बेताब जी
सुबह होती है-शाम होती है, उम्र यूँ ही तमाम होती है।
नीचे की कविता श्री नारायण प्रसाद बेताब जी की हैः-
क्या वर्ष जा रहा है या सन् गुज़र रहा है,
वह कुछ नहीं, हमारा जीवन गुज़र रहा है।
यह उम्र बढ़ रही है या हम ही घट रहे है,
दिन काटते हैं अपने या आप कट रहे हैं।
दिन जा रहा है देखो उलटा है यह इशारा,
क़िश्ती में देखते हैं चलता हुआ किनारा
आरम्भ जो हुआ है आख़िर समाप्त होगा,
खो दोगे जिस समय को, हरगिज़ न प्राप्त होगा।
सत्कर्म है तो मित्रो मेहनत से मुँह न मोड़ो,
जो कुछ है आज करना, कल पर उसे न छोड़ो।
पुरानी बातें कभी-कभी याद आ जाती हैं। साठ साल से भी पहले की बात है। मेरी आयु 19-20 साल की थी। श्री डॉ0 युद्धवीर सिंह जी की अध्यक्षता में हम युवकों नें आर्य कुमार सभा का गठन किया था।
हमने जोश में सोचा कि जब ईसाइयों की एक संस्था वाई0एम0सी0ए0(Y.M.C.A.) यानी (Young Men's Christian Association) है तो हमारी वाई0एम0ए0ए0 (Y.M.A.A.) यानी (Young Men's Aryan Association) यंग मैन्स आर्य एसोसिएशन क्यों न हो सो हमनें यह चलाई और ख़ूब चलाई। सारे भारतवर्ष में।
डाक्टर के शवदेव शास्त्री इस संस्था के अध्यक्ष थे। वे अमेरिका से तभी लौटे थे। वहाँ एक अमेरिकन महिला से विवाह करके उन्हें भी साथ लाये थे। बहुत आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। उनके पास जाकर बहुत मज़ा आता था। परन्तु ज़माना ऐसा था कि हम लोगों के बुज़ुर्गों को यह सब पसंद नहीं था। जब कभी उनको निमंत्रण देते थे तो हमारे बुज़ुर्ग कहते थे कि इनको अलग मेज़ पर अलग बर्तनों में खाना दे दीजिए। हमारे चौके में न आयें और हमारे पानी के घड़े को हाथ न लगायें। नहीं तो सब भ्रष्ट हो जायेगा।
अब आजकल तो सब कुछ ही भ्रष्ट हो गया है जिससे सब कुछ स्पष्ट हो गया है। कहाँ गई वह पुरानी आर्य कुमार सभा और ‘मॉक् पार्लियामेंट (Mock Parliament)’ अब यहाँ श्रीअरविन्द आश्रम में सैकड़ां लोग संसार के कोने-कोने से आते हैं हाथ लगाना तो क्या वही हमको खाना बाँटते है और खिलाते हैं।
स्वर्गीय पं0 नारायण प्रसाद बेताब जी हिन्दी और उर्दू के बड़े विद्वान और प्रभावशाली कवि थे। हमारे बुज़ुर्ग और बड़े हितचिन्तक थे। हमने एक मासिक पत्र ‘आर्यकुमार’ के नाम से निकालना शुरू किया। उसमें वे हमारी बहुत सहायता करते थे। -और हर अंक के लिए एक-दो कविता अवश्य लिखकर दिया करते थे। काश कि वे कवितायें याद रह जातीं! पहली कविता की पहली पंक्ति तो यह थीः
“आर्य कुमार कुमार सही
इनके सिर हैं नित कारज सारे”
पंडित जी आर्य समाज के बड़े प्रवर्तक थे। मूर्ति-पूजा के ख़िलाफ़ उन्होंने एक बहुत लम्बी कविता लिखी थी उसकी दो चार लाइनें तो आज भी मुझे याद हैः
बुरा हाल हो तेरा, ऐ बुत-परस्ती
कि मिटने को है ख़ाक़ में तेरी हस्ती।
नसूहत है गो तेरे मुँह पर बरसती....
नहीं क़ाबिले-क़द्र फ़रमान तेरा
मगर मानता हूँ मैं अहसान तेरा।
सुन ऐ बुत परस्ती! अगर तू न होती
न मिलता ये हमको भी अनमोल मोती।
चमक जिसकी जैसे कि सूरज की ज्योती
ना मादरे-हिन्द भी शर्कखोती,
शिवालय में जाता न फिर मूलशंकर
बुतों की ग़ुलामी-ए-माज़ूल शंकर
उन्होंने अपनी लाड़ली बेटी के विवाह के अवसर पर एक लम्बी दर्दनाक कविता लिखी थी जिसको सुनकर सभी रो पड़े थे। यदि वह कहीं मिल जाती तो मैं उसे कर्मधारा में छपने को अवश्य देता।