पावन संस्मरण (भाग 1)
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ख़च्चर


मैंने क़िस्मत को भी देख लिया घिस-घिसके!

मुझे यहाँ हिमालय में सात दिन के लिए भेजा गया था। क्योंकि मेरा स्वास्थ्य कुछ अच्छा नहीं था। यहाँ आकर मैं साधना और तपस्या में फँस गया - और अब नौ महीने हो रहे हैं।

यहाँ मेरा साथ और सत्संग सारा दिन ख़च्चरों और पठानों के साथ रहता है। क्या ख़ूब!

पहाड़ की चोटी पर जहाँ हमारा स्थान है वहाँ कोई ट्रक तो आ नहीं सकते, वे तो हमारा सब सामान नीचे सड़क पर ही फेंककर चले जाते हैं - और ये ख़च्चर ही सारा दिन ऊपर ढोते रहते हैं। मेरा काम सारा दिन ईंट-पत्थर, रेता, बजरी, चूना, लोहा, सीमेंट नापना, गिनना और संभालना रहता है।

सात ख़च्चर। ऊपर-नीचे ऊपर-नीचे। ताँता लगा रहता है। मैं इनकी बुद्धि, सूझबूझ, चतुराई और स्वानुशासन देख-देखकर हैरान रह जाता हूँ।

जब इनकी पीठ पर ईंटें लादी जाती हैं तो सीधे वहाँ जाते हैं जहाँ ईंटें उतारनी होती हैं। जब इनकी पीठ पर रेत या बजरी होती है तो जहाँ रेत व बजरी के चट्टे लगाये जाते है वहाँ जाकर खड़े होते जाते हैं। जब इनकी पीठ पर सीमेंट लदा होता है तो सीधे सीमेंट के गोदाम के अन्दर चले जाते हैं। हैरानगी की बात है।

इतना ही नहीं। उनका हाँकने वाला छड़ी हाथ में लिये हुए जब पीछे से आता है तो उसके पहुँचते ही झट पीठ झुका देते हैं ताकि वह आसानी से बिना झटके के बोझ उतार सके - और कई बार तो वे खुद ही बोझ उतारकर फेंक देते हैं।

बोझा उतरते ही वे आराम से एक-एक करके चल देते हैं। और इधर-उधर घास चुगने लगते हैं - इस इंतज़ार में कि जब तक उनके सभी साथी अपना-अपना बोझ उतार कर न आ जायें। - और जब-कभी समय मिले या दाव लगे तो ‘लोट’ भी लगा लेते हैं।

बस! फिर नीचे की ओर को भागते हैं। अगला बोझ लाने के लिए। कोई कोताही नहीं - कोई ढील नहीं - कोई शिकायत नहीं। यह दौर चलता ही रहता है। इन सबके गले में रसीली और सुरीली घंटियाँ बँधी रहती है जिनमें उनकी चाल और दौड़ में लय ¼Rhythm½ बंधी रहती है। - और वातावरण में आनंद की गूँज बनी रहती है।

आप हैरान होंगे कि ये प्रातः पांच बजे अपना चारा आदि खाकर अपने काम पर ¼Duty½ आ जाते हैं और दोपहर तक बग़ैर साँस लिए लगे रहते हैं। तत्पश्चात् छुट्टी कर जाते हैं।

इन ख़च्चरों की आँखें ऐसी चमकती हैं जिनमें उनकी बुद्धि और सूझ-बूझ साफ़ झलकती है जैसे कि किसी बुद्धिमान और सूझ-बूझवाले मनुष्य में।

एक दिन मैं सड़क पर खड़ा उनका इंतज़ार कर रहा था। इतने में वे बोझ उठाये हुए आ गये। सामने एक चौड़ी नाली थी। जिस पर से साधारणतया बग़ैर सोचे-समझे लाँघना कठिन था। पहले ख़च्चर ने बहुत सूझ-बूझ और खूब सम्हलकर नाली के पार पाँव रखने की कोशिश की। बदकिस्मती से उसका पाँव फिसल गया और शायद गहरी चोट आ गई। मुझसे उसका चेहरा देखा नहीं गया। जिससे साफ़ नज़र आता था कि उसको बुरी चोट आई है और उसके चेहरे का भाव किसी मनुष्य की भाँति ही भर आया था। मुझे यह देखकर बहुत तरस आया और दुःख हुआ।

नमनीयता व मिटाव की प्रतिमूर्ति ये मूक पशु ख़च्चर इन दुर्गम पर्वतों पर निरंतर लगे रहते हैं - काम करते हैं - जिनमें अहसास है, सूझबूझ है, चेतना है। जहाँ ये मनुष्य की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ - साधन ट्रक आदि असफल हो जाते हैं वहाँ ये भगवान् की रचना - ख़च्चर ही कारगर होते हैं।