पावन संस्मरण (भाग 1)
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पाकिस्तानी फौज़ी अफ़सर


जब हमारे देश का बँटवारा हुआ तो ऐसी अंधेरगर्दी हुई जिसकी मिसाल कहीं संसार में नहीं मिलती। दोनों तरफ से खूंख़ार कटाकटी चली। इधर की रेलों के मुसाफ़िरों को उन्होंने ख़तम कर दिया और उधर के मुसाफ़िरों को इन्होंने ख़तम किया। मैं इस ख़ूनी दौर का जिक्ऱ नहीं कर रहा हूँ वह तो सबको मालूम ही है। कहीं -कहीं कोई क़िस्मत से बच गये तो बचकर निकल आये उसकी भी कोई हद नहीं है। बड़े-बड़े अजीब क़िस्से हुए। बड़े-बड़े ज़ुल्म हुए। और बड़े-बड़े चमत्कार भी हुए।

हमारे ही आश्रम में एक व्यक्ति हैं जिनकी उम्र उस समय दो मास की थी। उनके सब रिश्तेदार चाचा-ताऊ आदि वहीं गाँव में काट दिये गये परन्तु यह बच्चा अपनी माँ के साथ बचकर निकल आया। अब वह हमारे स्कूल में बड़ी ऊँची Position - में है स्कूल का Vice-Principal है।

इसी तरह के एक दूसरे बच्चे का मैं ज़िक्र कर रहा हूँ। उसकी उम्र भी अभी दो मास की थी। भागते समय उसके माँ-बाप रो-पीट रहे थे कि हम इतने छोटे बच्चे को सम्हालकर कैसे भाग-दौड़ सकेंगे। कैसे दौड़-भागकर रेलगाड़ी या बस पकड़ेंगे। हमारा क्या होगा कुछ पता नहीं।

इनके पड़ौस में एक मुसलमान घराना था। उन्होंने सुझाव दिया कि ‘अभी आप इस बच्चे को हमारे पास छोड़ जाइये। जब कभी क़िस्मत होगी यह आपके पास पहुँच जायेगा।’

इस हिन्दू बच्चे को मुसलमान परिवार ने ऐसी अच्छी तरह पाला जिसका बयान करना भी कठिन है। अब न बच्चे को माँ-बाप की ख़बर है और न ही माँ-बाप को बच्चे की ख़बर है। ख़बर होने का कोई रास्ता भी न था।

बच्चा बड़ा हो गया। 18 साल की उम्र हो गयी और उसे पाकिस्तानी फ़ौज में कमीशन मिल गया।

मुसलमान परिवार ने यह सब ख़बर सच्चाई से पाकिस्तानी फ़ौज को दे रखी थी। पाकिस्तानी फ़ौजवालों ने भी अपने रिकार्ड में नोट किया हुआ था।

बरसों के बाद हिंदू माँ-बाप को पाकिस्तानी फ़ौज के मार्फ़त यह ख़बर मिली। उन्होंने प्रार्थना की कि ‘बच्चे को हमारे पास भेजा जाये।’ परन्तु बच्चे ने इंकार कर दिया कि ‘मैं यह सब नहीं जानता हूँ! मुझे तो जिस परिवार ने पाला है, बड़ा किया है मैं तो केवल उनको जानता हूँ।

आख़िर किसी न किसी तरह उसको माँ-बाप के पास भेजा गया और बतलाया गया कि ‘‘ये तुम्हारे माँ-बाप हैं।’’ बच्चे ने कहा, ‘‘होंगे, मुझे इससे क्या मतलब? मैं तो जहाँ हूँ वहीं अच्छा हूँ। मुझे इसमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मैं पाकिस्तान में हूँ या हिन्दुस्तान में।’’ ऐसी परिस्थितियाँ भी इस जुल्म के ज़माने में हुईं।

मेरा लिखने बतलाने का तात्पर्य यह है कि संसार तो और चीज़ है परन्तु उस वक्त के Politicians - राजनेताओं ने बग़ैर किसी की मर्ज़ी के, बग़ैर इन्सानियत के - इस तरह अदल-बदल कैसे कर दी! उन सब लोगों को कैसे अपने घरों से खदेड़ दिया! उनको क्या अख़्तियार था? इसमें न कोई कानून, न इंसानियत और न कोई किसी तरह का Argument – तर्क-वितर्क हो सकता है। वे स्वार्थी Politicians – राजनेता लोग पाकिस्तान बना बैठे और इधर हमारे भारतवर्ष के राजनीतिज्ञों ने न मालूम कैसे इसे मन्ज़ूर भी कर लिया। हालाँकि सबको इसे Resist – विरोध करना चाहिये था। महात्मा गाँधी जैसे नेता ने भी डटकर विरोध नहीं किया। - और करोड़ों लोगों के ऊपर नाजायज़ जुल्मों का पहाड़ ढा दिया।

मैं भी उस जुल्म का शिकार हूँ। मैं अपने गाँव को अभी तक भूल नहीं सकता। मुझे एक-एक पत्थर याद हैं जिन पर क़दम रख कर मैं चला करता था।

केवल एक श्रीअरविन्द ने ही अंत तक विरोध किया और उनकी Philosophy – विचारधारा अब भी Resist – विरोध कर रही है कि भारतवर्ष और पाकिस्तान का यह विभाजन ग़लत है, अप्राकृतिक है, नहीं होना चाहिये था। - और अब भी सब पक्षों को यह समझना चाहिये कि यह विभाजन ग़लत हुआ है। यह समझना चाहिये कि यह विभाजन ग़लत हुआ है।