पावन संस्मरण (भाग 1)
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नियति


(करुणामयी के विदेश जाने के प्रस्ताव पर चाचाजी उन दिनों की याद कर बैंठे, जब वह आश्रम में पहले-पहल आयी थी। फिर भी अभी तो यह एक सम्भावना है जो एक पिता को व्यग्र भी कर रही है और आशान्वित भी। सं0)

करुणामयी मार्च 1966 की एक सुबह अचानक आश्रम में आयी और पूछने लगी, ‘क्या मैं उसे पहचानता हूँ?’ मैंने कहा, ‘यह भी कोई पूछने की बात है? पहचानता कैसे नहीं, तुम मेरे परम मित्र महाशय कृष्णचन्द्र जी की बेटी हो। लेकिन मैंने तुम्हें वर्षों पहले देखा था, जब तुम छोटी सी बच्ची थीं। इतने लम्बे अर्से के बाद यहाँ कैसे आना हुआ?’

उसने कहा, ‘इसमें मेरी कोई ग़लती नहीं। यह तो परिवहन सर्विस की भूल है, जो मुझे ग़लती से यहाँ छोड़ गयी। जाना तो कहीं और था।’

पर यह एक सुखद संयोग था।

मैंने पूछा,‘इस बीच तुम क्या करती रही? कुछ इम्तहान वग़ैरह भी पास किये?’ उसने जवाब दिया, ‘जी मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से तो दर्शनशास्त्र में एम0ए0 किया है और गान्धर्व महाविद्यालय मण्डल, बम्बई से संगीत में मास्टर की डिग्री (संगीतालंकार) ली है। आकाशवाणी निर्णायक मण्डल द्वारा प्रमाणित प्रथम श्रेणी की कलाकार हूँ।’

मुझे अच्छा लगा और मैंने कहा, ‘यह तो बहुत अच्छा है।’

बात यहीं ख़त्म हो गयी और मैं उससे अपना ध्यान हटाकर हमेशा की तरह अपने काम-काज में लग गया। उसने कहा, ‘घर जाने से पहले मैं आपको कुछ सुनाना चाहती थी।’

मैं कुछ खीजकर बोला, ‘मुझे गाना-वाना सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है। संगीत आदि के लिए मेरे पास कोई वक़्त भी नहीं है। ढेरों काम पड़ा है करने के लिए।’

उसे भी कुछ ज़िद-सी हो गयी। अपने आग्रह को दुहराते हुए बोली, ‘मुझको तो गाकर ही जाना है और आपको सुनना पड़ेगा।’

मैंने कह दिया, ‘मुझे नहीं सुनना गाना।’

उसने तो मुझे एक गाना सुनने के लिए मजबूर ही तो कर दिया। शिष्टचार के नाते और पीछा छुड़ाने के लिये कह दिया, ‘‘ठीक है! अच्छा गाओ और क़िस्सा ख़त्म करो!’’

गीत और संगीत का मेरे जीवन में कोई स्थान नहीं था। ‘दुर्भाग्य’ से उसने गाना शुरू कर दिया। संयोगवश उस समय बैठकख़ाने में तीन और व्यक्ति मौजूद थेः एक अमेरिकन पादरी डॉ0 जय होम्स स्मिथ दूसरे प्रोफ़ेसर मुरारीलाल पाराशर और तीसरी एक युवती-महिला कु0 इन्दुबाला चौधरी, जो अब श्रीमती इन्दु पिल्लै हैं और मातृ अन्तर्राष्ट्रीय विद्यालय की प्रिंसिपल हैं।

पहले ही गीत से हम सब की आँखों में आँसू आ गये। और शायद हम रोने ही लगे। अब हमने भरे कण्ठ से उससे और गाने का अनुरोध किया। करते-करते उसने दो गीत और गाये। हम तो स्तब्ध रह गए और ख़ामोशी छा गई।

दोपहर के भोजन का समय हो रहा था। करुणामयी ने घर जाना चाहा विदा माँगी और कहा, ‘अब घर जाना चाहिए। मेरी माँ बेचैनी से मेरा इंतज़ार कर रही हांगी।’

अब मैंने अपनी आवाज़ को भरसक संयतकर दृढ़ शब्दों में कहा, ‘हम सबको रुलाने के बाद अब तुम्हें घर जाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। अब तो तुम्हें यहीं आश्रम में रुकना और हमारे साथ रहना होगा।’

क़िस्सा ख़त्म हुआ!

सब कुछ उसी क्षण में तय हो गया। और तब से वह यहीं आश्रम में है।

आश्रम की स्थापना श्रीमाताजी ने आध्यात्मिक संस्था के रूप में की थी। व्यक्त करना और व्याख्या करना तो कठिन है पर निश्चित रूप से यह उन दिव्या माँ की ही शक्ति थी जो करुणामयी को यहाँ लायी। आश्रम वातावरण को करुणामयी ने समृद्ध बनाया और आश्रम व स्कूल को संगीत का स्वर्ग बना दिया वैसे ही जैसे कि कोई बंजर रेगिस्तान को फूलों के उपवन में परिणत कर दे। मुझे भी कहना ही पड़ा, ‘‘संगीत जीवन है और जीवन संगीत है।’’

कुछ दिन हुए उसनें मुझे बताया कि अमेरिका के किसी यूनिवर्सिटी कॉलेज में ‘गेस्ट-प्रोफ़ेसर’ के रूप में उसे बुलाया जा रहा है और उससे सारे ब्यौरे और सूचनाएँ -विस्तृत परिचय-पत्र आदि की मांग की गयी है। करुणामयी ने मुझसे इजाज़त को पूछा। आश्रम में अपने पिछले सोलह वर्षों के दौरान उसे बम्बई, कलकत्ता, बड़ौदा, जयपुर, मद्रास आदि बीसियों जगहों से संगीत-सम्मेलनों और संगीत-कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिए बुलाया जाता रहा है और ख़ास तौर से दिल्ली में होने वाले इन कार्यक्रमों के लिए तो निमन्त्रणों की भरमार सी रही, पर मैंने उसे कभी अनुमति नहीं दी।

नहीं तो शायद वह अब तक संगीत के क्षेत्र में कितना ही नाम कमाती और प्रसिद्धि पाती। देश के उच्चकोटि के गंभीर व मार्मिक संगीतज्ञों में उसकी गणना होती। लेकिन मैंने सदा यही सलाह दी और समझाया कि ‘साधना और आध्यात्मिक जीवन के रास्ते में इन सबका कोई मूल्य नहीं है और संगीत और गाना तो केवल भगवान् के लिए ही होना चाहिए।’

और अब जब यह अमेरिका जाने का प्रस्ताव सामने आया है तो उसे अनुमति देने से इन्कार करना मेरे लिए कितना कठिन हो रहा है। सोचता हूँ शायद यह उसके जीवन की कोई उच्चतर पुकार हो और जिस उद्देश्य के लिए हम प्रतिबद्ध है, उसमें इसे भी कोई अपना योगदान करना हो! -कोई उच्चतर ज्ञान और अनुभव प्रदान करना हो। हम उस दौरान उसका अभाव निश्चित रूप से ही महसूस तो करेंगे ही जब वह हमसे दूर कहीं होगी। परन्तु वह हमारी तपस्या व हमारा त्याग होगा।