मधुर कहानियाँ
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नाई


हरे राम, हरे कृष्ण! मैंने नाई कैसे कह दिया। यह तो मुग़ल-हुकूमत के समय की कहानी है। मुग़लिया ख़ानदान के ‘नाई’ तो ‘राजाजी’ कहलाते थे। और तब से आज तक भी यह प्रथा प्रचलित है कि हिन्दू या मुसलमान ख़ानदानों के घरेलू नाई ‘राजाजी’ कहलाते हैं।

‘राजाजी’ के हाथ में केवल बादशाह की दाढ़ी-मूँछ और बालों का फ़ैशन बनाये रखना ही नहीं था; और भी बहुत गम्भीर, पेचीदा और ख़ास काम हुआ करते थे।

बादशाह के शरीर की मालिश; शरीर को दबाना; थकावट दूर करना और स्वास्थ्य का ख़्याल रखना। बादशाह का मनोरंजन करना, कहानी, चुटकुले हँसी-मज़ाक की बातें सुना-सुनाकर बादशाह को ख़ुश रखना। शहर की सब प्रकार की ख़बरों से अवगत रखना और राजकुमार-राजकुमारियों तथा शाही ख़ानदान के सब लड़के -लड़कियों के रिश्ते तय करवाना और फिर ब्याह-शादी हो जाने के बाद लड़कियों के साथ अपनी स्त्री समेत उनके ससुराल में जाकर रहना और उनकी पूरी व्यवस्था करवाना। इतना ही नहीं, राज्य में अगर कोई राजनीतिक गतिविधि चल रही हो तो उन बातों की भी बादशाह को जानकारी देना। इन सब बातों के कारण नाई को ‘राजाजी’ का ख़िताब दिया गया था ताकि उसका अंहकार भी भरा रहे और अपने सब कार्यों को ख़ुशी से करते रहें।

यह एक तुलसीराम की कहानी है जो किसी समय मुग़लिया ख़ानदान में ‘राजाजी’ हुआ करते थे। अपने काम में बहुत निपुण, चतुर और होशियार थे। उनकी बहुत प्रशंसा भी होती थी।

बादशाह ने अपने महल के बग़ल में ही उनको एक सुन्दर मकान बनाकर दिया हुआ था, जो महल का ही भाग प्रतीत होता था।

ईश्वर की कृपा से इनका परिवार अच्छा बड़ा था जो उस ज़माने में सौभाग्य की बात थी। बादशाह की ओर से खाने-पीने, ओढ़ने-बिछाने हर प्रकार की अच्छी व्यवस्था थी और अच्छा वेतन, पुरस्कार भी मिलता था।

एक दिन किसी दुर्भाग्य के कारण बीवी से बहुत झगड़ा हो गया और उन्होंने ससुराल जाने की ठान ली कि बीवी के माँ-बाप को कहें कि इसको अपने घर बुला लें।

भुन्नास बादशाह के पास छुट्टी लेने के लिए पहुँचे और कहा-

‘‘मेरा यहाँ गुज़र नहीं होता, मैं ससुराल जा रहा हूँ।’’

बादशाह को बहुत चिंता हुई। बादशाह तो उसके बग़ैर एक दिन भी नहीं काट सकते थे। बहुत कारण पूछा परन्तु राजाजी ने कुछ नहीं बतलाया और कहा-

‘‘मैं दस-पन्द्रह दिन में लौट आऊँगा, इतने दिन मेरा बड़ा लड़का मेरे से भी अच्छी आपकी सेवा करेगा।’’

बादशाह को त

सल्ली तो नहीं हुई और चिंता में ग्रस्त रहे परन्तु और कुछ कर भी नहीं सकते थे। मन में यह चिंता उठी कि इसके बाल-बच्चे बहुत हैं, कहीं ख़र्च से दुःखी न हो रहा हो और ऐसा न हो जाये कि फिर वापिस ही न आये।

बादशाह ने स्वभावतः अपने ख़ज़ाँची को बुलाया और कहा- ‘‘आज से राजाजी का वेतन ड्योढ़ा कर दो।’’

राजाजी पर इस बात का कोई प्रभाव नहीं हुआ और प्रणाम करके चल पड़ा।

रास्ता लम्बा औ ऊबड़-खाबड़ था। जंगल, नदी, पहाड़, नाले और पैदल तीन दिन का रास्ता था। पहली रात किसी गाँव के समीप एक विशाल वृक्ष के नीचे डेरा लगाया। झोले में से निकाल कर कुछ खाना खाया, समीप की नदी से पानी पिया थके-माँदे होने के कारण तुरन्त गहरी नींद में सो गया। रोष और चिंता तो बनी हुई थी, सो स्वप्न में यक्ष (देवता) ने दर्शन दिये और कहा- ‘‘मूर्ख! तू क्यों इतनी चिन्ता में पड़ा है। तेरी बीवी तो बहुत भाग्यवान है। उसके कारण तुझे बहुत धन मिल सकता है।’’

राजाजी ने आश्चर्य से पूछा- ‘‘वह कैसे?’’

यक्ष ने उत्तर दिया- ‘‘जहाँ तुम सोये हो और अपनी बीवी के लिए भला-बुरा सोच रहे हो यहाँ बहुत धन गड़ा है। उठो और खोदो। मालामाल हो जाओगे।’’

राजाजी तुरन्त उठे और जो कुछ भी पैना-बेपैना सामान इधर-उधर से मिला उससे ज़मीन खोदनी शुरू कर दी। दो घण्टे के भीतर ही टंक-सी आवाज आयी और ऐसा लगा कि पैना पत्थर किसी बर्तन से टकराया है। अब तो वह भूत की तरह और ज़ोरों से खुदाई करने में जुट गया। कुछ ही देर में सात मुँहबंद मिट्टी से सने बर्तन निकले। वस्तुतः यह सातों स्वर्ण-कलश थे और मोहरों से भरे हुए थे।

अभी प्रकाश नहीं हुआ था और कुछ अँधेरा ही था। कोई सोकर भी नहीं उठा था, न ही किसी ने देखा था।

उसने जल्दी से सारी मिट्टी लौटा कर सातों कलशों को फिर दबा दिया और ससुराल जाने की बजाय वापस अपने घर लौट आया और बीवी को सारा किस्सा सुनाया और साथ ही वचन लिया कि किसी को बतलाना नहीं।

बादशाह को किसी प्रकार ख़बर पहुँच गयी कि तुलसीराम लौट आया है और उसने उसको तुरन्त बुला भेजा। लौट आने का कारण पूछा। पर उसके चेहरे पर परेशानी पहले से भी अधिक थी और वह कुछ बतला नहीं सका। बादशाह को चिंता हुई और उसने तुरन्त ख़ज़ाँची को बुलाया और कहा- ‘‘तुलसीराम का वेतन आज से दुगुना कर दो।’’

ख़ज़ाँची ने कुछ हील-हुज्जत की और कुछ तर्क करना चाहा परन्तु बादशाह ने डाँट दिया और कहा- ‘‘बोलो मत, यह हमारा हुक़्म है।’’

तुलसीराम बादशाह को सहज स्वभाव फिर प्रणाम कर चल पड़ा और घर से बैलगाड़ी ली और अपने बड़े लड़के को साथ लिया। अब तो ज़मीन खोदने-खादने का बढ़िया सामान भी साथ ले लिया। रात होते ही उसी वृक्ष के नीचे जा पहुँचा और आधी रात में सातों कलश निकाल बैलगाड़ी में रख प्रातः होने से पहले वापस अपने घर पहुँच गया। कलशों को एक कोठरी के अन्दर बंद करके अपनी बीवी को सम्भलवा दिया और पूरा दिन अच्छा विश्राम किया।

दूसरे दिन जब सब बच्चे पाठशाला में चले गये तो घर बाहर से बंद करके दोनों मियाँ-बीवी ने कलशों को खूब धोया, रगड़ा और चमकाया। सातों कलश सोने के निकले। फिर एक-एक को खोलना शुरू किया और खुशी के मारे फूले नहीं समाये कि पहला, दूसरा, तीसरा चौथा पांचवाँ और छठा कलश मोहरों से भरे निकले।

जब सातवाँ कलश खोला तो पौना ही था। यह देखते ही सारी खुशी मिट्टी में मिल गयी और सातवें कलश के पौने रह जाने का इतना दुःख हुआ जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

सारे घर में शोक सा छा गया। खाना-पीना भी भूल गया। बच्चे भी भूखे रह गये।

‘राजाजी’ सोचने लगे कि ऐसा हुआ तो क्यों हुआ? हमने कौन-से ऐसे कर्म किये थे कि हमारी क़िस्मत में पूर्णता की प्राप्ति न हुई। अब ‘राजाजी’ के मन की विचारधारा तेज़ी से चलने लगी कि कैसे इस सातवें कलश को भरा जाये। ख़र्च में कमी करने की योजनाओं के पुल बँधने लगे। वेतन जो दुगना हुआ था वह तो पूरा-का-पूरा कलश को भरने के कोष में रखा ही गया, अब घर के सारे ख़र्चों पर तलवार चलने लगी। आटे-दाल-सब्ज़ी में कमी, घी, दूध बिल्कुल बंद। धोबी का घर में आना बिल्कुल बंद कर दिया गया। कोई नया कपड़ा ख़रीदने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था; घर के ज़ेवर, बिस्तर, बिछौने, मेज़, कुर्सी, पलंग और रसोईघर के बर्तन जितने भी कम किये जा सकते थे कर दिये। और सबको बेचकर सारा धन सातवें कलश की पूर्ति में लगा दिया। यहाँ तक कि बच्चों की फ़ीस देनी भी बंद कर दी और संस्थाओं ने बच्चों को स्कूलों से निकाल दिया। सैर-सपाटा, कहीं आना-जाना और नाटक, मेले-तमाशे इत्यादि का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था।

महीनों और बरसों ज़ोर लगा लिया, परन्तु कलश का ख़ाली हिस्सा ऊँचा उठने में ही नहीं आता था। राजाजी की निराशा बढ़ती जा रही थी, ख़ून सूखता जा रहा था। क़िस्सा कोता: सारा घर बरबाद हो गया और बाल-बच्चों का बुरा हाल हो गया। सूखे टुकड़े खाने को, फटे-पुराने चीथड़े पहनने को।

उधर बादशाह का भी बुरा हाल हो गया। बादशाह की न तो अच्छी प्रकार देखभाल होती न मनोरंजन। वह बात ही नहीं रही जो किसी ज़माने में थी। बादशाह भी चिंताग्रस्त रहने लगे कि आख़िर इस सबका कारण क्या हो सकता है?

‘राजाजी’ से बार-बार पूछने पर भी कोई भेद नहीं मिलता था।

एक दिन बादशाह को इलहाम हुआ और बादशाह ने ‘राजाजी’ से पूछा, ‘कहीं तुम्हें अपवित्र धन तो नहीं मिल गया? सात सोने के कलश मोहरों से भरे हुए तो नहीं मिल गये?’

‘राजाजी’ सुनकर चौंक उठे। वे चीख़ कर बोले- ‘बादशाह सलामत! यही बात है, पर आपको कैसे मालूम हुआ? मेरी तो क़िस्मत फूटी निकली। सातवाँ कलश पौना ही निकला और उसके भरने में मैंने अपने घर को बरबाद कर दिया। आपका दिया हुआ दुगना वेतन भी इसी में लगा दिया पर उस सातवें कलश की सतह ऊँची उठने में ही नहीं आती। और कलश तो शायद जन्म-जन्मांतर भी नहीं भरेगा और मेरी यही दुर्दशा रहेगी।’

बादशाह ने प्यार से कहा - ‘मूर्ख! यह धन तुम्हारा नहीं है। यह धन तो भगवान् का है। वही इसका स्वामी है। तुम्हें तो यह धन अपवित्र अवस्था में यक्ष से मिला है केवल तुम्हें बरबाद करने के लिए। और सातवाँ कलश जो पौना मिला है वह तो लालच का कलश है, जो कभी भर ही नहीं सकता। तुम इसका कोई अंश नहीं भोग सकते। तुम्हें इससे तुरन्त छुटकारा पाना चाहिये। और यह धन भगवान् को अर्पित कर देना चाहिए।’

‘राजाजी’ ने कहा- ‘‘यह अब कैसे करूँ? क्या वापस वहीं दबा आऊँ?’’

बादशाह ने कहा- ‘‘नहीं। हमारे ख़ज़ाने में जमा करो, जो भगवान् का ख़ज़ाना है। और वहाँ से भगवान् के हित कार्यों में इस्तेमाल होगा। फिर भगवान् से तुम अपने लिए जो कुछ माँगोगे, भगवान् तुम्हें देगा, जिससे तुम अच्छा खाओ-पियो, अच्छा पहनो और अपनी संतान को अच्छी शिक्षा दे सको और हर प्रकार से आनंद का जीवन व्यतीत कर सको।’

ऐसा ही हुआ और राजाजी की सारी दुर्दशा आनंद में बदल गयी और बादशाह को भी पहले से दुगुना-चौगुना आनंद राजाजी से प्राप्त होने लगा।