पावन संस्मरण (भाग 1)
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बड़े मियां सो बड़े मियां छोटे मियां सुभानअल्ला

बड़े मियां सो बड़े मियां,


जब मैं (ऑल इण्डिया मैडिकल इंस्टीच्यूट) अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भरती था या शायद क़ैद था तो मेरा लड़का प्रॉमिस जो शुरू से आश्रम (पांडिचेरी) में ही है, पांडिचेरी से मुझे देखने आया। लगभग एक महीने यहाँ रहा।

वह निरन्तर मुझे कहता रहा और मुझे मजबूर करता रहा कि मैं उसके साथ पांडिचेरी जाऊँ।

मैंने बार-बार कहा कि पांडिचेरी बहुत दूर है मेरा वहाँ कुछ काम नहीं है। उसके बहुत ज़ोर देने पर मैंने कहा - ‘‘भाई हवाई जहाज से आने-जाने में तीन हज़ार रुपया ख़र्च हो जाता है इतना रुपया कहाँ से आयेगा और कौन देगा?

प्रॉमिस गम्भीरता पूर्वक कहने लगा, ‘‘उसकी आप चिन्ता न करिये मैं दे दूँगा।’’

मैंने पूछा - ‘‘तुम कहाँ से दे दोगे?’’

प्रॉमिस बड़े आत्मविश्वास के साथ कहने लगा - ‘‘मैं अपने बाप से लेकर दे दूँगा। मेरा बाप बहुत अमीर है।’’

शायद उसको अभी तक यह पता नहीं लगा कि उसका बाप तो फ़क़ीर है।

इसके विपरीत मेरी पुत्री चित्रा यहाँ आश्रम में अकस्मात् मैनेजर की कुर्सी पर बैठी हुई थी।

किसी ने पूछा कि ‘‘क्या आपके पास दस रुपये हैं? दे दीजिए, थोड़ी देर के बाद मैं वापस कर दूँगा।’’

तो वह एकदम हाथ फैलाकर बोल उठी, ‘‘मेरे पास रुपये कहाँ से आयें? मैं तो फ़क़ीर की बेटी हूँ।’’