मधुर कहानियाँ
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शबरी


आप शबरी को जानते तो हैं परन्तु उसकी पूरी कहानी नहीं। मैं आपको शबरी की आँखों देखी कहानी सुनाता हूँ जैसे कि रेडियो पर क्रिकेट मैच का आँखों-देखा हाल सुनाया जाता है। यदि आप चाहें तो सुनते सुनते अपने मन की टी.वी. में उसका चित्र देख सकते हैं।

त्रेता युग में जबलपुर के आसपास भीलों का एक बहुत बड़ा राज्य था। राजा के घर कोई सन्तान नहीं थी। भीलों का काम लूट और मार-काट का था? परन्तु इस राजा के मन में भगवान् का विचार उतरा। रानी का हृदय तो था ही बहुत अच्छा। भगवान् ने राजा की पुकार सुन ली और उनके घर एक कन्या उत्पन्न हुई। उसका नाम शबरी रखा गया।

ज्यों ही शबरी बड़ी होती गई, राज्य में सुख-चैन और खुशियाँ बढ़ती गईं। राजा और रानी क्रमशः शबरी के विवाह की तैयारियाँ करते रहे, दहेज बनाते रहे।

घर में और राज्य में भाँति-भाँति की बातें शबरी के ब्याह के बारे में होती रहतीं और शबरी सुन-सुनकर मन ही मन बहुत प्रसन्न होती।

जब शबरी के विवाह के दिन निकट आ गये तो उसके पिता प्रति दिन प्रातः नाश्ता करके चले जाते और दोपहर को वापिस आते। शाम को फिर जाते और रात में वापिस आते। शबरी बहुत आश्चर्य करती और सोचती कि पिता जी पहले तो कभी महल से इस तरह बाहर नहीं जाया करते थे।

शबरी ने एक दिन पूछा - ‘‘पिता जी, आप नित्य कहाँ जाते हैं? एक दिन मुझे भी ले चलिये।’’ उन्होंने कहा - ‘‘यह तो बहुत प्रसन्नता की बात है हम तुम्हें कल ही ले चलेंगे।’’

दूसरे दिन वे शबरी को साथ ले गये और नगर से काफ़ी दूर एक ऐसे स्थान पर गये जो कि सचमुच एक चिड़िया-घर ही था। भाँति-भाँति के पशु, भेड़, बकरी, हिरण, खरगोश इत्यादि और भाँति-भाँति के पक्षी सैकड़ों की संख्या में। बड़ी चहल-पहल थी और पशु-पक्षी बहुत प्रसन्न थे। उछलते-कूदते, उड़ते-नाचते। कितने ही भील लोग उनकी सेवा के लिये नियुक्त थे। शबरी देखकर बहुत प्रसन्न हुई और साथ ही साथ चकित भी हुई। वह कहने लगी - ‘‘पिता जी आपने तो बहुत ही सुन्दर और पुण्य का काम किया है।’’ राजा कहने लगे - ‘‘बेटी, यह सब व्यवस्था तुम्हारे ब्याह के लिये है।’’

‘‘हें, मेरे ब्याह के लिये। पिता जी वह कैसे? क्या ये सब पशु-पक्षी और इनके सेवादार मैं जहाँ ब्याह कर जाऊँगी तो क्या मेरे साथ भेज दिये जायेंगे?’’

राजा बोले - ‘‘बेटी! तुम नहीं समझी। तुम्हारे ब्याह पर सैकड़ों और हज़ारों अतिथि भी आयेंगे और उस समय इन पशु-पक्षियों को काट-काटकर भाँति-भाँति के स्वादिष्ट व्य०जन भोजन बनाये जायेंगे। जिससे सभी लोग तृप्त और प्रसन्न हों और तुम्हारी ससुराल में तुम्हारा बहुत मान व आदर हो और तुम जीवन में ख़ूब सुख व आनन्द भोगो।’’

यह सुनते ही शबरी के प्राण सूख गये। और उसके होश उड़ गये। शबरी कहने लगी - ‘‘पिता जी! मेरे सुख के लिये इन हज़ारों जीव-जन्तुओं की जान जायेगी।’’

राजा को यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ। उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे आजकल कोई हमसे यों कहें कि वनस्पति-जगत में भी तो जान होती है और ग़ाजर-मूली शलग़म काटने में हत्या और हिंसा होती है और पाप लगता है।

परन्तु शबरी के हृदय से यह दृश्य जाता ही नहीं था कि आह! ये सैकड़ों हज़ारों गाते-उछलते पशु-पक्षी मेरे ब्याह पर बिलबिलाते हुये काट दिये जायेंगे। उसके प्राण उनके प्राणों के लिये तड़पने लगे और शबरी का चैन और नींद उड़ गई। वह सोचने लगी कि यदि मैं ही अपने प्राण छोड़ दूँ तो हज़ारों जीव-जन्तुओं के प्राण बच जायें।

फिर सोचती कि यह तो आत्महत्या होगी और अपराध होगा। उसने ठानी कि इससे अच्छा तो यह होगा कि महल छोड़कर कहीं दूर भाग जाऊँ।

एक दिन अवसर पाकर वह महल से भाग निकली। कोई सहारा नहीं, कोई ठिकाना नहीं। राजा ने घबराकर चारों ओर घोड़े दौड़ाये पर शबरी की कहीं टोह न मिली, कुछ पता न लगा।

शबरी घाटियों, पर्वतों, जंगलों को काटती हुई महीनों और शायद वर्षों में भारतवर्ष के दक्षिण में जा पहुँची। रास्ते में जंगलों से कन्दमूल खा लेती और नदी-नालों से पानी पी लेती।

ऐसे ही करते-करते, चलते-चलते वह एक आश्रम में जा पहुँची। यह आश्रम मतंग ऋषि का था। आश्रम के भीतर तो वह जा ही नहीं सकती थी, क्योंकि भील-अछूत जाति की थी। उसने आश्रम के सामने एक रास्ते पर छोटी सी कुटिया पत्ते झाड़ियों से बना ली और उसमें रहने लगी।

इस रास्ते से आश्रम के गुरु मतंग ऋषि और आश्रम के अन्य महात्मा और साधकगण नदी पर स्नान के लिये जाया करते थे। शबरी उनके रास्ते को प्रतिदिन भली प्रकार साफ़ कर देती थी और काँटे आदि हटा देती।

आश्रम के लोगों ने जब यह देखा तो बहुत झुँझलाये और उन्होंने मतंग ऋषि के पास शिक़ायत की कि एक अछूत-कन्या आपके स्नान-मार्ग को प्रतिदिन अपवित्र कर देती है।

ऋषि ने स्नान के लिये जाते समय कन्या से पूछा - ‘‘तुम कौन हो और आश्रम के पास तुमने क्यों ठिकाना बनाया है?’’

वह आँखों में आँसू भरकर बोली - ‘‘भगवन् मैं अछूत जाति की कन्या हूँ और शबरी मेरा नाम है। भाग्य की ठोकर खाकर मैं यहाँ आयी हूँ और आपके रास्ते में मैंने शरण ली है कि आपका मार्ग साफ़ करके आपकी सेवा करूँ और आपके नित्य दर्शन करूँ जिससे मेरा भाग्य भी चेते।’’

ऋषि शबरी की सरलता, नम्रता और सच्चाई को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुये और आश्रमवासियों से कहा - ‘‘इस कन्या को यहाँ रहने दो।’’ और शबरी को दीक्षा दी कि वह ‘राम-हरि’ का मंत्र जपती रहे।

मतंग ऋषि बहुत वृद्धावस्था में थे। एक दिन उन्होंने सब आश्रमवासियों को बुलाया और साथ में शबरी को भी। ऋषि बोले - ‘‘मैं अब अपना शरीर छोड़ता हूँ। तुम लोग आनन्द से रहना।’’

शबरी यह सुनकर बिलख पड़ी और कहने लगी - ‘‘भगवन्! मेरा क्या होगा?’’

ऋषि बोले - ‘‘तुम मेरे पीछे इस आश्रम में रहोगी और इस आश्रम का नाम शबरी आश्रम होगा।’’

‘‘परन्तु भगवन्! मेरा उद्धार कैसे होगा?

ऋषि बोले - ‘‘एक दिन स्वयँ मर्यादा पुरुषोत्तम राम-सीता और लक्ष्मण के साथ यहां से निकलेंगे और तुम्हारा उद्धार करेंगे।’’

शबरी को राम नाम की रट लग गयी और इस प्रकार उसे आश्रम में बरसों बीत गये। वह वृद्ध हो गयी। बाल सफेद हो गये। चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गईं। परन्तु राम-रट नहीं छूटी।

वह जंगल से अच्छे-अच्छे कन्दमूल फल इकट्ठा करती और उनको सुखा-सुखाकर टोकरियों में भर-भरकर रखती जाती और प्रतीक्षा करती कि एक दिन भगवान् राम आयेंगे और उनकी सेवा-सत्कार करूँगी।

आख़िर वह दिन आ ही गया जब श्री राम सीता व लक्ष्मण उस मार्ग से निकले। शबरी ‘‘राम राम’’ करती उनके चरणों में गिर पड़ी, उनको लाकर अपनी कुटिया में बिठाया, उनके चरणों को धोया और कन्दमूल के टोकरे उनके आगे रखे।

वह पागल सी होकर और एक एक बेर चुनती और पहले स्वयं चखती और फिर भगवान् राम के सामने खाने के लिये रखती। इसलिये कि कहीं कोई फीका या खट्टा बेर भगवान् राम के पास न चला जाये। जो बेर फीका या खट्टा होता उसको झट पीछे की ओर फेंक देती।

भगवान् राम ने प्रसन्न और तृप्त होकर फल-फूल खाये और शबरी को आशीर्वाद दिया।

भगवान् राम से आशीर्वाद पाकर शबरी ने तत्काल प्राण छोड़ दिये।

भगवान् राम ने शबरी की देह का अन्तिम संस्कार विधिपूर्वक स्वयँ अपने हाथों किया और कुछ दिन शबरी के आश्रम में ही रहे जैसे कि शबरी की आत्मा को स्वर्ग तक पहुँचा रहे हों। कुछ दिन वहाँ बिताने के बाद उन्होंने अपने वनवास की यात्रा पुनः प्रारम्भ की।

शबरी अमर हो गयी और संसार में उसका नाम अटल हो गया।