पावन संस्मरण (भाग 1)
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मर्ज़ी


स्वप्न नहीं था सच्ची बात है।

मैं एक कोने में बैठा हुआ था। मेरी तबियत कुछ अच्छी नहीं थी। चुपचाप बैठा था। यह प्रतीक्षालय¼Waiting Hall½ था। स्त्रियों और बच्चों से खचाखच भरा था। मैं चुपचाप बैठा था परन्तु मेरे प्रतीक्षालय में तो ख़ूब शोर मचा था। पुरुष बहुत थोड़े से बैठे थे और सब टिकट आदि ख़रीदने गये होंगे। कुछ अपने बाल-बच्चों के लिए खाने-पीने का सामान ख़रीदने गये होंगे।

थोड़ी देर में मैं भी उठा और बाहर चला गया, और एक दर्जन मौसम्मी ख़रीद लाया। यह सोचकर कि मेरे लिए एक-एक मौसम्मी छीलकर खाना ही अच्छा है और कुछ नहीं खाना चाहिए, सफ़र में तबियत कहीं ज़्यादा खराब न हो जाए।

अभी वापस आकर बैठा ही था, मौसम्मी छीलनी शुरू नहीं की थी कि एक सज्जन आये और मुझे नमस्ते की। एक दो बातें हुईं, ‘‘कहिये आप कहाँ जा रहे हैं?’’ मेरा और बोलने को जी नहीं चाह रहा था। इसलिए मैंने उनसे यह नहीं कहा कि, ‘‘आइये बैठिए।’’ हालाँकि गाड़ी के आने में समय तो बहुत था और समय गुज़्ाारना भी था।

उन सज्जन के साथ दो बच्चे थे। मैंने टालने के लिए उनके हाथ में एक मौसम्मी दी और कहा कि छीलकर बच्चों को थोड़ी-थोड़ी दे दें। वह वहीं बैठ गये और छीलने लगे और बच्चों को देना शुरू किया।

यह देखकर इतनी देर में दो बच्चे और आ गये और उनके सामने खड़े हो गये। उन बच्चों को भी देना पड़ा। यह देखकर दो-चार और आ गये और वह मौसम्मी तो एक मिनट में ही खत्म हो गई। दो-चार बच्चे खड़े ही रह गये। मैंने उनके हाथ में दूसरी मौसम्मी दी उन्होंने उसको भी छीलकर बाँटना शुरू किया।

यह देखकर कि सब बच्चों को मौसम्मी मिल रही है बच्चों का ताँता ही लग गया। हर दो के बाद दो और आते ही जायें। अब मैं उनको कैसे रोकता? मैं एक के बाद दूसरी मौसम्मी देने लगा तो थोड़ी देर में बारह-की-बारह मौसम्मियाँ खत्म हो गईं और बच्चे तो अभी बहुत-से खड़े रह गये।

मैं भागकर गया और दो दर्जन मौसम्मी और खरीद लाया और ये मौसम्मी छिलती गईं और बँटती गईं।

मेरी बीमारी में मौसम्मी खाने की बात धरी की धरी रह गई। अब तो जब बच्चों का ताँता टूटे तब मैं फिर बाहर जाऊँ और अपने लिए मौसम्मी लाऊँ।

मेरे माथे पर कोई तिलक आदि तो लगा नहीं था और न कोई मैंने साधु-संन्यासी के वस्त्र पहने हुए थे। न मेरी दाढ़ी और बाल ही बहुत बड़े-बड़े थे। न मालूम क्यों और कैसे यह करिश्मा हुआ कि बच्चों की क़तार अभी ख़त्म नहीं हुई थी कि स्त्रियों ने भी उठ-उठकर आना शुरू कर दिया कि शायद कोई बाबा प्रसाद बाँट रहे हैं। प्रसाद लेने की प्रथा तो भारतवर्ष में युग-युगों से चली आ रही है।

अब मैं बार-बार उठकर बाहर जाऊँ और वे सज्जन छीलते जायें और यह ताँता तो कभी ख़त्म ही न हो। दुकानदार की मौसम्मियाँ भी ख़त्म होने को आ गईं। दुकानदार ने पूछा, ‘‘बाबा यह क्या लीला है? मौसम्मियाँ कहाँ डालते हो और फिर आ जाते हो?’’

जब दुकानदार के पास दो-चार मौसम्मियाँ ही बाकी रह गईं - अब दर्जन तो थी नहीं कि मैं फिर ख़रीदने को जाता। दुकानदार भी पीछे-पीछे प्रतीक्षालय में तमाशा देखने को आ गया और वह भी सामने आकर प्रसाद लेने को खड़ा हो गया।

मैं कुछ थक गया था और मन में कुछ चिड़चिड़ाहट और गुस्सा भी आ रहा था। मैंने भगवान् से कहा, ‘‘मेरी पहले ही तबियत खराब थी और तुमने यह क्या तमाशा बना रखा है? मेरे पैसे भी खत्म हो गये। अब मैं गाड़ी का टिकट कैसे लूँ?’’

भगवान् कहते हैं, ‘‘क्या मौसम्मियाँ तुमने बनाई थीं? पैसे तुम कहाँ से लाये थे? इस प्रतीक्षालय में क्यों आये? जाओ जाकर अपने स्थान पर बैठो।’’

मैं हक्का-बक्का रह गया। मेरे से कुछ जवाब नहीं बना। देखा तो अपने स्थान पर वापस पहुँच गया हूँ।

यह सब उसकी मज़र्ाी थी।