ। यह स्पष्ट था कि ध्यान न देने, मारने तथा बार-बार निकालने पर भी वह बाहर रहना पसन्द नहीं कर सकता था।
सारा घटना-चक्र कितना रहस्यमय है! एक जीता-जागता कुत्ता, समाधि के प्रांगण से गहरा लगाव रखे; बाहर छोड़ आने पर भी वहीं रहने को हठ करे; इतना उत्सुक, मानो इसलिए कि उसे वहीं रहने की अनुमति दी जाये।
यह सब क्या है?
हमने पूर्व-जन्मों तथा उनके अनुभवों के इस जन्म में रहस्यमय रूप में कार्य करने की कहानियाँ सुनी हैं। यह कुत्ता पहले कौन था? क्या उसका यहाँ से कोई सम्बन्ध था? क्या उस तरह का कोई खेल इस घटना में भी है? हम वास्तव में इसके पीछे का रहस्य नहीं जानते।
परन्तु यह सब हैरानी उत्पन्न करने वाला है।