मज़ेदार भेंट
अभी-अभी आश्रम परिसर में चलते-चलते सामने से एक सज्जन आ मिले। बड़े तपाक् से हाथ जोड़कर नमस्ते की। मुझे भी जवाब देना पड़ा।
मैंने कहा- ‘मुझे कुछ दिखाई कम देता है।’
उन्होंने कहा- ‘मुझे तो बहुत ही कम दिखाई देता है।’
मैंने कहा - ‘मैंने आपको पहचाना नहीं।’
उन्होंने झट जवाब दिया- ‘मैंने भी आपको नहीं पहचाना।’
मैंने कहा- ‘तो फिर आपने नमस्ते क्यों की?’
उन्होंने कहा- ‘मैं तो अब अंतिम दिनों में सबको ही नमस्ते करता रहता हूँ। जाने से पहले जितने महानुभावों को नमस्ते हो जाये उतना ही अच्छा है।’
मैंने पूछा- ‘क्यों, आपकी उम्र क्या है?’
उन्होंने कहा- ‘पहले आप बताइये आपकी उम्र क्या है?’
मैंने कहा- ‘मेरी उम्र तो छियत्तर साल की है।’
उन्होंने कहा- ‘मेरी छयासी साल की है।’ और यह कहकर मुझसे ख़ूब हाथ मिलाया।
मैंने पूछा - ‘आप रहने वाले कहाँ के है?’
उन्होंने कहा- ‘मैं पश्चिमी पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रांत (North West Frontier Province) का रहने वाला हूँ और वहाँ का रिटायर्ड सिविल सर्जन हूँ। छः सौ रुपये पेंशन मिलती है जो पाकिस्तान से आती है। कभी ज़िंदगी में शराब नहीं पी, कभी सिनेमा नहीं देखा, कभी ताश (ब्रिज) नहीं खेला, कोई बुरा काम नहीं किया, केवल एक शौक़ है। चार मील रोज़ाना सैर करने का।’ मैंने कहा-‘यही हाल मेरा है और मैं भी पश्चिमी पाकिस्तान के ज़िला जेहलम का
रहने वाला हूँ आपके ही समीप का।’ अब तो एक बार फिर, गले मिलकर भेंट हो गई! अब मैंने पूछा- ‘आप यहाँ आश्रम में कैसे आये हैं?’
वह कहने लगे- ‘यह आश्रम है? मुझे तो मालूम नहीं! यह क्या-कैसा आश्रम है?’
मैंने कहा- ‘तो फिर आप अन्दर कैसे आये?’
उन्होंने जवाब दिया- ‘मैं तो पूछते-पूछते इस पोस्ट ऑफिस से पोस्टकार्ड ख़रीदने आया हूँ।’
मैंने कहा- ‘चलिये मैं आपको आश्रम का ध्यान-मंदिर (Meditation Hall) दिखला दूँ।’ भगवान् के दर्शन करवा दूँ।
वह बोले- ‘अब क्या भगवान् के दर्शन करूँगा? उनके पास तो जाना ही है। वहीं जाकर दर्शन कर लूंगा।’
(बसंत-पंचमी 1 फरवरी 1979)