पावन संस्मरण (भाग 1)
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पानी के मटके


बचपन भी नहीं था जवानी भी नहीं -अभी कहीं बीच में ही थे। तो आर्यकुमार सभा का भूत सवार था। आग यह लगी हुई थी कि ईसाइयों की वाई.एम.सी.ए.(Young Men's Christian Association) की भाँति उनके मुक़ाबले में हम वाई.एम.ए.ए.(Young Men's Aryan Association) क्यों नहीं बना सकते? - वह थी आर्यकुमार सभा। वाह! मैं किधर फिसल गया। बात तो पानी के मटकों की बतलाने जा रहा था। हाँ, तो आर्यकुमार सभा के संचालन के प्रशिक्षण के लिए हम लोग उस उम्र में स्वामी श्रद्धानन्द जी

के पास जाया करते थे। हम लोगों की आयु उस समय अठारह और बीस वर्ष के अन्दर थी और स्वामीजी की शायद सत्तर के लगभग। सर्दी के दिन थे और शायद यही ठंड का मौसम था। हम लोग प्रातः अंधेरे में ही स्वामीजी के स्थान पर पहुँचे। स्वामीजी नया बाज़ार में दुकानों के ऊपर पहली मंज़िल में

रहते थे। अभी अंधेरा ही था, ठंड के कारण धुँध छाई थी। शायद अभी छः भी नहीं बजे थे। हमें तो आर्यकुमार सभा का सदस्य (मैम्बर) होने के कारण प्रातः उठना ही पड़ता था। जब स्वामीजी के यहाँ पहुँचे तो स्वामीजी के कमरे का दरवाज़ा खुला था और वे लंगोट बाँधे व्यायाम कर रहे थे। दरवाज़ा इसलिए खुला था कि प्रातःकाल की ताजी व ठंडी हवा अन्दर आ सके। हमें देखते ही स्वामीजी प्रसन्नचित हो गये कि नौजवान बच्चे इतने प्रातः आये हैं।

पहले इसके कि हम अपने आर्यकुमार सभा के सम्बन्ध की बातें उनके सामने रखें और

उनसे मार्गदर्शन लें मैंने पूछा- ‘स्वामीजी इतनी सर्दी में पानी के इतने बड़े-बड़े मटके बाहर खुली छत पर क्यों रखे हुए हैं?’ उन्होंने कहा- ‘बेटा स्नान के लिए। मटके अन्दर रखने से तो पानी गरम हो जाता है और स्नान का आनन्द नहीं आता है।’

यह सुनकर हमें भी आनन्द आ गया। और फिर आनन्द से अपने काम की बातें पूछीं।