आँसू
पुराने ज़माने की बात है, ईसा या मोहम्मद के ज़माने की नहीं, राम और भगवान् कृष्ण के ज़माने की भी नहीं; मेरे अपने ज़माने की।
चालीस-पैंतालीस साल हुए होंगे दिल्ली में एक बड़ा ज़बरदस्त दल आया। टिड्डी दल नहीं, सारे मुल्क़ों से लोग आये। शायद चार-पाँच सौ होंगे। वे शांति-सम्मेलन (Peace Conference) में शान्ति के दूत बनकर आये। उस ज़माने में कोई इतने होटल आदि तो थे नहीं और न यह रिवाज था कि मेहमानों
को होटलों में ठहरा दिया जाये। ऑल इण्डिया कांग्रेस कमेटी ने हम सब लोगों से कहा कि अपने-अपने घरों में दो-दो, चार-चार या पाँच-छः व्यक्ति ठहरायें, अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार। ताकि बाहर के लोगों को भारत की संस्कृति, सभ्यता और आचार-विचार का सीधा अनुभव हो। तो पाँच व्यक्ति मेरे घर में भी ठहराये गये। शान्ति सम्मेलन (Peace Conference) काफ़ी लम्बा अरसा चला और उन लोगों
को भारत-दर्शन के लिए भारत के कोने-कोने में ले जाया गया। परन्तु वे लोग दिल्ली में भी बार-बार आते रहे अपनी कॉन्फ्रें स के प्रोग्राम के अनुसार। मैं इस ताक में था कि श्रीअरविन्द और माताजी के बारे में कुछ बताया जाये और
समझाया जाये कि श्रीअरविन्द का दर्शन व योग क्या है। मैंने पूरा एक महीना एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा लिया परन्तु किसी तरह भी उन सबको
इकट्ठा न कर सका। एक प्रकार से निराश हो गया। मैं जब भी बार-बार उन लोगों के पास, जगह-जगह पर जहाँ वे ठहरे हुए थे, जाऊँ
तो कोई भी आने के लिए तैयार न हो। वे लोग कहते थे भारतवर्ष में बहुत से मज़हब, धर्म व मत-मतान्तर और सम्प्रदाय हैं, जैसे - हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी और फिर हिन्दू, धर्म के सैकड़ों देवी-देवताओं के मंदिर . . . . इत्यादि-इत्यादि, जिनसे वे लोग खिंच-खिंचकर और सुन-सुनकर ऊब गये हैं। फलतः अब हमारे पास कोई भी आने को तैयार नहीं था। लेकिन मैं तो काफ़ी तैयारी कर ही चुका था इसलिए मजबूर होकर मैंने किसी-न-
लेकिन मैं तो काफ़ी तैयारी कर ही चुका था इसलिए मजबूर होकर मैंने किसी-न-किसी तरह चार विदेशी लोगों को घेरा और उनके लिए एक मीटिंग का संयोजन किया। श्रीअरविन्द पर बोलने के लिए डॉ0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी और श्री आर.आर. दिवाकर को निमंत्रित किया और स्वयँ मैंने भी महीने भर में विचारों को इकट्ठा करके एक भाषण तैयार किया। दो सौ आदमी तो इकट्ठे कर ही लिए होंगे।
मेज़ें सटाकर उनसे एक लम्बी-चौड़ी स्टेज बना दी और सामने कुछ सौ-दो सौ कुर्सियाँ बिछा दीं। कुछ अपनी थीं कुछ बाज़ार से लाकर।
चार महानुभावों के आने की आशा थी उनमें से भी तीन आये और उन तीन में भी एक महिला। एक चीन देश के वृद्ध व्यक्ति थे दूसरे एक अधेड़ उम्र के अंग्रेज़ और तीसरी महिला थीं न बहुत छोटी और न बहुत बड़ी उम्र की। फ्रांस से आई थीं।
वे लोग चूँकि हमारे अतिथि थे इसलिए उनसे बहुत प्रार्थना की गई और बहुत ज़िद भी कि भारतवर्ष के सम्बन्ध में वे कुछ कहें क्योंकि वे सारा भारतवर्ष घूमकर आये हैं। परन्तु उनमें से कोई भी बोलने को तैयार न हुआ। क्योंकि वे लोग निराश और मुरझाये हुए थे। हालाँकि हमने बहुत ज़िद की और मिन्नत खुशामद भी की परन्तु उन तीनों में से कोई न माना।
तब मैं उठा और उनका स्वागत किया और अपना तैयार शुदा लम्बा-चौड़ा भाषण पढ़कर सुनाया। मेरे बाद डॉ0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी और फिर श्री आर.आर. दिवाकर बोले। ये लोग दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह मिनट बोले होंगे, क्योंकि कोई माहौल तो था नहीं और न ही उत्साहवर्धक वातावरण ही था।
परन्तु इसके बाद हमारे भाषण व विचारों को सुनकर तो तीनों को जोश आ गया और कहने लगे, ‘‘हम ज़रूर बोलेंगे।’’ पहले चीन के वृद्ध महाशय उठे और इतने जोश में बोले कि, ‘‘मैं अपने देश चीन में विख्यात दर्शन-शास्त्री (Philosopher) माना जाता हूँ परन्तु आज श्रीअरविन्द के बारे में सुनकर मैं सोच रहा हूँ कि मैंने अपनी सारी ज़िंदगी बरबाद की। यदि मुझे श्रीअरविन्द के बारे में पहले पता लग जाता तो मैं उनके दर्शन व योग साहित्य का अध्ययन करने के सिवा और कुछ न करता। अब तो मैं इतना वृद्ध हो गया हूँ कि संसार से अफ़सोस में ही चला जाऊँगा कि श्रीअरविन्द को मैं इस जीवन में न पढ़ सका और न जान सका।’’
अब अंग्रेज़ महोदय उठे और कहने लगे, ‘‘मैं तो यहाँ पहले भी कई बार आ चुका हूँ। भारतवर्ष आध्यात्मिक मुल्क़ है और देवताओं की भूमि है। एक बार मैं गंगा के तट पर जा रहा था वहाँ एक साधु, गंगा किनारे नंगे शरीर तप कर रहे थे। उनके सामने गंगा नदी में से एक बहुत बड़ा साँप बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था। परन्तु बार-बार फिसलकर गंगा में वापस गिर जाता था और बाहर न निकल पाता था। साधु ने जब देखा तो उठकर गंगा में हाथ बढ़ाया साँप को बाहर निकलने में मदद करने के लिए। साँप ने कृतज्ञता प्रगट करने के बजाये साधु को डंक मार दिया। और साधु के हाथ से छूट गया। साँप वापस गंगा में जा पड़ा। थोड़ी देर बाद साँप ने फिर बाहर निकलने की कोशिश की। - और साधु ने मदद करने के लिए हाथ फिर बढ़ाया। साँप ने दूसरी दफ़ा फिर साधु को डस लिया और फिर साँप वापस गंगा में जा पड़ा। मैं खड़ा-खड़ा यह दृश्य देख रहा था।
मैंने साधु के पास जाकर कहा कि, ‘‘बाबा जी आप यह क्या कर रहे हैं। दो दफ़ा आपको साँप ने काटा है। आप साँप के काटने पर ज़हर से मर जायेंगे।’’
तो साधु ने कहा, ‘‘साँप को अपना धर्म पालन करना है और मैं अपना धर्म पालन कर रहा हूँ।’’
‘‘अब तीसरी बार फिर साँप ने बाहर निकलने की कोशिश की और साधु ने साँप की फिर मदद की। इस बार साँप साधु को डसकर बाहर निकलने में कामयाब हो गया।’’
‘‘यह है भारतवर्ष। - और भारतवर्ष में ही ऐसा किया जा सकता और ऐसा हो भी सकता है।’’
अब फ्रांस की महिला उठीं और बजाये बोलने के हिचकी भर-भर कर रोने लगीं। हम सब हैरान-परेशान हो गये।
काफ़ी देर में वे अपने-आपको सँभालकर बोली - ‘‘मैं और मेरे पति हम दोनों अपने देश फ्रांस में सामाजिक कार्यकर्त्ता (Social Worker) हैं। जब मैं भारत आने लगी तो मेरे पति बहुत परेशान हो गये। मुझे अन्दर ले जाकर दरवाजा बन्द करके साँसें भर-भरकर मुझसे कहने लगे कि, ‘‘तुम भारत जा रही हो। मुझे खुशी है और मुझे मालूम है कि तुम सब जगह भारत के साधु-सन्तों के पास जाओगी और हिमालय में योगियों से भी मिलोगी। मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है। परन्तु मैं तुमसे एक वचन लेना चाहता हूँ। देखो तुम किसी सूरत में भी श्रीअरविन्द आश्रम पांडिचेरी नहीं जाओगी और वहाँ मादाम अल्फांसा से नहीं मिलोगी जो श्रीअरविन्द में ‘मदर’ हैं। स्वाभाविक ही उनकी यह धारणा बनी हुई थी कि जो भी एक बार ‘मादाम् अल्फ़ांसा’ (मदर) को मिल लेता है वह उस व्यक्ति को अपने जाल में ऐसा फँसा लेती हैं कि वह वापस नहीं आता। मैंने अपने पति को ‘हाँ’ कर दी और वचन दे दिया कि ‘‘नहीं मिलूँगी।’’
‘‘अब यहाँ इस सभा में मादाम आल्फ़ांसा के सम्बन्ध में सब सुनने के पश्चात् यह सोच-सोचकर पछता रही हूँ कि ‘‘यदि भारतवर्ष में आकर भी ‘मदर’ से नहीं मिल सकी तो मेरे आने का कुछ अर्थ नहीं होगा।’’ कहते-कहते उनके आँसू फिर फूट पड़े।
वही हाल मेरा भी हुआ।