पावन संस्मरण (भाग 1)
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कूड़ा-करकट


पुराने ज़माने की बात है, सदियों की नहीं, लेकिन चालीस-पचास साल की ज़रूर है।

मैं गली क़ासिमजान में रहता था। यह गली बल्लीमारान और लाल कुंआ को जोड़ती है। कभी-तो एक तरफ निकलना होता था कभी दूसरी तरफ। इस गली में छोटे-बड़े, नीचे-ऊँचे सब तरह के मकान थे, और तीन-तीन चार-चार मंज़िल के भी।

इस गली के दोनों किनारों पर बड़े मशहूर दवाख़ाने थे। अगर बल्लीमारान की तरफ़ से जायें तो आख़िरी कोने में हिन्दुस्तानी दवाख़ाना था जो कि हक़ीम अजमलख़ान साहेब का स्थापित किया हुआ था। दूसरे कोने के सामने था हमदर्द दवाख़ाना जो कि आजकल भी बहुत मशहूर है।

एक दिन हिन्दुस्तानी दवाख़ाने की तरफ जाते वक्त शायद तीसरी मंज़िल से एक पूरा कूड़े का टोकरा मेरे सिर पर आ गिरा। मेरे हाथ में थैला था। मैं शायद सब्ज़ी लेने जा रहा था। मैंने उस कूड़े को इकट्ठा करके अपने थैले में भर लिया। इसमें राख़, अण्डे के छिलके, फलों के छिलके, सब्ज़ियों के छिलके और बहुत तरह के सामान-कागज़, बाल, चिथड़े, आदि थे। मैं यह थैला लेकर मक़ान की तीसरी मंजिल पर चढ़ गया जहाँ से कूड़ा फेंका गया था।

जिस लड़की ने यह कूड़ा फेंका था, उसने देख लिया था कि कूड़ा किसी के सिर पर गिरा है। वह डर गयी थी और उसने अन्दर से दरवाजे में चिटकनी लगा ली थी। मैंने दरवाज़ा बहुत खटखटाया परन्तु वे लोग शर्म और डर के मारे दरवाज़ा नहीं खोलना चाहते थे।

मैंने बहुत ज़िद की और आख़िर दरवाज़ा खुला। वह लड़की सामने आयी। बड़ी डरी हुई और घबरायी हुई- होंठ सूखे जा रहे थे और मुँह से कुछ बात नहीं निकलती थी।

मैंने मीठी जुबान में कहा- ‘डरने और घबराने की कोई बात नहीं है, आपका जो सामान नीचे गिर गया था, मैं इकट्ठा करके लाया हूँ, आप अपनी सब चीज़ों को सम्भाल लें।’ इतनी ही देर में लड़की की माँ भी आ गयी और बाप भी आ गये। मैं थैला छोड़कर नीचे उतर आया यह कहते हुए कि, ‘फिर कभी आऊँगा और अपना थैला वापस ले जाऊँगा।’

वे लोग हैरान, लेकिन किसी के मुँह से कोई बात नहीं निकल सकी, शर्म और डर के मारे।

हुआ क्या, कि वह बराबर मुझे देखते रहे कि कब वहाँ से निकलूँ और वे मुझे पहचान कर मेरे से बात कर सकें। शायद सात दिनों के बाद तीसरी मंजिल से उनकी नज़र मुझ पर पड़ी और उन्होंने आवाज़ें देनी शुरू की कि, ‘भाई साहब, ज़रा ठहरना, ज़रा ठहरना!’ और वह लड़की भागती हुई नीचे आयी और हाथ जोड़कर मिन्नत-ख़ुशामद कर मुझे ऊपर ले गयी। सारे परिवार की आँखों में आँसू भर आये और क्षमा-प्रार्थना करने लगे कि, ‘आपने हमारा बहुत भला किया। उस कूड़े के साथ लड़की की अँगूठी भी उसकी उंगली में से नीचे चली गयी थी और जो उसको पता नहीं लगा था। आपने कितना भला किया, आप कितने ईमानदार हैं कि आपने अँगूठी को कूड़े में डालकर हमको वापस किया।’

मैंने कहा- ‘मुझे तो मालूम नहीं, मैंने तो अँगूठी देखी भी नहीं। मैं अब आपसे केवल एक प्रार्थना करता हूँ और आपका मेरे ऊपर बहुत एहसान होगा। यह मेरा थैला अपने पास रख लें और हमेशा कूड़ा इसमें भरकर नीचे सरकारी कूड़ेदान में डालकर आया करें। इससे आपका भी भला होगा और गली मुहल्ले वालों का भी भला होगा और आप मुझे याद भी कर लिया करेंगे।

उसके बाद मैं कई वर्ष उस गली में रहा परन्तु फिर कभी मेरे सिर पर कूड़ा नहीं पड़ा।