पावन संस्मरण (भाग 1)
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अन्तर्राष्ट्रीय बच्चे


एक महिला यहाँ आईं। न मालूम किस देश की थीं। कुछ पहचानने में न आ सकीं। -और बहुत फूँ -फाँ में कहने लगीं कि मैंने आपके स्कूल की प्रशंसा सुनी है और मुझे अपने चौदह बच्चे होस्टल में दाख़िल करवाने है। मुझे इस बात की चिन्ता नहीं कि वे कौन-सी कक्षाओं में पढ़ने लगेंगे। मुझे तो उनको विद्या का ज्ञान करवाना है और वह भी किसी आध्यात्मिक संस्था में।’

बीच में किसी ने कहा कि‘चौदह बच्चों के लिए तो छात्रालय में पाँच-छः हज़ार रुपये मासिक का ख़र्चा होगा?’ तो झुंझलाकर बोलीं- ‘चाहे दस हज़ार हो। जब मैंने इन बच्चों की ज़िम्मेदारी सिर पर ली है तो मुझे रुपये की चिन्ता नहीं है।’

हमने कहा कि-‘आप बच्चों को लेकर आयें तो हम देखें।’

तो वे कहने लगीं कि ‘इसमें देखना क्या है? मेरे बच्चे भिन्न-भिन्न देशों के हैं।’

हम यह सुनकर चौंक गये और पूछा-‘इसका क्या अर्थ है?’

तो वे कहने लगीं कि, ‘इण्डोनेशिया, चीन, अमेरिका, ज़ाम्बिया, यूगोस्लाविया, जर्मनी, फ्रांस, इटली, श्रीलंका, स्विट्ज़रलैंड, कीनिया, कैनेडा, मॉरीशस और जापान के हैं।’

‘हरे राम! इस महिला ने इतने देशों के लोगों से विवाह किया है! इसने यह अच्छा मिशन ढूँढ़ा कि हर देश के बच्चे उसके घर में होने चाहिएँ!’ जब मुश्किल से खोजकर सवाल पूछे तो महिला अकड़कर कहने लगीं-‘मैं ने तो शादी नहीं की। मैं तो अविवाहित हूँ!’

तो किसी के पूछने पर कहने लगीं कि-‘ये सब बच्चे तो मैंने देश-विदेश से इकट्ठे किये हैं। अपने प्यार और इनको पालने के कारण - और मुझे ये काम बहुत अच्छा लगता है कि मैं भगवान् के बच्चों को एक स्थान पर रखकर उनका पालन-पोषण कर रही हूँ और देख रही हूँ कि उनके अन्दर क्या-क्या भिन्न-भिन्न वृत्तियाँ हैं और उनमें किस प्रकार से सामंजस्य किया जा सकता है। यह मेरी तपस्या है और जीवन का उद्देश्य है।’

हम बहुत खुश हुए कि जब ये चौदह बच्चे हमारे छात्रालय में आ जायेंगे तो हमारा विद्यालय वास्तव में ‘मदर्स इण्टर-नेशनल स्कूल’ का रूप धारण करेगा। परन्तु वे महिला बच्चों को लेकर फिर कभी नहीं आईं और हम देखते के देखते ही रह गये।