मधुर कहानियाँ
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रस्सी और डण्डा


मैंने सुना है कि सन्त कबीर भी मेरे जैसे ही थे। सड़क पर से आते-जाते साधु-सन्तों को साथ ले आते और उनका सत्कार करते और उनको भोजन आदि कराते।

घर में खिलाने-पिलाने की उनके पास इतनी सुविधा तो नहीं थी। वे थोड़ा-बहुत काम करके अपने परिवार का ही मुश्किल से गुज़ारा कर पाते थे। और अतिथियों को खिलाने-पिलाने का घर की अवस्था पर हर समय बोझ रहता था।

कभी कोई घर की चीज़ बेचनी पड़ती, कभी उधार लेना पड़ता। परिवार के स्त्री-बच्चों के ख़र्च में से काटना पड़ता। बात यह कि हर समय तंगी रहती और उनकी स्त्री कबीर के इस ख़ब्त से हमेशा परेशान रहती।

जब कोई चारा या रास्ता न मिला तो बहुत सोचते-सोचते कबीर साहब की स्त्री ने एक तरक़ीब निकाली।

एक दिन एक संत आये जिनको कबीर साहब ने न्यौता - Invitation - दिया हुआ था। उनकी स्त्री ने उनको सत्कार से अन्दर बिठाया और झुँझलाते हुए कहा, ‘मैं अभी खाना परोसकर लाती हूँ। आप जल्दी से खाकर यहाँ से चले जायें।’

संत हैरान थे कि मुझे तो कबीर साहब ने न्यौता दिया है और मैं तो उनके सत्संग में आया हूँ। उनका इन्तज़ार किये बग़ैर मैं खाना खाकर कैसे चला जाऊँ?

उन्होंने कबीर साहब की स्त्री से कारण पूछा और कहा कि ‘आप धैर्य रखिये, मुझे प्यास लगी है। मुझे पानी आदि पिला दीजिये। खाना तब खाऊँगा जब कबीर साहब आ जायेंगे।’

स्त्री ने कहा, ‘फिर आप पछताएंगे। मैं आपके हित में कह रही हूँ कि आप जल्दी से खाना खाकर चले जायें। कबीर साहब का आजकल दिमाग़ ख़राब हो रहा है। यह देखिये, उन्होंने एक डण्डा और रस्सा रखा हुआ है। संतों-फकीरों को बुला तो लाते हैं सत्कार और खाना खिलाने के बहाने और उनको रस्से से बाँधकर खूब पीटते हैं। अगर आपकी भी पिटाई हो गयी, तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा, और मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँ।’

संत घबरा गये और उठकर चल दिये। कहते हुए कि ‘ऐसी सूरत में मैं खाना भी नहीं खाऊँगा।’ स्त्री ने बहुत कहा और समझाया, लेकिन वे खाना खाने के लिए नहीं माने, और आंगन से बाहर हो गये।

इतनी देर में कबीर साहब आ पहुँचे और अपने संत मित्र के सम्बन्ध में पूछने लगे कि ‘वे आये थे या नहीं? मैंने उनको न्यौता दिया हुआ था।’ स्त्री कहने लगी, ‘हाँ जी आये थे और अभी-अभी नाराज़ होकर चले गये हैं। मैंने तो बहुत रुकने को कहा, परन्तु वे नहीं माने।’

कबीर साहब ने पूछा कि बात क्या हुई। उनकी धर्म-पत्नी ने कहा, ‘बात कुछ नहीं, एक मामूली सी बात थी। उन्होंने मेरे से एक डण्डा और रस्सा मांगा।’ मैं अन्दर ढूंढने के लिए चली गयी और कुछ देर हो गयी। इतनी सी देर में वे नाराज़ होकर चले गये। यह देखिये, डण्डा और रस्सा, मैंने ढूँढकर रखा हुआ है।’

कबीर साहब डण्डा और रस्सा लेकर संत के पीछे भागे। चिल्लाते और आवाजें देते कि, ‘मेरे मित्र, नाराज़ होकर मत जाओ, यह लो डण्डा और रस्सा मैं ले आया हूँ!’

सन्त ने जब पीछे देखा कि कबीर साहब डण्डा और रस्सा लेकर भागे आ रहे हैं, तो उनको यक़ीन हो गया कि उनकी स्त्री सच कहती थी कि इनका दिमाग़ ख़राब हो गया है। अब यह रस्सा और डण्डा लेकर, मुझे बाँधकर पीटने के लिए मेरे पीछे-पीछे भागे आ रहे हैं। और संत और तेज़ी से भागने लगे और आँखों से ओझल हो गये।

संत ने यह किस्सा सारे शहर और सौ-सौ मील शहर के इधर-उधर सब जगह फैला दिया कि कबीर साहब का दिमाग़ ख़राब हो गया है।

तब से साधू-संतों ने डर के मारे कबीर साहब के घर जाना बन्द कर दिया और कबीर साहब, उनकी धर्मपत्नी और परिवार ‘चैन’ से रहने लगे।