पावन संस्मरण (भाग 1)
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पठान


इन ख़च्चरों के वाहक और मालिक पठान हैं जो कभी सौ वर्ष पूर्व पेशावर और काबुल से यहाँ आकर बस गये थे और ये इस पहाड़ी इलाके में माल इधर से उधर ढोने का काम करने लगे। उस ज़माने में ट्रक आदि नहीं थे और अब भी पहाड़ों में ख़च्चर ही काम करते हैं जहाँ ट्रक आदि नहीं जा सकते।

अब तो ये पठान लोग यहाँ के ही वासी हो गये हैं। इनके बच्चे पहले एक दो साल मसज़िद में पढ़ने जाते हैं, फिर यहाँ के स्थानीय हिंदी माध्यम के स्कूलों में। इनका रहन-सहन और व्यवहार धीरे-धीरे बदलता चला जा रहा है।

मेरी इन लोगों के साथ काफ़ी नज़दीकी है - और मेल-जोल है। क्योंकि मैं इन लोगों के देश के पास का रहने वाला हूँ जो अब पाकिस्तान में है। ये लोग आपस में तो पश्तो बोलते हैं जो मुझे अच्छी लगती है और मैं कुछ समझता भी हूँ, परंतु हम लोगों के साथ तो वे चालू हिन्दुस्तानी में ही बात करते हैं। इन लोगों के साथ मेरा काफ़ी-कुछ समय प्रतिदिन बीतता है क्योंकि ये लोग कई घंटे रोज़ाना हमारे यहाँ रहते हैं। ख़च्चरों से माल उतरवाते हैं, उनकी गिनती और नपाई करवाते हैं और अपना हिसाब बनवाकर उसका भुगतान लेते हैं।

इस दौरान में उनसे काफ़ी नज़दीकी होती है। बातचीत होती है और हँसी-मज़ाक़ चलता है। यह जिंदगी भी तपस्या और योग ही तो है।

मैं उनसे कहता हूँ कि ‘आप रोज़ाना मुझे ठगकर और लूटकर ले जाते हैं। जितना रुपया मेरे पास होता है वह सब ले जाते हैं।’

‘यहाँ तक ही नहीं मैं ईंटों, सीमेंट और रेत के ढेर लगवाता हूँ और दूसरे दिन उठकर देखता हूँ तो वे सब ग़ायब हो जाते हैं। ऐसा नज़र आता है कि दिन में आप ढेर लगा जाते हैं और उसकी क़ीमत ले जाते हैं और रात को सब माल भी उठाकर ले जाते हैं और दूसरे दिन प्रातः वही माल फिर ले आते हैं।’

तो वे पठान लोग जवाब देते हैं कि ‘हां हम तो जादूगर हैं। जादू करने के लिए ही तो इतनी दूर से आये हैं वरना आते ही क्यों?’

ये दोनों पठान भाई हैं - और इनके नाम हैं मुस्तग़फ़्फर शाह और गुलनज़ीर खाँ। उनका व्यवहार एक प्रकार से ऐसा ही है जैसा कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपनी मशहूर कहानी ‘काबुलीवाला’ में चित्रित किया है।

पठान हैं तो इनका लम्बा-ऊँचा, शानदार डीलडौल, सादी पोशाक सिलवार-कोट और ज़री के कुल्ले के ऊपर पगड़ी और ऊँचा तुर्रा।

ये लोग बग़ैर शिक्षा के भी बहुत मीठे, समझदार और पूरी सूझबूझ वाले हैं। एक तो उनमें हज़ारों लाखों के लेन-देन पर अंगूठा ही लगाता है और दूसरा केवल नाम के दस्तखत (हस्ताक्षर) ही कर सकता है और कुछ नहीं। परन्तु अपने लेन-देन के हिसाब में कभी नहीं चूकते और कभी कोई भूल भी नहीं करते। हिसाब लगाने में ख़ूब होशियार हैं।

ईद-उल-फ़ितर के दिन गुलनज़ीर खाँ मेरे पास आया और सरलता व गंभीरता से कहने लगा कि ‘मैं आपके लिए क़ु र्बानी का पवित्र गोश्त लाऊँगा। आप लोगों के खाने के लिए।’

मैं हँसा और उसको समझाया कि ‘भाई मैं तो माँस आदि खाता नहीं हूँ।’ बहुत तर्कों द्वारा बतलाया कि मुझे माँस खाना छोड़े हुए पैंसठ वर्ष हो गये हैं और मैंने इतनी लम्बी तपस्या की है।’

गुलनज़ीर खाँ की समझ में कुछ नहीं आया। वह यही कहता रहा - ‘आप चाहे खाते हों चाहे न खाते हों। यह तो पवित्र माँस है इससे तपस्या भंग नहीं होती। और आप सीधे बहिश्त (स्वर्ग) में जायेंगे।’

मैंने बहिश्त में जाना नामंज़ूर कर दिया।

दूसरे दिन गुलनज़ीर खाँ हम लोगों के लिए एक छोटा-सा मिठाई का डिब्बा ले आया। मैंने गरजकर कहा - ‘यह क्या? बाकी सब सामान तो खच़्चरों पर लाते हैं और मिठाई का यह छोटा-सा डिब्बा हाथ में ले कर चले आये! यह तो पाँच मिनट में ही ख़तम हो जायेगा।’

तो वे कहने लगे - ‘ये ईंट पत्थर नहीं हैं। इनमें मिठास भरी है। प्यार भरा है। पवित्रता भरी है। दुअ़ा (प्रार्थना) भरी है। जो कि सदा ख़ुशहाली लायेगी।’