चक्की की सज़ा
चक्की की सज़ा तो बड़े-बड़े अपराधियों को बड़ी-बड़ी जेलों में हुआ करती थी।
हमारे ‘कर्मधारा’ की सम्पादिका और आश्रम की साधिका देवी करुणामयी दिन-दूनी और रात-चौगुनी तरक्की करती चली जा रही हैं। ‘कर्मधारा’ के सम्पादन में नहीं, शरीर में चर्बी के उत्पादन में। बीसियों डॉक्टरों ने भोजन-संतुलन (Diet-Control) के नुस्ख़े और चार्ट बना-बनाकर दिये। परन्तु खाने पर नियंत्रण नहीं हो सकता। ज़िन्दगी क्या हुई कि जो चाहा न खाया।
अब आख़िर में भगवान् ने सुनी और खुर्जा के वैद्यराज जी ने कहा कि - ‘‘करुणा जी को रोज़ाना चक्की चलानी चाहिये।’’ सालभर से कह रहे थे। परन्तु करुणामयी जी टस-से-मस नहीं हुईं, जैसे सुना ही न हो।
इस बार वैद्यजी ने कहा - ‘‘तुमको पता नहीं है कि तुम्हारा क्या हाल होगा। यह हो जायगा। वह हो जायगा। और चारपाई पर पड़ जाओगी - उठा-बैठा नहीं जायेगा। - और फिर पछताओगी। फ़ौरन चक्की चलाना शुरू करो और कोई इलाज नहीं है।’’
अब चिन्ता शुरू हुई। - और चक्की की खोज शुरू हुई। पैंतीस-चालीस साल पहले भगवान् ने वर्धा से भेजकर चक्की यहाँ रक्खी हुई थी। अब उसकी ढूँढ़ शुरू हुई और वह मिल गई।
चक्की को धो-धाकर फिट किया गया। गेहूँ मँगवाया गया। - और करुणा से पिसवाना शुरू किया गया।
अभी दो-तीन दिन भी पीसते नहीं हुए थे बाहों में खल्लड़ियाँ पड़ गईं और हाथों में छाले पड़ गये। बहाने शुरू हो गये।
आश्रम के किचनवालों को पता लगा। - और वे चक्की को देखने आये। उन्होंने प्रार्थना की कि - ‘‘चक्की कुछ देर के लिए हमें दे दीजिए हमें मसाले-पीसने होते हैं। बाज़ार से पिसवाने में हमारे सैकड़ों रुपये ख़र्च हो जाते हैं।’’
चक्की गई और उनको पसंद आ गई। अब वे वापस देने का नाम ही नहीं लेते। कहते हैं कि हमारे बहुत काम आती है। हमने तो सोचा था कि वैद्यजी की कृपा से करुणाजी अब खूब फँसी परन्तु - जाको राखे साइयाँ, मारि सकै ना कोय। बाल न बाँका करि सकै, सब जग बैरी होय।। करुणा तो बच गईं परन्तु आगे क्या होगा यह तो भगवान् ही जाने।