पावन संस्मरण (भाग 1)
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जब जी चाहे आ जाया करो


‘भगवान् मेरी एक और छोटी-सी बात सुन लीजिए। मेरे पुत्र के विवाह के अवसर पर मेरी धर्मपत्नी ने कहा, ‘मुझे एक बढ़िया-सी क़ीमती साड़ी लाकर दें जो मैं इस अवसर पर पहन सकूँ।

मैंने कहा- ‘बहुत अच्छा’

मैं एक सुन्दर साड़ी बहत्तर रुपये में ले आया और साड़ी के लेबिल (Label) के ऊपर बहत्तर के आगे एक सिफ़र और लगा दिया और साड़ी सात सौ बीस रुपये की ‘बनाकर’ दे दी।

मेरी धर्मपत्नी गद्गद हो गई और यह शुभ अवसर भी निभ गया। यदि मैं बहत्तर के आगे यह सिफ़र न लगाता तो छः सौ रुपये का नुक़सान भी हो जाता। झगड़ा भी हो जाता और समरसता ‘हार्मानी’(Harmony) भी टूट जाती। बहत्तर रुपये की साड़ी पहनी या सात सौ बीस रुपये की साड़ी पहनी उसमें भेद ही क्या पड़ता है।

भगवान् मेरी ये सब बातें सुनकर बहुत ख़ुश हुए और कहने लगे- ‘जब जी चाहे आ जाया करो’।