हाउ स्वीट! कितनी मीठी
मैं गया एक दोस्त के यहाँ। मैं जब बीस-इक्कीस साल का था तब वे शायद सत्रह-अठारह वर्ष के रहे होंगे। पचास साल से भी ऊपर की वाक़िफ़ियत।
कल मैं अचानक उनके घर जा निकला। बरसों बाद। उन्होंने नया ही घर बनवाया था। और शान से उसमें अपना कारोबार चला रहे थे और रहते भी वहीं थे। मुझे देखकर अभिभूत हो गये, प्रसन्न और गद्गद हो गये।
मैंने कहा, “बहुत सुन्दर मकान बनाया है।” ख़ुश होकर कहने लगे, “आपका ही है।”
सारा घर विस्तार से दिखाने लगे। नीचे तहख़ाने (Basement) में आपका टैक्सटाइल- कपड़े का शो-रूम है। इस मंजिल में आपका सारा दफ़्तर है। ऊपर पहली मंजिल में आपका कला वस्तुओं (Handicrafts) का शो-रूम है। उससे ऊपर आपका रहने का घर है और खाना पकाने की रसोई आदि हैं। सबसे ऊपर आपका व्यायाम, प्राणायाम, योग व ध्यान-मन्दिर है।
ये सब ब्यौरा मुझे एक ही जगह खड़े-खड़े दिया जा रहा था। मैंने पीछे की तरफ देखा तो खटखटे और बल्लियाँ लटक रही थीं। मैंने पूछा “यह नज़र-बट्टू क्या है?” उन्होंने हँसते हँसते जवाब दिया, “यह लिफ्ट (Lift) आपके लिये लगाई जा रही है। बम्बई की एक बहुत बड़ी फ़र्म ‘ऑटिस’ (Otis) इसे लगा रही है। जिसका साठ हज़ार में ठेका दिया है। यह लिफ़्ट आपके लिये ही लगाई जा रही है कि आपको ऊपर चढ़ने में कष्ट न हो। इसीलिये तो आपको ऊपर नहीं ले गया कि जब तक लिफ़्ट न लग जाये!”
‘ये आपके दो बेटे हैं। यह बड़ा बेटा है और यह छोटा बेटा है। ये हैं आपकी बहू। बच्चों की माँ।” मैंने कहा-“अच्छा तो अब हम चलें?” बाहर दरवाज़े पर सफ़ेद मोटर खड़ी थी। तो कहने लगे,“यह मोटर भी आपकी ही है।” जिस मोटर में हम आये थे वह भी सफ़ेद थी और इसी माँडल की थी और कुछ हटकर खड़ी थी।
अब जब मैं मोटर की तरफ़ जाने लगा तो मैंने कहा, “जब सब कुछ मेरा है तो आप यहाँ क्या कर रहे हैं?” तो कहने लगे, “मैं भी तो आपका ही हूँ।” -और लगा कि मानों कोई कह गया कि, “यदि मैं आपका न होता तो सब कुछ आपका कैसे होता?”
यह था हाउ स्वीट-ßHow SweetÞ कितनी मीठी बात! मैंने चलते समय आशीर्वाद दिया और कहा “खुश रहो, फलो-फूलो, आनन्द से रहो।”