पावन संस्मरण (भाग 1)
27

इंसान


बहुत कुछ हो रहा है इस तरक़्क़ी के ज़माने में

मगर यह क्या ग़ज़ब है आदमी इन्सां नहीं बनता

कारख़ानें ही कारख़ाने लग रहे हैं, फैक्टरियाँ ही फैक्टरियाँ। छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी चीज़ें बनायी जा रही हैं। नित्य नयी-नयी चीज़ें बनायी जा रही हैं। नित्य नयी चीज़ें बनाने की नयी-नयी मशीनें लगायी जा रही हैं और वे भी ऑटोमेटिक (Automatic) ताकि इन्सान का इस्तेमाल न हो सके, ग़रीबी और भूख क़ायम रहे और यदि इंसान का इस्तेमाल हो भी तो इन्सान जड़-मशीन बन जाये। इतने बड़े-बड़े करिश्मे, चमत्कार...। जो बुद्धि कभी सोच भी नहीं सकती और कभी ऐसा अन्दाज़ या ख़्याल भी नहीं हो सकता था कि ऐसा ज़माना भी आ सकता है और ऐसी-ऐसी चीज़े भी बनायी जा सकती हैं ।....

विज्ञान और तकनीकी विज्ञान ने हद कर दी। यह कहाँ तक पहुँच गया है इसका कोई आर-पार नहीं और अचम्भे की बात यह है कि यह दौड़ कहीं रुकनेवाली नहीं है। नये से नये करिश्मे दिखाने के लिए संसार के वैज्ञानिक जुटे हुए हैं। चाँद तक पहुँच गये हैं और दूसरे सितारों पर उतरने के पीछे पड़े हुए हैं। शान की बात तो यह है कि ये सब दुनिया भर की चीज़ें बनाने के यंत्र और कारख़ाने सरकार लगा रही है। बड़े-बड़े लोहे, सीमेण्ट, चीनी कपड़े, दवाइयाँ, खाद के कारख़ानों से लेकर हर तरह के छोटे कारख़ानें, होटल, रेस्तरां, कैण्टीन जिनमें चाय-काफ़ी और कोकाकोला पिलाया जाता है, के ले-सन्तरे, पकौड़े-चाट, आलू-छोले, पूरी-कचौड़ी और आइसक्रीम खिलाये जाते हैं, ऐसी दुकानें भी अब सरकार खुद ही चला रही है और इनके लिए अलग-अलग मन्त्रालय बनाये गये हैं।

लेकिन इन्सान बनाने का न कोई कारख़ाना बनाया गया है और न मन्त्रालय ही बनाया गया है।

पहले ज़माने में जब विज्ञान और तकनीकी विज्ञान का ज्ञान नहीं था और ज़ोर नहीं था तब इन्सान ही बनाये जाते थे। गुरु नानक, गुरु गोविन्दसिंह, तुलसीदास, मीराबाई, सूरदास, त्यागराज, कबीरदास, रानी लक्ष्मीबाई, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, जगदीश चन्द्र बोस, सी0वी0 रमन, सी0आर0 दास, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी दयानन्द, रानाडे और गोखले, लाल-बाल पाल, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गाँधी, चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगतसिंह, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद, सरोजिनी नायडू, ज़ाकिर हुसैन, स्वामी श्रद्धानन्द, महात्मा हंसराज, आचार्य विनोबा, नादयोगी अब्दुल करीम खाँ और ऐसे-ऐसे हज़ारों-लाखों को किसने बनाया? अब वे कारख़ाने कहाँ चले गये? कितनी सरलता, संजीदगी, बुद्धिमत्ता, मिटाव-बलिदान की भावना थी उनमें! क्या वह नस्ल ही अब ख़त्म हो गयी? क्या अब ‘आयाराम और गयाराम’ की नस्ल ही रह गयी है? नहीं -नहीं। यह भारतवर्ष है। वह नस्ल कभी नहीं ख़त्म हो सकती। उस नस्ल के लोग अभी लाख़ों में मौजूद ज़रूर हैं। परन्तु इस समाज के ढाँचे में उनका कोई स्थान नहीं है।

वे आगे क्यों आयें? वे क्यों चुनाव में खड़े हों? पैसे भी खर्च करें, भ्रष्टाचार में भी पड़ें और पार्लियामेण्ट के मेम्बर और मन्त्री बनने के लिए भीख माँगे और खुशामदें भी करें?

मैं किसी कारण घर से भाग कर दिल्ली आ गया था। कुछ साल टोकरी उठायी, मज़दूरी की। स्थान-स्थान पर स्वयँसेवक का काम किया। फिर जाकर कुछ छुटपुट नौकरी की। एक दिन ऐसा आया कि चूना बेचने की दूकान खोल ली। उम्र 21-22 वर्ष की थी। एक दिन मेरी ही उम्र का एक नौजवान दूकान पर आ चढ़ा बीस मन चूना लेने के लिए। मैं यों ही उनका परिचय पूछ बैठा: ‘इस चूने का आप क्या करेंगे?’ अचम्भे की बात तो यह हुई कि वे भी कहने लगे कि, ‘‘मैं घर से भाग कर आया हूँ और कहीं एक कोठरी बनाकर कोई धन्धा शुरू करना चाहता हूँ।’’ बस फिर क्या था! मिल गये दीवाने दो। घण्टों अपनी-अपनी कहानी सुनाने लगे। दोस्ती हो गयी। मैं तो पिछड़ता ही चला गया। आर्य कुमार सभा से आर्य समाज, आर्य समाज से काँग्रेस, ख़िलाफ़त और स्वाधीनता संग्राम, जेलों की सैरें, डण्डा-बेड़ी-कालकोठरी, ख़ूब लम्बी दौड़ और जान की बाज़ी और आख़िर में लुढ़कता-लुढ़कता श्रीअरविन्द आश्रम।...और वहीं ढेर हो गया।

और वह दोस्त! वह दोस्त कहाँ रहे! अब उनकी दौड़ सुनिए! कारख़ानों पर कारख़ाने, फैक्टरियों पर फैक्टरियाँ, आसमान से बातें करती चिमनियाँ, बीस-पचीस मील के दायरे में धुआँ ही धुआँ कर दिया। कितने कारख़ाने लगाये, कितनी मिलें लगायीं- चीनी, साबुन, कपड़ा, बिस्कुट, तेल; क्या-क्या लिखूँ और क्या-क्या बताऊँ! बिना मुबाल्ग़ा सैकड़ों कारख़ाने लगा दिये। फिर क्या सूझी! मन्दिर, शिवाले, आश्रम और धर्मशालाएँ बनाना शुरू कर दीं! दस-बीस ये भी बना डालीं।

एक दिन हम लोग पहाड़ों के मन्दिरों और आश्रमों से घूमते-घूमते आ रहे थे कि रास्ते में इन मित्र का स्थान आ गया। सोचा कि मिलते चलें। प्रातः का समय था। बड़ी अच्छी तरह मिले और स्वागत-सत्कार किया। पूछने लगे: ‘‘क्या पीयेंगे चाय, कॉफ़ी, ठण्डाई, कोकाकोला, शरबत, दूध, फलों का रस, लस्सी?’’ हम लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे और आँखों के इशारों से निश्चय करके कहा कि ‘‘आप के घर तो दूध पीयेंगे!’’

‘‘हाँ-हाँ, जितना मर्ज़ी पीजिये। मैंने तो अपनी गायें रखी हुई हैं।’’ आवाज़ देते ही सबके लिये गाय का दूध आ गया। दूध क्या था। अमृत था। उसकी खुशबू और स्वाद का वर्णन नहीं किया जा सकता। गायें तो हमनें भी रखी हुई हैं परन्तु हमारी गायें तो ऐसा स्वादिष्ट और खुशबूदार दूध नहीं देतीं। हमनें पूछा: ‘‘आपने इस दूध में क्या-क्या मिलाया है?’’ वे कहने लगे: ‘‘मिलाया तो कुछ नहीं, परन्तु हम अपनी गायों को चारे में बादाम-पिस्ता, नारियल, अखरोट, किशमिश, मुनक्का, खुरमानी, खजूर, काजू, छोटी-बड़ी इलायची ये सब ख़ूब डालते हैं। - और उन सब का रस दूध में आ जाता है।’’

इसके बाद कई साल बीत गए। अचानक एक दिन किसी पार्टी में मिल गए। बड़े तपाक् से नमस्ते की। मैंने कहा: ‘‘ऐसी क्या दोस्ती और मुहब्बत’’ उन्होंने कहाः ‘‘नहीं नहीं। आपसे एक ज़रूरी काम है जिसे आप ही कर सकते हैं। और कोई नहीं कर सकता!’’ मैंने विश्वास और दिलासा देकर कहा:ः ‘‘फ़रमाइये फ़रमाइये! ऐसा कौन सा काम है जो मैं ही कर सकता हूँ। मैं तो हाज़िर हूँ आपका हुक़् म बजा लाने के लिए।’’

दोस्त अपनी धुन में कहने लगे: ‘‘आपको मालूम ही होगा। मैंने सैकड़ों कारख़ाने लगाये हैं। हज़ारों चीज़ें बनाता हूँ। लाखों आदमी मेरे पास काम करते हैं। मैं इंगलैण्ड, अमेरिका, रूस, जर्मनी, डेनमार्क सारी दुनियाँ में दौड़ा-दौड़ा फिरता हूँ और नए से नए कारख़ाने लगाने की स्कीमें लाता हूँ। इन सब कामों में भगवान् की दया से बड़ी निपुणता प्राप्त की है। इसमें तो मुझे कोई समस्या और दुविधा नहीं है। सब ख़ूबी से चल ही रहे हैं। हाँ अभी इन्हीं सालों में ‘कुछ मन्दिर, शिवाले, पाँच-सात जगह आश्रम और धर्मशालाएँ खोली हैं। परन्तु इनको चलाने के लिए साधु-संन्यासी और महात्मा नहीं मिलते। यह तो आपकी ही लाइन है। आपका ही क्षेत्र है। आप ही ढूँढ़कर उपयुक्त संन्यासी, महात्मा और साधु-सन्त दे सकते हैं। मैं उन लोगों को दो-चार सौ पाँच-सौ, हज़ार रुपए महीने तक पगार देने को तैयार हूँ।’’

मैंने विश्वास से पटाक् से जवाब दिया। ‘‘यह तो बिल्कुल मामूली बात है। बड़ी आसान है!’’ उनकी तो आँखें चमक उठीं। चेहरा बशाश (प्रसन्न) हो उठा। पूछने लगेः ‘‘वह कैसे?’’ मैंने कहा: ‘‘चार-पाँच एकड़ ज़मीन लेकर दस-बीस लाख रुपये लगाकर एक कारख़ाना साधु-संन्यासी और सन्त-महात्मा बनाने का भी लगा दीजिए। और ऑटोमैटिक (Automatic) मशीन इम्पोर्ट कर लें और 20-24 एकड़ ज़मीन, दो-चार करोड़ रुपये लगा दें तो फिर क्या है! - धड़ाधड़ साधु-संन्यासी-सन्त-महात्माओं का उत्पादन होगा। जितने मरज़ी मन्दिर-शिवाले और आश्रम बनाते जाएँ, ख़ूब चलेंगे!’’

उनका चेहरा जितना फूला था वापस उतना ही ढलक गया।