बेगार
जब हम लोग ऐसी उम्र में थे कि न बच्चे और न नौजवान!- बीच में थे तो सब लोग गाँव में हमसे खूब बेगार लिया करते थे यूँ तो सारा साल ही, पर खास तौर पर ब्याह-शादियों पर।
केवल अपने ही नहीं -गाँव के सभी लोग-हिन्दू, मुसलमान, सिख हमारे चाचा ताऊ हुआ करते थे और जिसका जी चाहता था बेगार ले लेते थे और काम पर भेज देते थे।
नाई को बुला लाओ, खाती को बुला लाओ, धोबी को बुला लाओ, हलवाई को बुला लाओ, मोची को बुला लाओ, बैन्ड-मास्टर को बुला लाओ, स्कूल-मास्टर को बुला लाओ, डॉक्टर साहब को बुला लाओ इत्यादि इत्यादि।
ये सब लोग दूर-दूर, अलग-अलग गाँव में रहते थे- कोई पूरब, कोई पश्चिम, कोई उत्तर, कोई दक्षिण; कोई एक मील, कोई दो मील, कोई तीन मील, कोई चार मील, कोई पाँच मील। केवल सुनार हमारे गाँव में थे और उनको बुलाकर लाना आसान था। कभी तो रास्ता ही भूल जाते और सुबह के गये शाम को वापस आते थे। यह कोई एक दिन का काम नहीं था। कोई न कोई बेगार किसी न किसी के गले पड़ी ही रहती थी। ‘बेगार’ शब्द तो मैं लिख रहा हूँ परन्तु उस उम्र में तो कोई एहसास ही नहीं था और कभी ख़्याल भी नहीं हुआ कि कोई मुसीबत है या कभी इन्कार करने का जी चाहा हो। हर वक्त तैयार रहते थे।
सबसे मुश्किल काम तो टट्टू, घोड़े या ख़च्चर को तय करके लाने का होता था जैसे आजकल रेलवे बुकिं ग या एयरबुकिं ग करवाना पड़ता है। बहुत मिन्नत-खुशामद करके टट्टू या घोड़ा खास दिन के लिए, तेरह मील दूर स्टेशन पहुँचाने के लिए पक्का करके आना पड़ता था। लड़कियों की ब्याह-शादी पर दिन-रात मेहनत से काम करना पड़ता था। फिर जिस दिन बारात आती थी, उस दिन धर्मशाला या गुरुद्वारे के आंगन-आंगन में सारे दहेज की प्रदर्शनी होती थी कि क्या-क्या मिला है। रिवाज यह था कि सूई से ले कर घर में इस्तेमाल की हरेक चीज़ दी जाती थी-बिस्तर, बर्तन, पलंग और दूसरे फ़र्नीचर। कोई एक चीज़ भी नहीं भूली जाती थी-केवल ताला नहीं दिया जाता था कि कहीं घर में ताला ही न लग जाये- वरना एक भी चीज़ ऐसी नहीं थी जो छूट जाये।
मैं अपनी अकेले की बात नहीं कर रहा हूँ। मेरी उम्र के सभी लड़कों का यही हाल था। दहेज का सारा सामान काफ़ी दूर ढोकर ले जाना पड़ता था। उसमें हैसियत के मुताबिक 200-300 टोकरे और थाल हुआ करते थे जिनमें तरह-तरह के कपड़े, बहुत सारे फल, सूखे फल-बादाम, अखरोट, किशमिश, नारियल इत्यादि, और बीसियों टोकरे शाल और कपड़ों के और बीसियों तरह-तरह की मिठाइयों के।
एक ब्याह पर मेरे हाथ में मिठाई का थाल उठाने को दिया गया जिस पर रंगीन पतंगी कागज़ था। मिठाई की इतनी खुशबू और लेकर काफ़ी लम्बा दूर जाना। पाँच-दस क़दम चलकर मैं तो वापस ही आ गया और दरख़ास्त की कि मुझे कोई कपड़े या बर्तन का टोकरा दे दिया जाये, मिठाई तो इतनी दूर मुझसे चलेगी नहीं। मैं कहाँ तक अपने आपको रोकूँगा कि कागज़्ा उठाकर रास्ते में खाता न जाऊँ!