पावन संस्मरण (भाग 1)
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दूध में केशर


सुना है कई सौ साल हुए, जब पारसी लोगों को अपना देश, अपना घर-बार छोड़कर भागना पड़ा था और उन्होंने भारतवर्ष की शरण में आना शुरू किया था।

कुछ पारसी लोग बड़ौदा राज्य में आ गये। धीरे-धीरे सैकड़ों आ गये और अकस्मात् हज़ारों ....! राजा को कुछ पता ही नहीं लगा। परन्तु यदि कोई परेशान लोग बेघर होकर कहीं आ भी जायें तो उनको दुत्कारा और निकाला भी कैसे जा सकता है!

धीरे-धीरे हद हो गयी और बड़ौदा राज्य को भी काफ़ी परेशानी होने लगी। राजा ने पारसी लोगों के मुखियाओं और नेताओं को बुलाकर बहुत प्रेम से और विचार से समझाया कि राज्य की स्थिति गम्भीर होती जा रही है और राज्य के लोगों की दशा चिंताजनक होती जा रही है और राज्य इतने अधिक लोगों को नहीं रख सकता।

फिर उन्होंने दूध से लबालब भरा हुआ एक प्याला मँगवाकर सामने रख दिया और कहा, “हमारे राज्य का स्थान इस प्याले की तरह लबालब भर चुका है। इसमें और गुंजाइश नहीं है।”

पारसी नेता ने नम्रतापूर्वक कहा, “हुज़ूर, ग़ुस्ताख़ी माफ़! इसमें अब भी गुंजाइश है!” “कैसे?” राजा ने आश्चर्यपूर्वक पूछा!”

नेता ने अपने जेब से एक पुड़िया निकाली और उसमें से कोई चीज़ निकालकर भरे हुए प्याले पर बिखेर दी। वह थी केशर। तैरने लगी। नेता ने कहा, “हम लोग आपको विश्वास दिलाते हैं कि जब आपने हमें शरण दी है तो हम आपके राज्य में दूध के प्याले में केशर की तरह रहेंगे। आपको कोई परेशानी नहीं होगी। और आपके राज्य में हम केशर की तरह सुगन्ध भर देंगे।”