पावन संस्मरण (भाग 1)
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खजूर


शायद मैं बारह-तेरह साल का था। दयानन्द ऐंग्लो वैदिक हाई स्कूल लाहौर में पढ़ता था। मेरे पिताजी की चिट्ठी आयी कि गर्मी की छुट्टियों में अपनी माँ के पास चले जाना जो अपने मायके जलालपुर कीकना ज़िला जेहलम में गई हुई थीं, यह स्थान लाहौर से परली तरफ़ पेशावर की तरफ़ था। मेरे पिताजी ने लिखा कि मैं बहुत दूर हूँ और अकेला हूँ और खाने-पीने की भी सुविधा नहीं है इस वास्ते मेरे पास आना ठीक नहीं है।

चाहे मैं छोटी उम्र का था परन्तु मुझमें आग भरी हुई थी कि ‘‘जो आसानी से मिल जाये वो मेरा रास्ता क्यूँ हो?’’- मैंने सोचा कि पिताजी अकेले हैं और दूर हैं तो उन्हीं के पास जाना चाहिये। पिता जी दूर तो नहीं थे। उस ज़माने में देश के अंतिम कोने पर थे। और मेरे लिए रास्ता ढूँढ़ना और वहाँ पहुँचना भी आसान नहीं था। वे थे पंजाब के अन्तिम जिले डेरा ग़ाज़ीख़ान में जो बिलोचिस्तान की हद पर था, जहाँ रेल तक भी नहीं जाती थी और बारह-पन्द्रह मील चौड़ा सिंध दरिया नावों में पार करके जाना पड़ता था। डेरा ग़ाज़ीख़ान से भी शायद सत्तर-अस्सी मील आगे रेगिस्तानी जंगल पार करना पड़ता था जहाँ एक गाँव में मेरे पिताजी महक़मा-बन्दोबस्त की ड्यूटी में थे। इस गाँव का नाम भी मुझे अभी तक याद है ‘गोलो-वाह’। थोड़े से घर मिट्टी के बने हुए। ईंट का कहीं नाम नहीं। छतें खजूर के पत्तों की।

मैं पूछते-पूछते, भटकते-भटकाते वहाँ पहुँचा। यदि सारी कहानी लिखूँ तो खजूर की बात लम्बी-दूर पड़ जायेगी। जब मैं वहाँ पहुँचा तो मेरे पिताजी हैरान हो गये और पकड़कर मुझे गले लगा लिया।

मैं यह सोचता-सोचता वहाँ गया था कि पिताजी खाने की सुविधा के बग़ैर बेचारे कमज़ोर हो गये होंगे व हड्डियाँ निकल आयी होंगी। लेकिन देखा उनको इससे उलटा। बहुत सेहतमंद लाल-सुर्ख चेहरा और खूब तगड़े। हैरान हो गया।

मैंने पिताजी से पूछा- ‘आपने तो लिखा था कि खाने-पीने की कोई सुविधा नहीं है। तो इतने अच्छे कैसे हो गये हैं? क्या आप खाने के साथ खूब घी-दूध मलाई खाते हैं?’’ वे सरलता से कहने लगे- ‘जब से मैं यहाँ आया हूँ और तुम्हारी माँ साथ नहीं है मैंने ख़ाना कभी खाया ही नहीं। शायद एक साल हो गया होगा।’ तो मैंने पूछा- ‘‘तो आप क्या खाते हैं?’ इस पर वे कहने लगे- ‘‘सवेरे काम पर जाने से पहले सेर-डेढ़ सेर खजूर खा लेता हूँ। और इधर-उधर गाँवों के घरों से ख़ूब लस्सी आ जाती है और वही पी लेता हूँ। और कुछ खाने की न कभी फुरसत मिली है और न कभी ज़रूरत हुई है।’’ मैं हैरान तो हो गया परन्तु बचपन था गहराई से कुछ भी नहीं समझा।

जब मैं वापस लाहौर स्कूल में पहुँचा तो उसके एक-दो साल के अन्दर ही वहाँ महात्मा गाँधी आ गये। और धूम मच गई कि, ‘‘एक ऐसा लंगोटीवाला महात्मा आया है कि जो केवल खजूर खाता है और बकरी का दूध पीता है।’’ मैं सुनकर हैरान हो गया और तभी मुझे अपने पिताजी की खजूरें खाने की बात याद आयी और सच्ची लगी। फिर बाद में सुना कि हज़रत मोहम्मद साहब भी खजूर ही खाया करते थे।

अब जब मैं बड़ा हो गया और इधर-उधर पढ़ने लिखने से कुछ ज्ञान हो गया तो पता लगा कि खजूर और दूध का आदर्श मेल है और यह पूर्ण आहार है। अनुमानतः एक पौंड खजूर और एक किलो दूध एक व्यक्ति के लिए एक दिन का न केवल पर्याप्त बल्कि उच्च कोटि का भोजन है। इसके अतिरिक्त मूँगफली और खजूर को साथ लेना भी अत्यन्त गुणकारी है। दोनों में एक-दूसरे के पूरक तत्त्व हैं। मूँगफली विटामिन बी व डी से युक्त है। जबकि खजूर प्राकृतिक शर्करा-प्रधान है। प्रोटीन को पचाने के लिए मीठा तो चाहिये ही, वह खजूर में होता है। अगर खजूर को नियमित रूप से खाया जाये तो यह कोष्ठबद्धता व कब्ज़ को भी दूर करता है। थकावट दूर करने में खजूर दूध, शहद और गुड़ से भी कहीं अधिक अच्छा होता है।

शरीर के सम्यक् विकास के लिए प्रोटीन बहुत आवश्यक तत्त्व है और खजूर में प्रोटीन पर्याप्त व प्रचुर मात्रा में होता है। प्रोटीन के अलावा खजूर में सोडियम, पोटाशियम, फॉस्फोरस, लोहा व चूना आदि खनिज तत्त्व भी होते हैं। इनका कार्य शरीर में खून की वृद्धि करना हड्डियों व दाँतों को पुष्ट करना होता है।

प्रोटीन व खनिज तत्त्वों के अलावा खजूर में काफी मात्रा में विटामिन ए, बी और सी होते हैं। ये सभी विटामिन शरीर को स्वस्थ निरोग रखने के लिए बहुत आवश्यक होते हैं।

वाह री खजूर! तेरे क्या कहने हैं।