पावन संस्मरण (भाग 1)
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श्री मदनगोपाल सागर


सागर जाकर सागर में मिल गये। श्री मदनगोपाल सागर अपनी धर्मपत्नी श्रीमती कौशल्या जी के साथ श्रीमाताजी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में दर्शन पर हम लोगों से कहकर पांडिचेरी आश्रम में गये। यह बतलाकर नहीं गये कि ‘‘अब मैं वापस यहाँ आऊँगा ही नहीं।’’ आनन्द के स्वरूप तो वे थे ही वहाँ वे ख़ूब चहल-पहल और आनन्द से रहे।

पहली मार्च उनका जन्मदिन था। और वे जन्मदिन की तैयारियों में लगे हुए थे। बैंक की तरफ गये। Travellers Cheque से रुपया लाने के लिए कि अपने जन्मदिन के उपलक्ष में आश्रम को भेंट करेंगे। श्रीअरविन्द के कमरे में बैठकर ध्यान करेंगे।

रास्ते में ही बैठ गये और ऐसा दौरा पड़ा कि दिल बुझ गया। हार्ट फेल (Heart Fail) हो गया। यहाँ बीस साल से नियमित रूप से सत्संग में आया करते। दोनों हंस के जोड़े की तरह।

आश्रम के बड़े भक्त और सच्चे हितचिंतक थे - साधक थे। शान्त स्वभाव। मीठी ज़ुबान। नम्रता और कृतज्ञता से भरे हुए। हर समय हँसते और

मुस्कुराते हुए। इंसानियत के साक्षात् पुतले थे। यह संसार अभी तक तो ऐसा ही चल रहा है कि जो आया है उसको एक दिन जाना

है। इस संदर्भ में देखा जाय तो श्री मदनगोपाल सागर कितने भाग्यशाली और भाग्यवान् व्यक्ति थे कि आश्रम की पुण्यभूमि में जाकर अपने ही जन्मदिन पर अपने शरीर की आहुति दे दी और माताजी की गोद में चले गये। अब माताजी स्वयँ उन्हें सम्हालेंगी।