टक्कर
क्या विशाल और सुहावना समुद्र-तट था। कोई आर-पार नहीं। दू...र आकाश और जल एक हो रहे थे। इस समुद्र-तट पर एक सुन्दर-सा नगर बसा था। न छोटा न बड़ा। यह समूचा नगर मछुवों की बस्ती थी। मछुवा ही राजा और मछुवे ही प्रजा। सब प्रकार के व्यवसाय मछुवों के ही हाथ में थे। दूसरा और कोई इस नगर में नहीं बसता था।
मछुवे ही होटल व खाने-पीने की दुकानें चलानेवाले और मछुवे ही खाने-पीनेवाले। मछुवे ही सब शिक्षा-संस्थान चलानेवाले और मछुवे ही पढ़ने-पढ़ानेवाले। मछुवे ही बैंक चलानेवाले और मछुवे ही व्यापार करनेवाले। मछुवे ही हॉकी-फुटबॉल और क्रिकेट खेलनेवाले और मछुवे ही निर्णायक (रैफ़री)। यानी शहर का सब चाल-चलन और हकूमत मछुवों के ही हाथ में थी। और ऐसा नज़र आता था कि वे सब एक ही वंश-वृक्ष से चले होंगे। इनमें ग़रीब से ग़रीबतर और दर्मियाना दर्जे के और अमीर-से-अमीर लोग थे। इनके रहने के मकान भी अच्छे-से-अच्छे और बुरे-से-बुरे भी थे और उससे नीचे झुग्गी-झोंपड़ी और गंदी बस्तियों की तो कोई हद ही नहीं थी। परन्तु राजा का शीशमहल तो बहुत ही आलीशान था। कहीं दो-चार से चले होंगे और अब दो लाख तो ही ही गए होंगे, और बढ़ते ही जा रहे थे। यह भगवान् की सृष्टि है।
मछुवों का साधरणतया मुख्य व्यवसाय समुद्र की गहराई में जाकर मछलियों को घेर-घारकर पकड़कर लाना ही होता है। और ये लोग ब्राह्म-मूहूर्त में ही उठकर निवृत्त होकर अपने व्यवसाय में दाएँ, बाएँ, आड़े-तिरछे-सीधे, छोटी-बड़ी नौकाएं लेकर समुद्र में घुस जाते थे।
एक दिन ब्राह्म-मुहूर्त की बेला में एक नवयुवक और एक नवयुवती तेज़ चाल से समुद्र के तट पर एक दूसरे की विपरीत दिशा में चले आ रहे थे। अभी अंधेरा था और वक्त की बात है कि बादल भी घनघोर छाए हुए थे और मौसम के कारण कोहरा (fog) भी छाया हुआ था। ऐसी अंधकार की दशा में ग़ज़ब हो गया कि ये दोनों नवयुवक और नवयुवती सीधे-आपस में टकरा गये। मुँह-माथा भिड़ गया और बुरी तरह जा गिरे घुटने और कुहनियाँ टूट गईं।
लगे एक-दूसरे को कोसने और भला-बुरा कहने और एक-दूसरे को दोष देने। यह ‘तू-तू, मैं-मैं’ का युद्ध चलता ही गया बढ़ता ही गया और बंद होने में ही न आता था। परन्तु प्रातः के प्रकाश ने कृपा की कि इन दोनों को एक दूसरे की सूरत दिखायी। प्रातः का प्रकाश होते ही जब दोनों की आँखें मिलीं तो दोनों पर सन्नाटा छा गया और एक दूसरे को देखते ही रह गये!
जब काफ़ी समय गुजर गया ते नवयुवक ने हिम्मत की और पूछा कि - ‘तुम कौन हो? तुम तो बहुत अच्छी लग रही हो!’- ‘यही तो मैं भी सोच रही थी और यही सवाल मैं भी पूछना चाहती थी।’ नवयुवक ने कहा- ‘क्या हमारी शादी नहीं हो सकती?’ ‘क्यों नहीं हो सकती? मैं भी तो ऐसा ही सोच रही थी नहीं तो ऐसी टक्कर ही क्यां होती? शायद भगवान् को ही ऐसा मंज़ूर था।’
अब दोनों एक-दूसरे की पूछताछ (Interrogate) करने लगे और एक-दूसरे के विशेष परिचय (Credentials) भी पूछने लगे। दोनों के माँ बाप नहीं थे और न ही कोई बहन-भाई और न ही कोई रिश्तेदार। दोनों के ही कोई घर-घाट नहीं थे। अब तो दोनों के नक्षत्र मिल गये और कभी एक-दूसरे पर शिक़ायत का भी कोई आधार नहीं रहा।
किसी न किसी तरह किसी को कह-कहलवाकर पंडित से मुहूर्त्त निकलवाकर शादी कर ली।
अब लगे रहने-सहने और खाना बनाने का स्थान ढूँढ़ने। अभी तक तो सड़कों पर (फुटपाथ) या कहीं इधर-उधर गुज़ारा कर लिया करते थे। एक उपयुक्त स्थान ढूँढ़कर और परिश्रम करके उन्होंने एक झांपड़ी बना ली उसमें अपनी कम से कम ज़रूरत के मुताबिक़ सोने उठने-बैठने का स्थान बना लिया और एक तरफ़ रसोईघर और दूसरी तरफ़ स्नानघर भी बना लिया। ख़ूब आनन्द से रहने लगे।
अब दोनों इकट्ठे एक ही तरफ एक ही नाव में बैठकर मछलियाँ पकड़ने जाते। और उस तरह की ‘टक्कर’ का तो कोई खतरा ही नहीं रहा। परन्तु यह संसार है। मेहनत से खाने-पीने के लिए कमाकर लाना, दुःख-सुख....और अब समय पाकर दो बच्चे भी हो गये थे। सो उनका पालन-पोषण....ये सब ज़िम्मेदारियाँ उन पर धीरे-धीरे पड़नी शुरू हो गईं और गुज़ारा होना कठिन होने लगा। कभी-कभी ‘तू-तू मैं-मैं’ और झगड़ा भी हो जाता था।
यह नवयुवक सीधा-साधा था और उतना होशियार नहीं था कि किसी उल्टे-सीधे तरीक़ों से भी कमाकर ले आता। मछलियाँ पकड़ने की ही कमाई थी और उसमें गुज़ारा नहीं होता था।
एक दिन यह नौजवान मछुवा बहुत दुःख और परेशानी की हालत में मछलियाँ पकड़ने के लिए गया। सारा दिन जाल फेंकने के बावजूद दोपहर बीतने तक कोई मछली हाथ नहीं आई। वह बहुत निराश हो रहा था कि अंतिम समय एक छोटी सी मछली जाल में फँस गई। बहुत सुन्दर जगमगाती रंग-बिरंगी अद्भुत! उसको ऐसी प्रतीति हुई कि यह मछली तो हो ही नहीं सकती। यह तो कोई देवी ही इस रूप में आई है। परन्तु इसको बेचकर खाने-पीने की समस्या तो हल होती ही नहीं। भला उसका वज़न ही कितना था। और इसको कौन काट सकता था।
सहसा यह मछली देवी बोली कि ‘तुम मुझे बेचो मत, मारो मत! मुझे तुरन्त राजा के महल के सरोवर में छोड़ आओ। और तुम जो माँगोगे मैं दूंगी।’ नवयुवक बहुत हैरान हुआ और मछली को राजा के सरोवर में छोड़ आने के बाद यह सारा किस्सा घर आकर अपनी पत्नी को सुनाया। सुनकर वह भी चकित रह गई।
पत्नी ने छूटते ही कहा ‘तुरंत जाओ और मछली से कहो कि पहले तो हमें खाने-पीने का सामान दे कि हम बाल-बच्चों समेत भूखे बैठे हैं।’
मछुवा गया और उसने मछली देवी से प्रार्थना की कि ‘हम भूखे हैं और कृपा कर हमारी भूख मिटायें।’ देवी ने कहा - ‘जाओ! तुम्हारें घर में खाने-पीने का सामान रखा है।’ जब मछुवा घर पहुंचा तो दूर से ही खुशबू आ रही थी। अन्दर पहुँचकर देखा कि खान-पान और पकवान बन रहे हैं। पत्नी खुशी के मारे चिल्ला उठी कि ‘देखो खाने-पीने के सामान से घर भरा पड़ा है।
अब खाने-पीने की कभी कमी नहीं होती थी। जो चीज़ खत्म हो जाती थी वह अपने आप आ जाती। अब तो निश्चिंत सुखी जीवन से रहने लगे। फिर भी मछुवा नित-नियम से मछलियाँ पकड़ने समुद्र में चला जाया करता था और कुछ-न-कुछ कमा भी लाता था। परन्तु चिन्ता की अवस्था अब दूर हो गई थी।
समय पाकर एक दिन पत्नी ने कहा कि ‘देवी के पास फिर जाओ और कहो कि हमें एक अच्छा घर तो दे दें। अब जब खाने-पीने को दिया है तो घर भी तो अच्छा ही होना चाहिए।’ देवी ने कहा - ‘तथास्तु!’ और जब मछुवा वापस आया तो देखा कि झोंपड़ी के स्थान पर बहुत सुन्दर मक़ान है जिसमें उसकी बीवी और बच्चे खुशी के मारे नाच रहे हैं। मछुवा भी अन्दर आकर खुशी से भरकर उनके साथ नाचने लगा। धर्मपत्नी और बच्चों के साथ प्रेम में मस्त हो गया।
अब और कुछ समय बीतने पर पत्नी ने कहा कि ‘जाओ इस सुन्दर घर के मुताबिक देवी से फ़र्नीचर भी मांग लाओ।’ अब क्या था सारे घर में कमरों के मुताबिक़ फ़र्नीचर सज गया, ‘मेज़-कुर्सियाँ, पलंग, आलमारियाँ, सोफ़ा-सैट, हर प्रकार का आधुनिक फ़र्नीचर भी आ गया। अब वे सब तो खुशी के मारे फूले ही नहीं समाते थे।
पर अब चैन और सन्तोष कहाँ? पति को फिर भेजा कि ‘जाओ अब अपने लिए, मेरे लिए और बच्चों के लिए सुन्दर-सुन्दर कपड़े माँगकर लाओ। और भूलना नहीं मेरे लिए हर प्रकार के सुन्दर-सुन्दर गहने भी हों, देवी ने कहा ‘तथास्तु’। और जब मछुआ वापस पहुँचा तो घर की सब आलमारियाँ वस्त्रों से भरी थीं और तिजोरी गहनों से। अब तो क्या था। उस लड़की का नखरा ही नहीं पाया जाता था जिसने टक्कर खाकर एक दिन एक दीन, अनाथ से शादी की थी।
फिर एक दिन पति को भेजा कि - ‘देवी से कहो कि हमें संतोषजनक नौकर-चाकर भी तो दें।’ - और वे भी मिल गए।
एक दिन न जाने उसको क्या भूत सवार हुआ पति से कहने लगी कि ‘हम कोई राजा से किसी तरह कम हैं? जो सुविधाएँ राजा के पास हैं वे सब हमारे पास भी हैं। मकान भी कोई बुरा नहीं। उसका फ़र्नीचर तो सैकड़ों बरस पुराना है। दादा-परदादा के ज़माने से चला आ रहा है। हमारा आधुनिक और नया है। कपड़े और गहने भी कितने मिल गये हैं। नौकर-चाकर भी राजा के महल से एक दो अधिक ही होंगे। जाओ जब देवी हमारे ऊपर इतनी प्रसन्न है तो उससे कहो न कि तुम्हें राजा बना दे तो मैं रानी बन ही जाऊंगी।’
इस पर मछुवे को बहुत दुविधा हुई और बुरा लगा। परन्तु पत्नी-हठ के सामने झुककर वह देवी के पास गया और देवी ने छूटते ही कहा - ‘जाओ! घर जाकर देखो’। मछुवा उसी पाँव लौट गया।
वापस पहुँचकर देखता है कि वही टूटी-फूटी झोंपड़ी, वही फटे-पुराने कपड़े पत्नी और बच्चे वापस वहीं पहुँच गये जहाँ से चले थे। रोने-धोने लगे और वही पुरानी ज़िंदगी बसर करने लगे।
लालच बुरी बला है ....