दौलत की चाट
पुराने युग की बातें हैं जब 1921 में मैं देहली में आया था - गली-गली धक्के खाया करता था कि कहीं रात काटने को जगह मिल जाय। रुपया-दो रुपया मासिक किराया देकर तो मैं रह नहीं सकता था - रुपया दो-रुपया मैं कहाँ से लाता - देहली में मेरे बाप की जागीर तो थी नहीं - घर से भागकर आया था बग़ैर पैसे के। पर मैं तो खाने के मज़ों की बात कर रहा था।
बल्लीमारान में सवेरे-सवेरे आवाज़ आती है -
‘‘चा ऽ ऽ ट दौलत की चा ऽ ऽ ट’’
बच्चे-बूढ़े भागते चले आते हैं। एक पैसे का दोना सफ़ेद झाग का भरा मिल जाता था।
चरखेवालों में दोपहर के समय आवाज़ें लगनी शुरू होती हैं -
‘‘लक्कड़ हज़म - पत्थर हज़म’’
यह चटपटा चूरन है।
बच्चे एक-एक पैसे का लेकर खाते हैं ओर मुँह चटकाते हैं।
चाँदनी चौक में सवेरे, मुँह-अन्धेरे ही आवाज़ लगनी शुरू हो जाती है -
‘‘राम भजे जा - राम भजे जा’’
यह कोई भक्त राम का नाम भजनेवाला नहीं है, यह तो पेड़े बेचनेवाला है - यह पेड़े काफ़ी महँगे, दो-दो पैसे का एक मिलता था।
फ़तेहपुरी में आयें तो कुल्फ़ी-फ़ालूदा - यह एक आने में मिलता था।
आगे ख़ारी बावड़ी में चलो तो भटूरे-आलू-छोले। दो-दो पैसे का एक भटूरा आलू-छोले सहित।
अब खेल के मैदान में पहुँचे -
‘‘गंडेरियाँ - गंडेरियाँ
मिडिल पास गंडेरियाँ
दो पैसे में दोनों हाथ भर जाते थे।
फिर वापस चाँदनी चौक के दूसरे हिस्से में आओ तो -
‘‘बादाम खालो बादाम, चीना बादाम’’
ये थीं ग़रम-ग़रम भुनी मूँगफली। दो पैसे में जेब भर जाती थी।
अब पहुँचे जामा मस्जिद में -
‘‘हरी थी, मन भरी थी, लाल मोती जड़ी थी,
लाला जी के बाग़ में, दोशाला ओढ़े खड़ी थी’’
भुने-भुट्टे - छोटा एक पैसे में और बड़ा दो पैसे में।
अब ये सब मज़ेकहाँ गये?
किसी होटल में चले जाओ, रेस्टोरेंट में चले जाओ तो पचास-सौ रुपये से कम कोई ‘डिश’ नहीं मिलती - क्यू (लाइन) में लगे हैं - बैठने तक को जगह नहीं मिलती।
कहाँ जा रहा है ज़माना? सब पैसे के लिए रो रहे हैं - हड़तालें कर रहे हैं कि -
‘‘हमारी तनख़ाह बढ़ाओ,
हमारा इतने में गुज़ारा नहीं होता,
हमारी मज़दूरी बढ़ाओ।’’
दुनिया विनाश की ओर जा रही है तेज़ी से.......।