पावन संस्मरण (भाग 1)
38

बेग़म अख़्तर


उनके गाने, उर्दू की ग़ज़लें। क्या कमाल था। दुनियाँ को मोहित करके रखा हुआ था।

बेगम अख़्तर इस दुनिया से तो चली गई हैं लेकिन उनकी आवाज़ उनका जादू संसार में हज़ारों साल रहेगा।

जहाँ बेगम अख़्तर में सैकड़ों गुण थे और आकर्षक व्यक्तित्व था वहाँ यह भी था कि वह कभी किसी आयोजन के स्थान पर समय पर नहीं पहुँचती थीं। यह एक बड़े से बड़े और गुणी से गुणी व्यक्ति की ‘अदा’ बन जाती है और लोगों को मंजूर हो जाती है।

जब वे इधर-उधर जाया करती थीं तो रेलवे जंकशन पर, हवाई अड्डों पर दूर-दूर से आनेवालों की, उनके प्रशंसकों व शुभचिंतकों और प्रेमीजनों की कतार लग जाया करती थी। - उनको उनके पसंद के पान उन तक पहुँचाने में।

एक बार ऐसा हुआ कि उनके किसी मित्र-परिवार ने उनको शाम के खाने की दावत दी। जिसमें बेग़म अख़्तर और उनके पति को आना था। दावत देनेवालों ने शानदार भोजन तैयार किया और उनकी राह देखने लगे। आठ बज गये, नौ बज गये। दस और ग्यारह भी बज गये। और अब दावत देने वाले कुछ शिक़ायत करना चाहते थे कि ‘‘यह क्या बेहूदगी है कि हम सारी रात खाना बनाकर, गरम रख-रखकर, इंतज़ार कर करके थक गये तो आप आधी रात के भी दो घंटे बाद तशरीफ़ ला रही हैं।’’

बेग़म अख़्तर बोलीं- ‘‘आप फ़िक़र न करें हम खाना खाने नहीं आये हैं। इतनी देर में और इस नामुनासिब समय पर आने का अफ़सोस भी है। हमारी यह मुसीबत हो गई थी कि हमारे घर में चूहे बहुत हो गये थे उनको इकट्ठा करने में इतनी देर लग गई थी। देखिए न इस पिंजरे में हमने चौबीस चूहे इकट्ठे किये हैं। आप हमारी जुस्तजू की भी दाद दीजिए। लगन को सराहिये। अब हमने सोचा कि बजाय इसके कि इन चूहों को किसी दूर अजनबी जगह पर छोड़कर आएँ क्यों न आप जैसे दोस्त और ख़ैरख़्वाह के घर छोड़ दें! तो ये चूहे आपकी नजर हैं।’’