पावन संस्मरण (भाग 1)
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नीम का वृक्ष


श्रीअरविन्द आश्रम - दिल्ली शाखा, श्रीअरविन्द मार्ग पर है, जो बड़ा रास्ता कुतुब मीनार को जाता है - कुतुब मीनार से डेढ़ मील पहले ही।

आश्रम के मुख्य द्वार में घुसते ही एक बहुत बड़ा बूढ़ा शानदार नीम का वृक्ष था जिसकी जड़ें गहरी चारों ओर फैली हुई थीं। इस वृक्ष की ऊँचाई लगभग दो सौ फुट और मोटाई तीस फुट और बड़ी-बड़ी डालें चारों ओर एक कुएँ के ऊपर फैली हुईं। इसकी आयु सम्भवतः सौ वर्ष होगी।

श्रीमाँ ने नीम के वृक्ष को ‘आध्यात्मिक वातावरण’ का नाम दिया है। हम लोग बड़े सौभाग्यशाली हैं कि आश्रम में चारों ओर नीम के बहुत से वृक्ष हैं, परन्तु इस विशाल वृक्ष की कुछ और ही शोभा थी और दूसरे वृक्ष इसके बच्चे, पोते और परपोते जैसे लगते थे।

बहुत-सी बसें हमारे स्कूल के हज़ार-बारह सौ बच्चों को पढ़ने के लिए उनके घरों से लाती हैं और ये सारी बसें इस विशाल नीम के वृक्ष के नीचे से घूमती थीं और बसों के ड्राइवर, कंडक्टर सब लोग इस वृक्ष की छत्र-छाया में विश्राम करते थे।

पिछले वर्षों में कई बार ऐसी चर्चा हुई कि इस वृक्ष को गिरा दिया जाये। यह बहुत बूढ़ा हो गया है और रास्ते में अड़चन है। परन्तु यह बात कभी अच्छी नहीं लगती थी।

पिछले सप्ताह मेरे मन में एक असामान्य विचार और योजना प्रबल हुई और मैंने अपने सहायकों को इस विशाल वृक्ष के नीचे इकट्ठा किया। उनमें हर प्रकार के कर्मचारी थे, बढ़ई, इन्जीनियर आदि भी। मैंने उनसे कहा कि ‘‘मेरे मन में एक अजीब मूर्ख विचार आया है। यदि आप सब साथ देने का वचन दें तो मैं बताऊँ? सब लोगों ने हाँ कर दी।’’

मैंने बतलाना शुरू किया: ‘इस विशाल वृक्ष के तने पर एक झोंपड़ी बनायी जाये, जैसा कि जंगलों में शिकार के लिए ‘मंच बनाया जाता है।’ यह झोंपड़ी विशाल वृक्ष पर टिक जायेगी। केवल एक ओर स्तम्भ का सहारा देना पड़ेगा। झोंपड़ी केवल पेड़ों की टहनियों और तख़्तों आदि से बनायी जायेगी और इसका फ़र्श भी लकड़ी के तख़्तों का होगा और चारों ओर खिड़कियाँ और एक ओर दरवाज़ा। छत फूस की होगी जैसे कि ओरोविल में झोंपड़ियाँ बनायी गयी हैं। यह वर्णन सुनकर सब लोग रोमांचित (Thrilled) हो गये।

शाम का समय था। दूसरे दिन उठते ही ‘पाया’ यानी थम्भ ईंटों और सीमेंट से चिन दिया गया- झोंपड़ी टिकाने के लिए और चारों ओर से सामान इकट्ठा करना शुरू कर दिया, जिससे कि झोंपड़ी बननी थी।

एक दूसरी बैठक बुलायी गयी कि इस झोंपड़ी में जाने के लिए सीढ़ी कैसे बनेगी। वाह! वाह! तुरन्त ही चमत्कार हुआ कि सीढ़ी तो वृक्ष के तने में ही गहरे घाव (गड्ढे) करके बनायी जा सकती है। सभी लोग खिल उठे और सबसे अधिक मैं ख़ुद। हम लोग सोच ही रहे थे कि यह कितनी अद्भुत झोंपड़ी बनेगी और इसको कैसे अन्दर से सजाया जायेगा, और मेज़-कुर्सी, सोफ़ासेट आदि किस प्रकार के और किस ढंग से रखे जायेंगे और चारों ओर के दृश्य और बच्चों के खेल-कूद भी देख सकेंगे।

इतना ही नही, दूर देशों से जो पर्यटक कुतुब की ओर जाया करेंगे, उनके रास्ते में यह एक नया सुन्दर दर्शनीय स्थान बन जायेगा। जो दूर देश-देशान्तरों से सैलानी पर्यटक (Tourists) कुतुब देखने के लिए जायेंगे तो रास्ते में यह झोंपड़ी भी अवश्य देखेंगे।

ऐसे मनोहर विचारों और स्वप्नों को देखते-देखते हम रात को सो गये कि प्रातः उठते ही झोंपड़ी का निर्माण कर देंगे।

पर आह! रात में एक बहुत तेज़ और भयानक तूफ़ान आया और प्रातः जब हम उठे तो क्या देखा कि वह विशाल बूढ़ा नीम का वृक्ष धरती पर सपाट गिरा पड़ा है और इधर-उधर सारे आश्रम-कैम्पस में कई और भी वृक्ष औंधे गिरे पड़े हैं।

हमारी सब योजनाएँ और षड्यंत्र धरे-के -धरे रह गये। झोंपड़ी बनाने का स्वप्न, स्वप्नलोक में ही रह गया। ऐसा लगता था कि बूढ़े वृक्ष को हमारे सब कुचक्रों का आभास और संकेत हो गया था और मानो वह अपने ऊपर, अपने विशाल व्यक्तित्व पर कोई आघात, अपना अपमान और दुर्दशा सहन नहीं कर सकता था। शायद इसीलिए उसने अपने-आपको तूफ़ान के हवाले कर दिया।

हमारे लिए इस विशाल वृक्ष का अन्त्येष्टि-संस्कार करने के लिए एक महीने का काम हो गया और यह इतना कठिन काम हमारे सिर पर आ पड़ा कि इसको कैसे उठाया जाये और कैसे और कहाँ काट-काटकर टुकड़े किये जायें और कैसे और कब इस स्थान से इसे पूरी तरह से हटाया जाये, साफ़ किया जाये।

सैंकड़ों जगह से उसे काटा गया और टुकड़े किये गये। और कुन्दां को मशीन पर ले जाकर चिरवाया गया। सब तरह के इस्तेमाल की दृष्टि से उसे अलग-अलग छाँटा गया फ़र्नीचर तथा मक़ान बनाने के काम में आनेवाली लकड़ी अलग कर ली गयी और अन्त में जो बचा, उसको खाना पकाने के जलावन के लिए रखा गया और छोटे-छोटे टुकड़े ट्रक में भरकर ईंटों के भट्टे पर भेजे गये- ईंटें पकाने में जलाने के लिए।

वृक्ष का एक-एक अंग काम में लाया गया। पत्तों को खाद के गड्ढ़ों में दबा दिया गया और जो निबोलियाँ गिरीं उन्हें इकट्ठा करके तेल निकालने के लिए भेज दिया गया, जिस तेल से बहुत लाभदायक साबुन बनते हैं और तेल निकालने के बाद जो खली बची उसे विशेष प्रकार की खाद के लिए रख लिया गया। और इधर-उधर दूर तक जो निबोलियाँ गिर कर दब गयीं उनमें से नये पौधे उगने लगे और नयी सन्तान पैदा होनी शुरू हो गयी। वृक्ष का कोई अंग ऐसा नहीं था जो किसी-न-किसी प्रकार काम में न आ गया हो।

संसार में सब वनस्पति, सब प्रकार के वृक्ष, पशु-पक्षी, समुद्र के जीव-जन्तु, रेंगने वाले प्राणियों (Reptiles) के भी अवशेष खाल आदि महत्वपूर्ण और लाभदायक कामों में प्रयोग किये जाते हैं परन्तु मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसका मृत शरीर किसी भी काम नहीं आता, जब तक कि मनुष्य भागवत् चेतना से जुड़कर और साधु-सन्त, महात्मा का जीवन व्यतीत न करे और मनुष्य मात्र के लिए पूजा का पात्र न बन जाये।